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स्वयं में इतिहास समेटे है मानकी का सिद्धपीठ श्री मन्केश्वर महादेव मंदिर

Sun, 27 Feb 2022 11:08 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 27 Feb 2022 11:08 PM IST
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Manki's Siddhapeeth has history in itself, Shri Mankeshwar Mahadev Temple
स्वयं में इतिहास समेटे है मानकी का सिद्धपीठ श्री मन्केश्वर महादेव मंदिर
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देवबंद। सिद्धपीठ श्री मन्केश्वर महादेव मंदिर मानकी स्वयं में इतिहास समेटे हुए है। इस मंदिर की आस्था का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भगवान शिव ने समुद्र मंथन के दौरान मानकी गांव की धरा पर ही आसन जमाया था। इस मंदिर की मान्यता श्री नीलकंठ महादेव मंदिर के समान की जाती है।
देवबंद से करीब चार किमी दूरी पर स्थित श्री मन्केश्वर महादेव मंदिर में प्रदेश ही नहीं अपितु अन्य पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए माथा टेकने स्वयंभू प्रकट शिवलिंग के दर्शन के लिए मानकी गांव में आते हैं। मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना होने के साथ ही वह अपने अंदर विभिन्न प्रकार की चमत्कारिक घटनाओं को समेटे हुए है।
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श्री मन्केश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष चौधरी प्रविंदर सिंह बताते हैं कि मंदिर शिवभक्तों की अटूट आस्था का केंद्र ही नहीं बल्कि सामाजिक सद्भाव की भी जीती जागती मिसाल है। किदंवती है कि मानकी गांव के एक मुसलमान गाड़ा परिवार ने खेत में हल चलाते समय एक काले पत्थर को ऊपर आते देखा तो वह आश्चर्य में पड़ गया। उस पत्थर पर मिट्टी ढककर वह घर चला आया। उसने प्रात:काल खेत में आकर देखा कि जिस काले पत्थर को वह मिट्टी में दबाकर गया था वह फिर से स्वत: ही ऊपर आ गया है। चमत्कार के कारण उस किसान ने वह खेत शिव मंदिर के लिए दान करने की पेशकश की। कहते हैं उसी रात देवबंद के एक शिवभक्त व्यापारी को स्वप्न में स्वयं भगवान शिव ने अपने प्रकट होने की बात कहकर वहां मंदिर बनवाने की प्रेरणा दी। इसी आधार पर वहां हिंदू व मुसलमानों ने अपनी सहमति जताकर मंदिर का निर्माण कराया। मन्केश्वर महादेव के इस मंदिर में स्वयं प्रकट शिवलिंग का महत्व फाल्गुन की शिवरात्रि पर विशेष माना जाता है।
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घ्याना मंदिर में बरगद से पेड़ में प्रकट हुए शिवलिंग
देवबंद। गांव घ्याना में श्री सिद्धपीठ भगवान नागेश्वर महादेव मंदिर भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मंदिर का निर्माण करीब दो दशक पूर्व ग्रामीणों के सहयोग से किया गया था। लेकिन उसके अंदर स्थित शिवलिंग के बारे में मान्यता है कि वह सैकड़ों वर्षों से यहां एक बरगद के पेड़ में स्थित था। बुजुर्ग बताते हैं कि पुराने समय पर यहां ऊंचाई पर बस्ती थी जो किसी कारण पलटकर तबाह हो गई थी। ऐसा क्यों हुआ यह तो कोई नहीं जानता लेकिन उसके बाद यहां निचले भाग में गांव बसा दिया गया। जिसका नाम घ्याना रखा गया। उसी समय से गांव में स्थित बरगद के पेड़ के अंदर रखे शिवलिंग की गांव के लोग पूजा करते चले आ रहे हैं। आस्था के प्रतीक इस मंदिर में प्रत्येक सप्ताह के सोमवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है। परंतु शिवरात्रि के दिन तो दूर-दूर से श्रद्धालु इस मंदिर में आकर जलाभिषेक कर मन्नते मांगते हैं।

फाल्गुन व श्रावण मास में जलाभिषेक करने शिवभक्तों की उमड़ती है भीड़
देवबंद। मानकी व घ्याना स्थित सिद्धपीठ मंदिरों पर प्रतिवर्ष श्रावण मास की चतुर्दशी तिथि और फाल्गुन मास में शिवरात्रि पर विशाल मेला आयोजित किया जाता है। श्रावण में तो सैकड़ों की संख्या में कांवडिए भी भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं।
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