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जो देश का दुश्मन, वह सबका दुश्मन
Updated Wed, 09 Aug 2017 01:16 AM IST
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जो देश का दुश्मन, वह सबका दुश्मन
मुजफ्फरनगर। सरवट के मदरसा महमूदिया से पढ़ाई करने वाले अब्दुल उर्फ अब्दुल्ला के आतंकी होने से शिक्षक और मौलवियत की पढ़ाई करने वाले भी हैरान हैं। छोटी उम्र में ही अब्दुल्ला ने दहशतगर्दों की दुनिया में कदम रख लिए थे। हालांकि इससे पहले अब्दुल्ला ने अपना नाम बदलकर दीन, जिंदगी के हर पहलू को हदीस, किताबों से सीखा और उनका मनन किया। हालांकि पढ़ाई के दौरान मदरसे के रिकार्ड में कहीं भी उसके खिलाफ कोई दीनी और दुनियावी तौर से शिकायत दर्ज नहीं है। रिकार्ड के अनुसार उसका चरित्र और व्यवहार एकदम साफ था।
पांचों वक्त की नमाज, दीनी हदीस और शिक्षा में तल्लीन रहने वाला अब्दुल्ला आतंकी निकलेगा, यह किसी ने सोचा नहीं था। महमूदिया मदरसे के शिक्षक कहते हैं कि दाखिला लेने के बाद जल्द ही अन्य साथियों से वह घुलमिल गया था। 24 घंटे में सात घंटे पढ़ाई के लिए मदरसे में अलग-अलग शिक्षकों के निर्धारित हैं। सुबह-शाम पढ़ाई कराई जाती है। मौलवी की पढ़ाई करने के दौरान आतंकी अब्दुल्ला ने मदरसों को छिपने की सबसे आसान जगह मान लिया था। जहां भी गया, वहां मदरसों में विद्यार्थी बनकर पहुंचा और परदे के पीछे अपना काम करता रहा। मदरसे के शिक्षक हैरानी भरे लफ्जों में कहते हैं कि अल्लाह का शुक्र है कि वह यहां से चला गया। उसकी कोई गतिविधि मदरसे में नहीं रही। नमाजी-परहेजी के तौर पर समय गुजारता था। मदरसे के मोहतमिम कारी नईम, अब्दुल कय्यूम के साथ अन्य शिक्षक कहते हैं कि जो देश का दुश्मन है, वह सबका दुश्मन है। दहशतगर्द कभी मुसलमान नहीं हो सकता है। कुरान-ए-मजीद और दीन में दहशतगर्दों के लिए कोई जगह नहीं है। उधर, मदरसे में रहकर बांग्लादेशी आतंकी अब्दुल्ला ने फर्जी नाम-पते से पढ़ाई की। वर्ष 2012 से 2013 तक मदरसे में दीन, जिंदगी जीने का तरीकों के साथ आतंकी ने कई अन्य पहलुओं को भी बारीकी से सीखा था। अब्दुल्ला ने मदरसे में 27 सितंबर 2012 को बृहस्पतिवार के दिन प्रवेश किया था, जबकि 19 जून 2013 बुधवार को मदरसा छोड़ दिया था।
निकाहनामा से लेकर तकरीर तक का हुनर जाना
मुजफ्फरनगर। सरवट के महमूदिया मदरसे में आतंकी अब्दुल्ला ने निकाह पढ़ाना, तलाक के अरकान, दुनियावी स्तर पर दीन के मुताबिक खरीद-फरोख्त करने के साथ तकरीर करने का हुनर महज 22 से 23 साल की उम्र में सीख लिया था। इसके अलावा भी उच्च वर्ग के आलिमों द्वारा लिखी गई किताबों को पढऩा उसका शौक था।
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25 छात्रों में 18वें रोल नंबर पर था आतंकी
मुजफ्फरनगर। मदरसे के रिकार्ड में मोहम्मद अब्दुल के नाम से दर्ज आतंकी अब्दुल्ला अल मॉमून के साथ 25 अन्य छात्र भी पढ़ाई कर रहे थे, जिसमें उसका रोल नंबर 18वां था। हालांकि मदरसे के रिकार्ड में उसकी कोई आईडी नहीं मिली है।
मदरसे में यह पेपर दिए थे आतंकी ने
क्रम संख्या-------तिथि--------विषय
पहला पेपर------12-06-2013---हिदायत
दूसरा पेपर-----12-06-2013--मुक्तश्अर उल माआनी
तीसरा पेपर-----13-06-2013--मकांमआत-ए-हरीरी
चौथा पेपर------15-06-2013--नूरुउल अनवर
पांचवा पेपर-----16-06-2013---सुल्लमुल उलूम
छठा पेपर-------16-06-2013---तकरीर
सातवां पेपर------19-06-2013---तर्जुमा-ए-कुरान मजीद
(12 और 16 जून को सुबह-शाम की पाली में एग्जाम हुए थे।)
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मुजफ्फरनगर। सरवट के मदरसा महमूदिया से पढ़ाई करने वाले अब्दुल उर्फ अब्दुल्ला के आतंकी होने से शिक्षक और मौलवियत की पढ़ाई करने वाले भी हैरान हैं। छोटी उम्र में ही अब्दुल्ला ने दहशतगर्दों की दुनिया में कदम रख लिए थे। हालांकि इससे पहले अब्दुल्ला ने अपना नाम बदलकर दीन, जिंदगी के हर पहलू को हदीस, किताबों से सीखा और उनका मनन किया। हालांकि पढ़ाई के दौरान मदरसे के रिकार्ड में कहीं भी उसके खिलाफ कोई दीनी और दुनियावी तौर से शिकायत दर्ज नहीं है। रिकार्ड के अनुसार उसका चरित्र और व्यवहार एकदम साफ था।
पांचों वक्त की नमाज, दीनी हदीस और शिक्षा में तल्लीन रहने वाला अब्दुल्ला आतंकी निकलेगा, यह किसी ने सोचा नहीं था। महमूदिया मदरसे के शिक्षक कहते हैं कि दाखिला लेने के बाद जल्द ही अन्य साथियों से वह घुलमिल गया था। 24 घंटे में सात घंटे पढ़ाई के लिए मदरसे में अलग-अलग शिक्षकों के निर्धारित हैं। सुबह-शाम पढ़ाई कराई जाती है। मौलवी की पढ़ाई करने के दौरान आतंकी अब्दुल्ला ने मदरसों को छिपने की सबसे आसान जगह मान लिया था। जहां भी गया, वहां मदरसों में विद्यार्थी बनकर पहुंचा और परदे के पीछे अपना काम करता रहा। मदरसे के शिक्षक हैरानी भरे लफ्जों में कहते हैं कि अल्लाह का शुक्र है कि वह यहां से चला गया। उसकी कोई गतिविधि मदरसे में नहीं रही। नमाजी-परहेजी के तौर पर समय गुजारता था। मदरसे के मोहतमिम कारी नईम, अब्दुल कय्यूम के साथ अन्य शिक्षक कहते हैं कि जो देश का दुश्मन है, वह सबका दुश्मन है। दहशतगर्द कभी मुसलमान नहीं हो सकता है। कुरान-ए-मजीद और दीन में दहशतगर्दों के लिए कोई जगह नहीं है। उधर, मदरसे में रहकर बांग्लादेशी आतंकी अब्दुल्ला ने फर्जी नाम-पते से पढ़ाई की। वर्ष 2012 से 2013 तक मदरसे में दीन, जिंदगी जीने का तरीकों के साथ आतंकी ने कई अन्य पहलुओं को भी बारीकी से सीखा था। अब्दुल्ला ने मदरसे में 27 सितंबर 2012 को बृहस्पतिवार के दिन प्रवेश किया था, जबकि 19 जून 2013 बुधवार को मदरसा छोड़ दिया था।
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निकाहनामा से लेकर तकरीर तक का हुनर जाना
मुजफ्फरनगर। सरवट के महमूदिया मदरसे में आतंकी अब्दुल्ला ने निकाह पढ़ाना, तलाक के अरकान, दुनियावी स्तर पर दीन के मुताबिक खरीद-फरोख्त करने के साथ तकरीर करने का हुनर महज 22 से 23 साल की उम्र में सीख लिया था। इसके अलावा भी उच्च वर्ग के आलिमों द्वारा लिखी गई किताबों को पढऩा उसका शौक था।
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25 छात्रों में 18वें रोल नंबर पर था आतंकी
मुजफ्फरनगर। मदरसे के रिकार्ड में मोहम्मद अब्दुल के नाम से दर्ज आतंकी अब्दुल्ला अल मॉमून के साथ 25 अन्य छात्र भी पढ़ाई कर रहे थे, जिसमें उसका रोल नंबर 18वां था। हालांकि मदरसे के रिकार्ड में उसकी कोई आईडी नहीं मिली है।
मदरसे में यह पेपर दिए थे आतंकी ने
क्रम संख्या-------तिथि--------विषय
पहला पेपर------12-06-2013---हिदायत
दूसरा पेपर-----12-06-2013--मुक्तश्अर उल माआनी
तीसरा पेपर-----13-06-2013--मकांमआत-ए-हरीरी
चौथा पेपर------15-06-2013--नूरुउल अनवर
पांचवा पेपर-----16-06-2013---सुल्लमुल उलूम
छठा पेपर-------16-06-2013---तकरीर
सातवां पेपर------19-06-2013---तर्जुमा-ए-कुरान मजीद
(12 और 16 जून को सुबह-शाम की पाली में एग्जाम हुए थे।)