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जिले में पैदा हुई दंगों के बाद जैसी स्थिति
Updated Sun, 08 Apr 2018 12:48 AM IST
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गांवों में दबिश से दलितों में एकजुटता बढ़ी
मुजफ्फरनगर। दलितों के भारत बंद के दौरान हुए बवाल के बाद जिले में दंगों के बाद जैसी स्थिति पैदा हो गई है। पुलिस उपद्रव प्रकरण में अब तक 41 मुकदमे दर्ज कर चुकी है। 87 आरोपियों को जेल भेज चुकी है। दंगे के बाद यह पहला मामला है, जिसमें इतने मुकदमे, नामजदगी और गिरफ्तारी हुई है। कई गांवों में महिलाओं ने प्रदर्शन कर पुलिस की दबिश का विरोध भी किया है। पुलिस की कार्रवाई के बाद दलितों की एकजुटता बढ़ती दिखाई दे रही है।प्रदेश सरकार ने दंगों की तरह ही इस मामले की जांच भी एसआईटी को सौंप दी है।
वर्ष 2013 में जिले में हुए दंगे ने देश की सियासत बदल दी थी। दंगों के दौरान जिले में 500 से अधिक मुकदमे दर्ज हुए थे और हजारों लोगों की गिरफ्तारियां हुई थी। भाजपा ने सपा सरकार पर झूठे मुकदमे दर्ज कराने का आरोप लगाकर पूरे देश में एक माहौल बनाने का काम किया। भाजपा की केंद्र में सरकार बनी। प्रदेश में भी सपा की हार और भाजपा की विजय हुई। दंगों ने देश की राजनीति का रुख ही बदल डाला। जिले में दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान दलितों ने प्रदर्शन कर बाजार बंद कराए। बाजार बंद को लेकर उनका व्यापारियों से कई स्थानों पर टकराव हुआ, रेलवे स्टेशन पर पुलिस और प्रदर्शनकारी आपस में भिड़े। प्रदर्शन उपद्रव में बदल गया। इस दौरान गादला के दलित अमरेश की मौत हो गई। एक रोडवेज सहित कई वाहनों में आग लगा दी गई। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए। इस बवाल के बाद जिला प्रशासन ने सख्ती करते हुए अब तक 41 मुकदमे दर्ज किए हैं। इसमें पुलिस विभाग, व्यापारियों और वाहन स्वामियों की ओर से मुकदमे हुए हैं। 87 प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी पुलिस जिलेभर से कर चुकी है। गांवों में लगातार दलितों के घरों पर दबिश दी जा रही है। प्रदेश सरकार ने दंगों की तर्ज पर ही बवाल के मुकदमों की जांच के लिए अलग से एसआईटी का गठन किया है। पुलिस की कार्रवाई के बाद दलितों की एकजुटता बढ़ती दिखाई दे रही है। दंगे के बाद जिले में जिस तरह राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई थी, उसी तरह के हालात बनते दिख रहे हैं। इस बवाल के बाद भी सियासत क्या रंग दिखाएगी यह समय बताएगा।
55 प्रतिशत है दलित-मुस्लिम
मुजफ्फरनगर। जिले में मुस्लिमों की संख्या 38 प्रतिशत है। दलितों की संख्या लगभग 17 प्रतिशत है। इन दोनों की संख्या लगभग 55 प्रतिशत है। दलितों की कुछ जातियां वाल्मीकि, खटीक, हिंदू जुलाहा, धोबी भाजपा का परंपरागत वोट रही है। उपद्रव के बाद के हालातों पर सबकी नजर टिकी है।
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मुजफ्फरनगर। दलितों के भारत बंद के दौरान हुए बवाल के बाद जिले में दंगों के बाद जैसी स्थिति पैदा हो गई है। पुलिस उपद्रव प्रकरण में अब तक 41 मुकदमे दर्ज कर चुकी है। 87 आरोपियों को जेल भेज चुकी है। दंगे के बाद यह पहला मामला है, जिसमें इतने मुकदमे, नामजदगी और गिरफ्तारी हुई है। कई गांवों में महिलाओं ने प्रदर्शन कर पुलिस की दबिश का विरोध भी किया है। पुलिस की कार्रवाई के बाद दलितों की एकजुटता बढ़ती दिखाई दे रही है।प्रदेश सरकार ने दंगों की तरह ही इस मामले की जांच भी एसआईटी को सौंप दी है।
वर्ष 2013 में जिले में हुए दंगे ने देश की सियासत बदल दी थी। दंगों के दौरान जिले में 500 से अधिक मुकदमे दर्ज हुए थे और हजारों लोगों की गिरफ्तारियां हुई थी। भाजपा ने सपा सरकार पर झूठे मुकदमे दर्ज कराने का आरोप लगाकर पूरे देश में एक माहौल बनाने का काम किया। भाजपा की केंद्र में सरकार बनी। प्रदेश में भी सपा की हार और भाजपा की विजय हुई। दंगों ने देश की राजनीति का रुख ही बदल डाला। जिले में दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान दलितों ने प्रदर्शन कर बाजार बंद कराए। बाजार बंद को लेकर उनका व्यापारियों से कई स्थानों पर टकराव हुआ, रेलवे स्टेशन पर पुलिस और प्रदर्शनकारी आपस में भिड़े। प्रदर्शन उपद्रव में बदल गया। इस दौरान गादला के दलित अमरेश की मौत हो गई। एक रोडवेज सहित कई वाहनों में आग लगा दी गई। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए। इस बवाल के बाद जिला प्रशासन ने सख्ती करते हुए अब तक 41 मुकदमे दर्ज किए हैं। इसमें पुलिस विभाग, व्यापारियों और वाहन स्वामियों की ओर से मुकदमे हुए हैं। 87 प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी पुलिस जिलेभर से कर चुकी है। गांवों में लगातार दलितों के घरों पर दबिश दी जा रही है। प्रदेश सरकार ने दंगों की तर्ज पर ही बवाल के मुकदमों की जांच के लिए अलग से एसआईटी का गठन किया है। पुलिस की कार्रवाई के बाद दलितों की एकजुटता बढ़ती दिखाई दे रही है। दंगे के बाद जिले में जिस तरह राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई थी, उसी तरह के हालात बनते दिख रहे हैं। इस बवाल के बाद भी सियासत क्या रंग दिखाएगी यह समय बताएगा।
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55 प्रतिशत है दलित-मुस्लिम
मुजफ्फरनगर। जिले में मुस्लिमों की संख्या 38 प्रतिशत है। दलितों की संख्या लगभग 17 प्रतिशत है। इन दोनों की संख्या लगभग 55 प्रतिशत है। दलितों की कुछ जातियां वाल्मीकि, खटीक, हिंदू जुलाहा, धोबी भाजपा का परंपरागत वोट रही है। उपद्रव के बाद के हालातों पर सबकी नजर टिकी है।
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