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जज रवि कुमार दिवाकर ने फैसले में लिखा-न्यायाधीश के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए? 97 पत्रावलियों पर उठाए सवाल

Thu, 17 Sep 2026 01:29 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Published by: Dimple Sirohi Updated Thu, 17 Sep 2026 01:29 PM IST
सार

मुजफ्फरनगर में जज रवि कुमार दिवाकर ने एनडीपीएस के 10 साल पुराने मामले के फैसले में न्यायाधीश के साथ अन्याय को लेकर सवाल उठाए। 97 पत्रावलियों के रिकॉल का भी उल्लेख किया।

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Judge Ravi Kumar Diwakar Raises Questions Over Recall of 97 Case Files Before Retirement
रवि कुमार दिवाकर न्यायधीश - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मुजफ्फरनगर की अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या-3/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने बृहस्पतिवार को एनडीपीएस एक्ट के 10 साल पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए न्याय व्यवस्था से जुड़े कई सवाल उठाए। अदालत ने साक्ष्य के अभाव में आरोपी अशोक भारत को दोषमुक्त करार दिया।

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फैसले में न्यायाधीश ने लिखा कि न्यायाधीश का काम न्याय करना होता है। यदि उसी के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करने वाला न्यायाधीश क्या जिला जज के ऐसे आदेशों को मानने के लिए बाध्य है, जो विधि के विपरीत हों।

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10 साल पुराने मामले में आरोपी दोषमुक्त
बृहस्पतिवार को अदालत ने एनडीपीएस एक्ट के 10 साल पुराने मामले में अशोक भारत को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया। फैसले में अदालत ने फिल्म 'दामिनी' के 'तारीख पर तारीख' वाले संवाद का भी उदाहरण दिया।

न्यायाधीश ने कहा कि एक बेकसूर व्यक्ति को न्याय हासिल करने में लंबा समय लगा। इसी फैसले में उन्होंने अपनी अदालत से 18 अगस्त को ट्रांसफर की गई हत्या के मामलों की 97 पत्रावलियों को लेकर भी सवाल उठाए।

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97 पत्रावलियों के रिकॉल का उल्लेख
फैसले में कहा गया कि तत्कालीन जनपद न्यायाधीश ने 18 अगस्त को एक ही तरह के कुल नौ आदेश पारित किए थे। इन आदेशों के माध्यम से अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/एफटीसी कोर्ट संख्या-3, मुजफ्फरनगर में विचाराधीन पत्रावलियों को विधि के अनुसार निस्तारण के लिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मुजफ्फरनगर की अदालत में रिकॉल किया गया।

 

रिटायरमेंट से 13 दिन पहले रिकॉल पर सवाल
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि इन 97 पत्रावलियों को तत्कालीन जनपद न्यायाधीश ने अपने न्यायालय में अपने रिटायरमेंट से मात्र 13 दिन पहले रिकॉल किया था। फैसले में यह भी कहा गया कि पत्रावलियों को रिकॉल करने का कोई कारण नहीं बताया गया। 

न्यायाधीश ने इसी कार्रवाई के संदर्भ में जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण और ऐसे आदेशों को लेकर सवाल उठाए हैं, जिन्हें वह विधि के विपरीत मानते हैं।

जज दिवाकर का इंसाफ...155 दिन में 23 दोषियों को सुनाई फांसी
फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने छह अप्रैल से सात सितंबर तक 155 दिन में 10 मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। मुजफ्फरनगर में न्यायालय की स्थापना के 70 साल में यह रिकॉर्ड है।

12 अप्रैल 1956 को मेरठ से विभाजन कर जिले में अस्थायी न्यायालय शुरू हुआ। बाद में 14 जुलाई 1958 को स्थायी तौर पर काम शुरू किया गया। इसी साल छह अप्रैल से सात सितंबर तक 155 दिन में फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या तीन के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने न्याय का नया अध्याय जोड़ दिया। 10 मामलों में अब तक 2 लोगों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है।

इन मामलों में सुनाया फैसला
1. एडवोकेट समीर सैफी हत्याकांड (06 अप्रैल 2026) : 15 अक्टूबर 2019 को 40 लाख रुपये के लेन-देन के विवाद में अधिवक्ता समीर सैफी की हत्या कर दी गई थी। अदालत ने सिंगोल अल्वी, सोनू उर्फ रिजवान और शालू उर्फ अरबाज को मृत्युदंड सुनाया। एक अन्य दोषी दिनेश को सात वर्ष के कारावास की सजा दी गई।

2. शेखर हत्याकांड (28 अप्रैल 2026) : भौराकलां थाना क्षेत्र के सिसौली निवासी शेखर की वर्ष 2019 में 70 हजार रुपये के लेन-देन के विवाद में पास के गांव खेड़ी सूंडियान में हत्या कर दी गई थी। अदालत ने दोषी मुकेश, उसके बेटे प्रदीप, संदीप और सोनू को मृत्युदंड सुनाया।

3. राजेश देवी-हिमांशु हत्याकांड (30 मई 2026) : छपार के सलेमपुर गांव निवासी सुरेश की पत्नी राजेश देवी अपने छह वर्षीय बेटे हिमांशु के साथ नवंबर 2011 को घर से निकली थीं। चरथावल में दोनों की लाश मिली।हत्या के मामले में अदालत ने दोषी रईस को मृत्युदंड की सजा सुनाई।

4. राजेंद्र सैनी हत्याकांड (20 जून 2026) : ककरौली निवासी राजेंद्र सैनी की वर्ष 2018 में हत्या कर शव को जलाने के मामले में अदालत ने रामकरण उर्फ सावन गिरी और गीलू को मृत्युदंड सुनाया। मामले के एक आरोपी वीरसैन की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो चुकी थी।

5. होमगार्ड रतिराम हत्याकांड (02 जुलाई 2026) : शहर कोतवाली के बुढ़ाना मोड़ पर वर्ष 2020 में गश्त के दौरान होमगार्ड रतिराम की चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। पहले प्रकरण जानलेवा हमले में दर्ज हुआ, बाद में होमगार्ड की मौत हो गई। इसके बाद हत्या की प्राथमिकी दर्ज हुई।अदालत ने दोषी दीपक को मृत्युदंड की सजा सुनाई।

6. राजबीर सिंह हत्याकांड (06 जुलाई 2026) : तितावी थाना क्षेत्र के मांडी गांव में प्रधान पद की रंजिश में राजबीर सिंह (60) की 2010 में गोली मारकर हत्या की गई थी। दोषी पूर्व प्रधान प्रमोद कुमार और प्रधान पद के प्रत्याशी रहे सहदेव उर्फ पप्पू को अदालत ने मृत्युदंड की सजा सुनाई है।

7. राज सिंह हत्याकांड (17 जुलाई 2026) : शामली के कुड़ाना गांव के पास किसान राज सिंह (48) की लूट के बाद लाठी-डंडों से पीटकर और गोली मारकर 20 अगस्त 2011 को हत्या कर दी गई थी। अदालत ने अभियुक्त बहावड़ी गांव निवासी अजीत, सूरज उर्फ काला, वहलना निवासी अनिल और देवरिया के घुसवा रामपुर निवासी सुनील को मृत्युदंड की सजा सुनाई।

8. सालिम हत्याकांड (12 अगस्त 2026) : नौ दिसंबर 1999 की रात आठ ट्रैक्टर चालक हारुण का रजबहे की पटरी से अपहरण हुआ। फिरौती की चिट्ठी मिली तो उसका किसान पिता सालिम बदमाशों के बताए स्थान पर पहुंच गया। बदमाशों ने सालिम को बैठा लिया और रकम का इंतजाम करने के लिए हारुण को छोड़ दिया था। बाद में 25 जनवरी 2000 को सालिम की हत्या कर दी गई थी।

9. पवन हत्याकांड (13 अगस्त 2026) : शामली के कांधला थाना क्षेत्र के भभीसा गांव में 14 जुलाई 2014 को घर पर हमला कर किसान पवन कुमार की दो गोली मारकर हत्या कर दी गई। उसका भाई अशोक घायल हुआ था। भभीसा के राहुल उर्फ बोसी, कांजरहेड़ी गांव के हरेंद्र कुमार, पीरखेड़ा के रामवीर, बागपत के बड़ौत निवासी राजीव उर्फ छोटू को मृत्युदंड की सजा सुनाई।

10. शहजादी की हत्या (07 सितंबर 2026) : बागपत के निवाड़ा निवासी शहजादी का निकाह 10 जनवरी 2015 को शाहपुर की नई आबादी निवासी नदीम के साथ हुआ था। 23 जुलाई 2018 को रात साढ़े आठ बजे विवाहिता के साथ मारपीट कर उसके ऊपर मिट्टी का तेल (केरोसिन) छिड़ककर आग लगा दी गई। सफदरजंग अस्पताल में इलाज के दौरान 28 जुलाई 2018 को उसकी मृत्यु हो गई थी। दोषी पति को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई।

जज रवि कुमार दिवाकर ने यह दिए तर्क :
- धारा 449 के तहत सेशन जज/जिला जज के पास प्रशासनिक अधिकार है कि वह मातहत अदालतों से मुकदमों की फाइलें वापस मंगाकर स्वयं सुन सकते हैं या किसी अन्य कोर्ट को दे सकते हैं। 
-  इसके उप-खंड यानी धारा 449(2) के अनुसार, यदि किसी मुकदमे का ट्रायल (गवाही या जिरह) पहले ही शुरू हो चुका है और वह 'पार्ट हर्ड' (Part-heard) की श्रेणी में आ चुका है, तो जिला जज के पास उसे बिना असाधारण विधिक कारणों के बीच में वापस (Recall) लेने का अधिकार नहीं होता।
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