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आय तो दोगुनी नहीं हुई, पर लाठियां मिलीं : नरेश टिकैत
मुजफ्फरनगर/अमर उजाला/ब्यूरो
Updated Thu, 04 Oct 2018 12:29 AM IST
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polictial
- फोटो : अमर उजाला
मुजफ्फरनगर। हरिद्वार से दिल्ली पहुंची किसान क्रांति यात्रा की समाप्ति से पहले किसानों और पुलिस के बीच टकराव की कोई उम्मीद नहीं थी। भाकियू के नेतृत्व में दस दिन की पदयात्रा के बाद दिल्ली पहुंचे किसान केंद्र सरकार के समक्ष अपनी मांगे रखना चाहते थे, मगर उन्हें रोक दिया गया। नतीजतन पुलिस से संघर्ष हुआ, आंसू गैस के गोले दागे गए। लाठीचार्ज में दोनों तरफ से कई घायल हो गए।
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भाकियू के प्रतिनिधिमंडल से वार्ता की। किसानों की सात मांगों पर सहमति भी बनी। पूरे घटनाक्रम से किसानों में गुस्सा बढ़ गया। अंतत: केंद्र सरकार ने क्रांति यात्रा को किसान घाट पर पहुंचने दिया, जहां भाकियू ने आंदोलन को समाप्त करने की घोषणा की। सरकार की नीतियों और दिल्ली के प्रकरण पर अमर उजाला ने भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत से विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश।
-केंद्र और प्रदेश सरकार का रवैया क्या नीतिगत था? क्रांति यात्रा को किसान घाट जाने से रोकने के पीछे क्या वजह लगती है?
-किसान अपनी समस्याएं और मांगें केंद्र सरकार के समक्ष रखना चाहते थे। दिल्ली में जाने से रोकने के पीछे सरकार की मंशा क्या थी, वे राजनीतिज्ञ ही जानें। अन्नदाता जब अपनी बात ही नहीं रख सकता, तो ये कैसा लोकतंत्र है। क्या कानून व्यवस्था के लिए बुजुर्ग किसान खतरा हैं, जो लाठीचार्ज किया गया। राजनीति किसानों को किसानों से लड़ाना चाहती है। पुलिस में भी सबसे ज्यादा किसानों के बेटे हैं।
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-सीएम योगी आदित्यनाथ से गाजियाबाद में भाकियू की वार्ता क्यों विफल रही?
-क्रांति यात्रा केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में निकाली गई थी। किसान अपनी मांगे पीएम नरेंद्र मोदी के समक्ष रखना चाहते थे। ऐसे में सीएम योगी आदित्यनाथ से वार्ता का कोई फायदा नहीं था। जैसे पुराने ट्रैक्टरों को प्रतिबंधित किए जाने का मुद्दा आदि। जिन मांगों में प्रदेश सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं है, उसे सीएम कैसे पूरा करते।
-केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से जिन सात मांगों पर सहमति की बात सामने आई है, क्या पीएम मोदी उन्हें पूरा करेंगे?
-गृहमंत्री राजनाथ सिंह किसान पुत्र हैं, यूपी के सीएम रह चुके हैं। उन्हें भाकियू के संघर्ष का पता है। उन्होंने भाकियू प्रतिनिधिमंडल की सभी मांगें सुनी। आश्वासन दिया कि पीएम नरेंद्र मोदी के समक्ष भाकियू की मांगें रखी जाएंगी। जिन सात मांगों पर विचार हुआ है। आशा है कि किसानों की एकता के मद्देनजर केंद्र सरकार जल्द ही उन पर फैसला लेगी।
-भाकियू संस्थापक चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के निधन के बाद भाकियू ने किसान क्रांति यात्रा के माध्यम से बड़ा आंदोलन किया। यात्रा अपने उद्देश्य में कितनी सफल रही?
-किसान क्रांति यात्रा ऐतिहासिक रही है। सभी वर्गों का किसानों को सहयोग मिला। देश के कई प्रांतों के किसानों ने भागीदारी की। पूर्वांचल से बड़ी संख्या में महिला किसानों का योगदान सराहनीय है। पूरे देश का किसान समस्याओं से जूझ रहा है। उनकी पीड़ा और हक के लिए भाकियू ने सरकारों की आंखें खोलने को किसान क्रांति यात्रा निकाली।
-किसानों के साथ केंद्र और प्रदेश सरकार के कड़े रवैये को किस दृष्टि से देखते हैं?
-केंद्र में वर्ष 2014 में भाजपा की सरकार बनी। किसानों ने उम्मीदों के साथ वोट किया। पीएम मोदी ने चुनावी सभाओं में जो वादे किए थे, वो साढे़ चार साल में पूरे नहीं हो पाए। किसानों की आय सरकार दोगुनी नहीं कर पाई, मगर लाठियां बरसा दी। डीजल, पेट्रोल, खाद और बिजली के दाम बढ़ा कर खेती पर बोझ डाल दिया। दस साल में कितने किसान नया ट्रैक्टर खरीद पाएंगे। गन्ना भुगतान की देरी जग जाहिर है। मजबूरी में आंदोलन की राह चुनी। सरकार ने अपनी मंशा स्वच्छ नहीं की, तो आगामी लोकसभा चुनाव में किसान साथ खड़ा नहीं होगा।
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केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भाकियू के प्रतिनिधिमंडल से वार्ता की। किसानों की सात मांगों पर सहमति भी बनी। पूरे घटनाक्रम से किसानों में गुस्सा बढ़ गया। अंतत: केंद्र सरकार ने क्रांति यात्रा को किसान घाट पर पहुंचने दिया, जहां भाकियू ने आंदोलन को समाप्त करने की घोषणा की। सरकार की नीतियों और दिल्ली के प्रकरण पर अमर उजाला ने भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत से विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश।
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-केंद्र और प्रदेश सरकार का रवैया क्या नीतिगत था? क्रांति यात्रा को किसान घाट जाने से रोकने के पीछे क्या वजह लगती है?
-किसान अपनी समस्याएं और मांगें केंद्र सरकार के समक्ष रखना चाहते थे। दिल्ली में जाने से रोकने के पीछे सरकार की मंशा क्या थी, वे राजनीतिज्ञ ही जानें। अन्नदाता जब अपनी बात ही नहीं रख सकता, तो ये कैसा लोकतंत्र है। क्या कानून व्यवस्था के लिए बुजुर्ग किसान खतरा हैं, जो लाठीचार्ज किया गया। राजनीति किसानों को किसानों से लड़ाना चाहती है। पुलिस में भी सबसे ज्यादा किसानों के बेटे हैं।
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-सीएम योगी आदित्यनाथ से गाजियाबाद में भाकियू की वार्ता क्यों विफल रही?
-क्रांति यात्रा केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में निकाली गई थी। किसान अपनी मांगे पीएम नरेंद्र मोदी के समक्ष रखना चाहते थे। ऐसे में सीएम योगी आदित्यनाथ से वार्ता का कोई फायदा नहीं था। जैसे पुराने ट्रैक्टरों को प्रतिबंधित किए जाने का मुद्दा आदि। जिन मांगों में प्रदेश सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं है, उसे सीएम कैसे पूरा करते।
-केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से जिन सात मांगों पर सहमति की बात सामने आई है, क्या पीएम मोदी उन्हें पूरा करेंगे?
-गृहमंत्री राजनाथ सिंह किसान पुत्र हैं, यूपी के सीएम रह चुके हैं। उन्हें भाकियू के संघर्ष का पता है। उन्होंने भाकियू प्रतिनिधिमंडल की सभी मांगें सुनी। आश्वासन दिया कि पीएम नरेंद्र मोदी के समक्ष भाकियू की मांगें रखी जाएंगी। जिन सात मांगों पर विचार हुआ है। आशा है कि किसानों की एकता के मद्देनजर केंद्र सरकार जल्द ही उन पर फैसला लेगी।
-भाकियू संस्थापक चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के निधन के बाद भाकियू ने किसान क्रांति यात्रा के माध्यम से बड़ा आंदोलन किया। यात्रा अपने उद्देश्य में कितनी सफल रही?
-किसान क्रांति यात्रा ऐतिहासिक रही है। सभी वर्गों का किसानों को सहयोग मिला। देश के कई प्रांतों के किसानों ने भागीदारी की। पूर्वांचल से बड़ी संख्या में महिला किसानों का योगदान सराहनीय है। पूरे देश का किसान समस्याओं से जूझ रहा है। उनकी पीड़ा और हक के लिए भाकियू ने सरकारों की आंखें खोलने को किसान क्रांति यात्रा निकाली।
-किसानों के साथ केंद्र और प्रदेश सरकार के कड़े रवैये को किस दृष्टि से देखते हैं?
-केंद्र में वर्ष 2014 में भाजपा की सरकार बनी। किसानों ने उम्मीदों के साथ वोट किया। पीएम मोदी ने चुनावी सभाओं में जो वादे किए थे, वो साढे़ चार साल में पूरे नहीं हो पाए। किसानों की आय सरकार दोगुनी नहीं कर पाई, मगर लाठियां बरसा दी। डीजल, पेट्रोल, खाद और बिजली के दाम बढ़ा कर खेती पर बोझ डाल दिया। दस साल में कितने किसान नया ट्रैक्टर खरीद पाएंगे। गन्ना भुगतान की देरी जग जाहिर है। मजबूरी में आंदोलन की राह चुनी। सरकार ने अपनी मंशा स्वच्छ नहीं की, तो आगामी लोकसभा चुनाव में किसान साथ खड़ा नहीं होगा।