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फिल्म में भी फसाद की जड़ बना है एसपी का तबादला
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Fri, 17 Nov 2017 11:57 PM IST
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फिल्म का पोस्टर।
- फोटो : अमर उजाला
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मुजफ्फरनगर-द-बर्निंग लव समाज, राजनीति और सरकार की भूमिका पर सवाल उठाती है। रील लाइफ में भी दंगे की वजह प्रशासनिक चूक है। मुजरिमों को छोड़ना और एसपी का तत्काल तबादला होना फसाद की जड़ बनता है। यहीं से फिल्म मनोरंजन के ट्रैक से उतरकर सीधे खून-खराबे और सियासी चक्रव्यूह को दर्शाती हुई आगे बढ़ती है। यहीं पर कई सीन ऐसे हैं, जो 2013 के दंगों के घटनाक्रम से मेल खाते हैं।
फिल्म की शुरुआत शहर की हवाओं के बाद गांव की पगडंडियों पर पहुंचती है। फिल्म में मुख्य भूमिका में देव कुमार (देव शर्मा) जो एक निशानेबाज है। दिल्ली से अपने घर गांव मोरना लौटता है, यहां पर देव का झुकाव गांव में पुलिस भर्ती की तैयारी कर रही सारा खान (ऐश्वर्या देवन) की ओर होता है। दोनों की लव स्टोरी आगे बढ़ती, इससे पहले ही सारा खान ट्रेनिंग के लिए रवाना हो जाती है।
गांव में भू-माफिया जोधा सिंह का पुत्र बाबू (मुर्सलीन कुरैशी) देव कुमार के खेतों पर कब्जा कर लेता है। गांव में फारूख (संदीप बॉस) का लड़कियों से छेड़छाड़ के चलते अमित-मोहन से झगड़ा होता है और फारूख की चाकुओं से हत्या कर दी जाती है। विरोध में उसके पक्ष के लोग अमित-मोहन की हत्या कर देते हैं। यहीं फिल्म मनोरंजन से उतरकर खून-खराबे की ओर बढ़ती है।
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मीरापुर थाने के एसपी का रोल निभा रहे मुंबई के अभिनेता सुनील चितकारा कई लोगों को पकड़कर जेल भेजते हैं। एक पक्ष सत्ताधारी नेताओं की शरण लेकर मुजरिमों को छुड़वा लेते हैं और एसपी का तबादला होता है। इस नाराजगी के चलते दूसरे पक्ष में आक्रोश भड़कता है। महापंचायत का ऐलान होता है। खास पहलू यह है कि दंगे में पंचायत के दौरान एक मुस्लिम पत्रकार की हत्या होना और फिर गंगनहर पर ट्रैक्टर-ट्रॉली सवार लोगों का कत्ल दंगे की स्याह कहानी को दोहरा देता है।
यहां कई सीन ऐसे हैं, जो असल दंगों की तस्वीर से मेल-जोल रखते हैं। फिल्म में एक पक्ष से कथित नेता तो दूसरी ओर से पाक पब्लिक पार्टी के भड़काऊ दृश्य है। जिससे आम जनता में सत्ता लाभ के लिए जोश भरा जाता है और खूनी खेल में इंसानियत का कत्ल दिखाया गया।
खून-खराबे को रोकने के लिए ट्रेनिंग की पूरी कर पुलिस कप्तान के रूप में लौटी सारा खान (ऐश्वर्य देवन) काफी हद तक स्थिति को संभालती है। मगर, हालात समझने में जल्दबाजी और चूक होती है। यहीं पर मुख्य भूमिका में शामिल देव कुमार (देव शर्मा) को फसाद में गोली लगती है। जिसकी सहायता के लिए सारा खान एंबुलेंस बुलाती और फिल्म का अंत होता है।
कई सस्पेंस छोड़ गई कहानी
मुजफ्फरनगर। फिल्म को देखकर यह तो नहीं कहा जा सकता है कि दंगों पर आधारित नहीं है। लेकिन, दर्जनों सीन ऐसे फिल्माए गए हैं। जिनमें इंसानियत और आपसी सौहार्द की मिसाल पेश होती है। मुख्य हीरो देव कुमार झगड़े में दोनों पक्षों के लोगों की मदद करते हैं। रीयल लाइफ में फिल्माए गए दृश्यों में जनता को भड़काने, फसाद कराने वाले और आपसी प्रेमभाव की डोर तोड़ने वालों को क्या सजा दी गई। यह फिल्म में सस्पेंस बना है।
कांग्रेस ने फिल्म रोकने की मांग उठाई
मुजफ्फरनगर। जिला कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ताओं ने डीएम कार्यालय पर प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने कहा कि वर्तमान में निकाय चुनाव चल रहे हैं। ऐसे में मुजफ्फरनगर-द बर्निंग लव फिल्म का सिनेमाघरों में चलने से संवेदनशील क्षेत्रों में बुरा असर पड़ सकता है। असामाजिक लोग इसका लाभ उठा सकते हैं।
जिले में शांति और सौहार्द के लिए फिल्म का प्रदर्शन रोका जाए। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने डीएम को ज्ञापन देकर उचित कार्रवाई की मांग की है। इस दौरान कार्यवाहक अध्यक्ष मोहम्मद तारिक कुरैशी, सतीश गर्ग, नानू मियां, बालेंद्र चौधरी, हरेंद्र त्यागी, ममनून अंसारी, गुफरान काजमी आदि मौजूद रहे।
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फिल्म की शुरुआत शहर की हवाओं के बाद गांव की पगडंडियों पर पहुंचती है। फिल्म में मुख्य भूमिका में देव कुमार (देव शर्मा) जो एक निशानेबाज है। दिल्ली से अपने घर गांव मोरना लौटता है, यहां पर देव का झुकाव गांव में पुलिस भर्ती की तैयारी कर रही सारा खान (ऐश्वर्या देवन) की ओर होता है। दोनों की लव स्टोरी आगे बढ़ती, इससे पहले ही सारा खान ट्रेनिंग के लिए रवाना हो जाती है।
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गांव में भू-माफिया जोधा सिंह का पुत्र बाबू (मुर्सलीन कुरैशी) देव कुमार के खेतों पर कब्जा कर लेता है। गांव में फारूख (संदीप बॉस) का लड़कियों से छेड़छाड़ के चलते अमित-मोहन से झगड़ा होता है और फारूख की चाकुओं से हत्या कर दी जाती है। विरोध में उसके पक्ष के लोग अमित-मोहन की हत्या कर देते हैं। यहीं फिल्म मनोरंजन से उतरकर खून-खराबे की ओर बढ़ती है।
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मीरापुर थाने के एसपी का रोल निभा रहे मुंबई के अभिनेता सुनील चितकारा कई लोगों को पकड़कर जेल भेजते हैं। एक पक्ष सत्ताधारी नेताओं की शरण लेकर मुजरिमों को छुड़वा लेते हैं और एसपी का तबादला होता है। इस नाराजगी के चलते दूसरे पक्ष में आक्रोश भड़कता है। महापंचायत का ऐलान होता है। खास पहलू यह है कि दंगे में पंचायत के दौरान एक मुस्लिम पत्रकार की हत्या होना और फिर गंगनहर पर ट्रैक्टर-ट्रॉली सवार लोगों का कत्ल दंगे की स्याह कहानी को दोहरा देता है।
यहां कई सीन ऐसे हैं, जो असल दंगों की तस्वीर से मेल-जोल रखते हैं। फिल्म में एक पक्ष से कथित नेता तो दूसरी ओर से पाक पब्लिक पार्टी के भड़काऊ दृश्य है। जिससे आम जनता में सत्ता लाभ के लिए जोश भरा जाता है और खूनी खेल में इंसानियत का कत्ल दिखाया गया।
खून-खराबे को रोकने के लिए ट्रेनिंग की पूरी कर पुलिस कप्तान के रूप में लौटी सारा खान (ऐश्वर्य देवन) काफी हद तक स्थिति को संभालती है। मगर, हालात समझने में जल्दबाजी और चूक होती है। यहीं पर मुख्य भूमिका में शामिल देव कुमार (देव शर्मा) को फसाद में गोली लगती है। जिसकी सहायता के लिए सारा खान एंबुलेंस बुलाती और फिल्म का अंत होता है।
कई सस्पेंस छोड़ गई कहानी
मुजफ्फरनगर। फिल्म को देखकर यह तो नहीं कहा जा सकता है कि दंगों पर आधारित नहीं है। लेकिन, दर्जनों सीन ऐसे फिल्माए गए हैं। जिनमें इंसानियत और आपसी सौहार्द की मिसाल पेश होती है। मुख्य हीरो देव कुमार झगड़े में दोनों पक्षों के लोगों की मदद करते हैं। रीयल लाइफ में फिल्माए गए दृश्यों में जनता को भड़काने, फसाद कराने वाले और आपसी प्रेमभाव की डोर तोड़ने वालों को क्या सजा दी गई। यह फिल्म में सस्पेंस बना है।
कांग्रेस ने फिल्म रोकने की मांग उठाई
मुजफ्फरनगर। जिला कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ताओं ने डीएम कार्यालय पर प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने कहा कि वर्तमान में निकाय चुनाव चल रहे हैं। ऐसे में मुजफ्फरनगर-द बर्निंग लव फिल्म का सिनेमाघरों में चलने से संवेदनशील क्षेत्रों में बुरा असर पड़ सकता है। असामाजिक लोग इसका लाभ उठा सकते हैं।
जिले में शांति और सौहार्द के लिए फिल्म का प्रदर्शन रोका जाए। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने डीएम को ज्ञापन देकर उचित कार्रवाई की मांग की है। इस दौरान कार्यवाहक अध्यक्ष मोहम्मद तारिक कुरैशी, सतीश गर्ग, नानू मियां, बालेंद्र चौधरी, हरेंद्र त्यागी, ममनून अंसारी, गुफरान काजमी आदि मौजूद रहे।