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लॉकडाउन इफेक्टः न बैंड बजा न बाजा, बन गए जमाई राजा
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पीलीभीत। कोरोना के संक्रमण में 57 दिन से चल रहे लॉकडाउन से यूं तो हर कोई त्रस्त है, मगर इस लॉकडाउन के तमाम अच्छे पहलू भी रहे। भीड़भाड़ वाले आयोजन टल गए। तमाम शादियां भी टल गईं। लॉकडाउन में जिनकी शादी हो गई, वह बेहद कम खर्च में निपटीं। इस समय वैवाहिक बंधन में बंधने वाले वर-वधुओं केे लॉकडाउन के समय होने वाली अपनी शादी हमेशा याद रहेगी। इसे कोई भुला नहीं सकेगा।
आमतौर पर शादी के नाम पर निमंत्रण पत्र छपवाने से लेकर वर इच्छा, जनेऊ, तिलक, महिला संगीत, बरात ले जाना, शानदार दावत, बैंडबाजा, सात फेरे लेेने सरीखी रस्में शामिल होती हैं। सामाजिक मान प्रतिष्ठा की खातिर प्रत्येक शादी में लाखों रुपये न चाहकर भी खर्च करने पड़ते हैं। लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण के चलते लॉकडाउन में जिनकी शादियां हो रही हैं, उनका खर्च पहले की तुलना में 10 फीसदी भी नहीं हो रहा। गरीब और मध्य वर्गीय परिवारों के लिए लॉकडाउन में शादियां वरदान साबित हुई हैं। ऐसे परिवारों में बेटे या बेटी की शादी बिना फिजूल खर्च किए ही पांच या 10 हजार में निपट गई। चार या पांच बराती ही जाकर बेटे को ब्याह लाए। पंडित जी या काजी का इंतजाम वहीं से हो गया, जिस जगह से शादी होनी थी। इन परिवारों को यह तो मलाल है कि उनकी शादी में बैंडबाजा नहीं बजा। न ही वह अपने दोस्तों को शादी में बुला पाए। मनमाफिक दावत नहीं कर पाए। मगर, ऐसे परिवार संतुष्ट भी हैं कि उनका इतना सारा पैसा बच गया। कम पैसे में ही गृहस्थी बस गई। यहां तक कि रसूखदारों की शादियां भी कम खर्च में निपट गईं। अब ये सब बहुत खुश हैं।
सादगी से ले लिए सात फेरे
मोहल्ला खैरूल्लाशाह निवासी भगवान के 25 वर्षीय पुत्र मोनू कश्यप की शादी मोहल्ले की ही चांदनी के साथ तय हुई थी। दोनों घरों में तैयारी चल रही थी। तभी मार्च में कोरोना फैलने के बाद लॉकडाउन हो गया। 26 अप्रैल के बाद शुभ मुहूर्त नहीं निकल रहा था। 26 अप्रैल को लड़के के माता-पिता बिना बरात और बैंडबाजा शादी करा लाए। पंडितजी ने मंत्र पढ़कर सादगी से सात फेरे की रस्म पूरी करा दी।
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अपनी ही शादी में नहीं बजवा पाए बैंडबाजा
न बैंडबाजा, न दावत, फिर भी रिश्ता कबूल। मोहल्ला शेर मोहम्म्द निवासी शाहिद हुसैन के 28 वर्षीय बेटे मोहम्मद जुबैर पेशे से बैंडबाजा बजाने का काम करते हैं। 22 मार्च को उनका निकाह मोहल्ला शरीफ खां की नेहा खान के साथ तय था। शादी के दिन ही जनता कर्फ्यू लग गया। जनता कर्फ्यू के दिन बैंडबाजा बिना पिता और बहनोई के साथ लड़की वालों के घर जाकर निकाह कर लिया। जुबैर का कहना है कि वह सबकी शादी में बैंड बजाते हैं, लेकिन अपनी शादी में नहीं बजवा पाए। उनकी शादी यादगार बन गई।
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आमतौर पर शादी के नाम पर निमंत्रण पत्र छपवाने से लेकर वर इच्छा, जनेऊ, तिलक, महिला संगीत, बरात ले जाना, शानदार दावत, बैंडबाजा, सात फेरे लेेने सरीखी रस्में शामिल होती हैं। सामाजिक मान प्रतिष्ठा की खातिर प्रत्येक शादी में लाखों रुपये न चाहकर भी खर्च करने पड़ते हैं। लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण के चलते लॉकडाउन में जिनकी शादियां हो रही हैं, उनका खर्च पहले की तुलना में 10 फीसदी भी नहीं हो रहा। गरीब और मध्य वर्गीय परिवारों के लिए लॉकडाउन में शादियां वरदान साबित हुई हैं। ऐसे परिवारों में बेटे या बेटी की शादी बिना फिजूल खर्च किए ही पांच या 10 हजार में निपट गई। चार या पांच बराती ही जाकर बेटे को ब्याह लाए। पंडित जी या काजी का इंतजाम वहीं से हो गया, जिस जगह से शादी होनी थी। इन परिवारों को यह तो मलाल है कि उनकी शादी में बैंडबाजा नहीं बजा। न ही वह अपने दोस्तों को शादी में बुला पाए। मनमाफिक दावत नहीं कर पाए। मगर, ऐसे परिवार संतुष्ट भी हैं कि उनका इतना सारा पैसा बच गया। कम पैसे में ही गृहस्थी बस गई। यहां तक कि रसूखदारों की शादियां भी कम खर्च में निपट गईं। अब ये सब बहुत खुश हैं।
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सादगी से ले लिए सात फेरे
मोहल्ला खैरूल्लाशाह निवासी भगवान के 25 वर्षीय पुत्र मोनू कश्यप की शादी मोहल्ले की ही चांदनी के साथ तय हुई थी। दोनों घरों में तैयारी चल रही थी। तभी मार्च में कोरोना फैलने के बाद लॉकडाउन हो गया। 26 अप्रैल के बाद शुभ मुहूर्त नहीं निकल रहा था। 26 अप्रैल को लड़के के माता-पिता बिना बरात और बैंडबाजा शादी करा लाए। पंडितजी ने मंत्र पढ़कर सादगी से सात फेरे की रस्म पूरी करा दी।
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अपनी ही शादी में नहीं बजवा पाए बैंडबाजा
न बैंडबाजा, न दावत, फिर भी रिश्ता कबूल। मोहल्ला शेर मोहम्म्द निवासी शाहिद हुसैन के 28 वर्षीय बेटे मोहम्मद जुबैर पेशे से बैंडबाजा बजाने का काम करते हैं। 22 मार्च को उनका निकाह मोहल्ला शरीफ खां की नेहा खान के साथ तय था। शादी के दिन ही जनता कर्फ्यू लग गया। जनता कर्फ्यू के दिन बैंडबाजा बिना पिता और बहनोई के साथ लड़की वालों के घर जाकर निकाह कर लिया। जुबैर का कहना है कि वह सबकी शादी में बैंड बजाते हैं, लेकिन अपनी शादी में नहीं बजवा पाए। उनकी शादी यादगार बन गई।