फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Muzaffarnagar News ›   People are becoming enemies of their own lives

अवसाद में खुद की ही जान के दुश्मन बन रहे हैं लोग

Sun, 05 Nov 2017 11:44 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर Updated Sun, 05 Nov 2017 11:44 PM IST
विज्ञापन
People are becoming enemies of their own lives
प्रतीक चित्र। - फोटो : अमर उजाला
लाइलाज बीमारी से जूझती जिंदगी खुद ही जीवन लीला को खत्म करने पर तुली है। बीते दो सप्ताह में जिले में तीन ऐसी घटनाएं हुई है, जिनमें गंभीर रोगों की वजह से पीड़ितों ने आत्महत्या कर ली। आर्थिक तंगी, महंगे इलाज और परिवार को पालने की मजबूरी जैसी समस्याओं ने उन्हें अवसाद की चपेट में ले लिया था।
विज्ञापन


गांव हो या शहर, असाध्य बीमारियों से लड़ने का हौसला टूट रहा है। कैंसर, मधुमेह, हार्ट, क्षय रोग, अस्थमा, पैरालिसिस (अधरंग) जैसे रोग से पीड़ित लोग उपचार की लंबी अवधि और जीवन की समस्याओं से तंग आकर अवसाद की गिरफ्त में हैं। वैसे तो डिप्रेशन यानि अवसाद से घिरी आबादी की तादाद हर साल बढ़ रही है, लेकिन लाइलाज बीमारी से जूझने के बजाय खुद ही जिंदगी की सांस की डोर काट लेना चिंताजनक है।
विज्ञापन


बीते पंद्रह दिनों में जिले के पुरकाजी, भोपा और शहर में ऐसी तीन घटनाएं सामने आई, जिनमें रोग पीड़ितों ने जिंदगी को बोझिल मान कर खुदकुशी कर ली। केंद्र और प्रदेश की सरकारें स्वास्थ्य जागरूकता और सुरक्षा के कितने ही इंतजामों का दावा करें, मगर हकीकत यह है कि गंभीर बीमारियों के उपचार की दवाईयों का खर्च उठा पाना आम आदमी के लिए आसान नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन


डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के मुताबिक बीते दस वर्ष में अवसाद से ग्रस्त लोगों की संख्या 18 फीसदी से अधिक बढ़ी है। अवसाद आत्महत्या को विवश करने का मुख्य कारक है। गंभीर बीमारी व्यक्ति को आंतरिक रुप से तोड़ रही है। हाल ही में हुई ह्दय विदारक घटनाएं इसका प्रमाण है।

बच्चों से जुड़ी संवेदना और जिम्मेदारी भी उन्हें आत्महत्या करने से नहीं रोक पाई। सीएमओ डॉ पीएस मिश्रा कहते है कि रोगों से लड़ने की क्षमता पैदा करें। रोगियों ने आत्मबल और सही उपचार से कैंसर जैसे जानलेवा रोग पर भी विजय हासिल की है।

-बीमारियों और स्वास्थ्य संबंधित कारणों से समाज में आत्महत्याएं बढ़ी है। गंभीर रोगों से पीड़ित रोगियों को समय से जागरूकता बरत कर विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में उपचार कराना चाहिए। बीमारी से कम, बल्कि इलाज के दौरान उपजे अवसाद की वजह से ऐसी घटनाएं होती है।
डॉ आरएस मलिक, मानसिक रोग विशेषज्ञ।

- असाध्य बीमारी से जुझने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि पीड़ित स्वयं अपने जीवन को व्यर्थ समझने लगता है। महंगा इलाज और अकेलेपन की समस्या उसे अवसाद के चपेट में ले लेती है। परिवार में अपनेपन का अहसास मिले और लगातार हौसला बढ़ाया जाए, तभी इस समस्या से निजात मिलेगी।
डॉ कलम सिंह, पूर्व समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डीएवी डिग्री कॉलेज।

प्रकरण नंबर-1
पुरकाजी कसबे के बाजार खुर्द मुहल्ला निवासी सुलेमान (45) पुत्र अशरफ लंबे अरसे से दौरा पड़ने की बीमारी से ग्रसित था। मानसिक तनाव के चलते 20 अक्तूबर को सुलेमान ने घर में रखे चाकू से गर्दन रेत कर आत्महत्या कर ली।

प्रकरण नंबर-2
भोपा के गांव बेहड़ा थ्रू में किसान संजय उर्फ मीनू (52)पुत्र निरंजन सिंह कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझ रहा था। 24 अक्तूबर की रात को संजय ने हताशा में तमंचे से कनपटी पर गोली मार कर जीवन लीला समाप्त कर ली थी।


प्रकरण नंबर-3
मुजफ्फरनगर के मुहल्ला मल्हूपुरा निवासी सुरेंद्र जलोत्रा कई साल से वृद्धावस्था के चलते रोगग्रस्त थे। अचानक 24 अक्तूबर को उन्होंने घर छोड़ दिया। बाद में उनकी भोपा गंग नहर में डूबने की जानकारी मिली।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed