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रामकथा में पार्वती की तपस्या का प्रसंग सुनाया
Updated Sun, 22 Jul 2018 01:48 AM IST
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खेकड़ा (बागपत)।
श्री राम कथा के चौथे दिन शनिवार को बाल साध्वी राधा देवी जी ने पार्वती जी के तप की महिमा बताते हुएकहा कोई भी कार्य असंभव नहीं है, अगर मनुष्य का संकल्प पक्का हो जो अपने संकल्प ओर डटे रहते हैं, उनकी मदद खुद भगवान ही करते हैं। जिस समय पार्वती का जन्म हुआ तो पूरे हिमालय में खुशी की लहर दौड़ गई । देवी देवता ओर सिद्ध पुरुष महात्मा सभी मनुष्य रूप धारण कर कर आस पास झोपड़ी बनाकर साधना करने लगे और नित्य उनके स्वरूप का दर्शन करने किसी ना किसी बहाने हिमालय राजमहल में आने लगे। देवऋष नारद को जब ज्ञात हुआ कि सती ही कन्या रूप मै हिमालय राज के घर आई हैं तो नारद जी हिमालय राज भवन गए और राजा ने उनका स्वागत किया । बाद में कन्या को बुलाकर कन्या के दोष गुण के बारे में बताया। नारद जी ने बताया कि अगर तुम्हारी कन्या बन में जाकर तप करें और तप से शंकर जी प्रसन्न हो जाए तो काम बन जाए क्योंकि यह सभी अवगुण शंकर जी में ही पाए जाते हैं। नारद की बात सुनकर पार्वती ने हजारों वर्ष तप कर शंकर जी को पति के रूप में प्राप्त किया। और दोनो कैलाश पर्वत पर रहने लगे। बालाजी आश्रम में इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए लोगों ने हवन किया।
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श्री राम कथा के चौथे दिन शनिवार को बाल साध्वी राधा देवी जी ने पार्वती जी के तप की महिमा बताते हुएकहा कोई भी कार्य असंभव नहीं है, अगर मनुष्य का संकल्प पक्का हो जो अपने संकल्प ओर डटे रहते हैं, उनकी मदद खुद भगवान ही करते हैं। जिस समय पार्वती का जन्म हुआ तो पूरे हिमालय में खुशी की लहर दौड़ गई । देवी देवता ओर सिद्ध पुरुष महात्मा सभी मनुष्य रूप धारण कर कर आस पास झोपड़ी बनाकर साधना करने लगे और नित्य उनके स्वरूप का दर्शन करने किसी ना किसी बहाने हिमालय राजमहल में आने लगे। देवऋष नारद को जब ज्ञात हुआ कि सती ही कन्या रूप मै हिमालय राज के घर आई हैं तो नारद जी हिमालय राज भवन गए और राजा ने उनका स्वागत किया । बाद में कन्या को बुलाकर कन्या के दोष गुण के बारे में बताया। नारद जी ने बताया कि अगर तुम्हारी कन्या बन में जाकर तप करें और तप से शंकर जी प्रसन्न हो जाए तो काम बन जाए क्योंकि यह सभी अवगुण शंकर जी में ही पाए जाते हैं। नारद की बात सुनकर पार्वती ने हजारों वर्ष तप कर शंकर जी को पति के रूप में प्राप्त किया। और दोनो कैलाश पर्वत पर रहने लगे। बालाजी आश्रम में इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए लोगों ने हवन किया।