देवबंद। दारुल उलूम वक्फ के शेखुल हदीस मौलाना अहमद खिजर शाह मसूदी ने कहा कि रमजान का महीना अल्लाह की रहमतों का खजाना है। रमजान बरकतों का महीना है जिसमें अल्लाह की बेशुमार रहमतें बरसती हैं। इस महीने में अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को माफ कर उन्हें दोजख से आजादी का परवाना अता करता है।
मुकद्दस रमजान माह की विशेषता बताते हुए मौलाना अहमद खिजर ने कहा कि सब्र का रमजान से गहरा ताल्लुक है। रोजे की हालत में इंसान खाने-पीने और जिस्मानी ख्वाहिशात से रुकता है। रमजान को गमख्वारी का महीना इसलिए करार दिया गया है कि इस मुबारक महीने में हम दूसरों (गरीब, असहाय और जरूरतमंदों) का ख्याल भी रखें और सदका व खैरात से उनकी मदद करें। उन्होंने कहा कि हजरत मोहम्मद साहब ने फरमाया है कि जब रमजानुल मुबारक की पहली रात आती है तो अल्लाह तआला आसमान-ए-दुनिया पर तशरीफ लाते हैं और फरिश्तों के जरिये एलान करते हैं कि है कोई माफी मांगने वाला जिसको मैं माफ कर दूं, है कोई औलाद की तमन्ना करने वाला जिसे मैं औलाद की नेअमत अता कर दूं, है कोई बीमारी से शिफा मांगने वाला जिसे मैं बीमारी से छुटकारा दे दूं। यह एलान सुबह तक होता रहता है। कितने कीमती और मुबारक हैं यह लम्हे कि देने वाला खुद आवाज लगा रहा है। मौलाना खिजर ने कहा कि रोजा रमजान की अहम इबादत है रोजे के जरिये तकवा (बुरे कामों से बचना और नेक काम करना) असली इबादत ही नहीं बल्कि इबादतों की रूह है। रोजा ऐसी इबादत है जो रूहानी और जिस्मानी एतबार से इंसान के लिए फायदेमंद है। उन्होंने कहा कि रोजा व्यवहार, इंसाफ, इंसानियत, हमदर्दी व गमख्वारी का सबक देता है। रोजे से तकवा हासिल होता है, रोजे से दिल को सुकून मिलता है। इस मुकद्दस महीने का एक-एक लम्हा कीमती और बहुत अहम है। इस महीने की बरकतों और रहमतों को जमकर लूटना चाहिए।