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किस्मत ने साथ दिया और मंत्री बन गए संजीव
Muzaffar nagar
Updated Tue, 27 May 2014 05:33 AM IST
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मुजफ्फरनगर। नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल हुए डॉ. संजीव बालियान ने कई मायनों में इतिहास रचा है। सियासी करियर में पहला चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत हासिल हुई। किस्मत ने बखूबी साथ दिया। दंगे से ऐन पहले संजीव की गिरफ्तारी हुई। जेल में रहते उनके गांव में जबरदस्त हिंसा हुई, जिसमें आठ लोग मारे गए। गांव में सौ से ज्यादा लोग नामजद हुए।
शाहपुर का कुटबा गांव अब डॉ. संजीव बालियान के नाम से जाना जाने लगा है। 42 साल के संजीव की दो साल पहले भाजपा में सक्रियता बढ़ी। इसके बाद अपने गांव कुटबा में नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह की रैली कराकर उन्होंने प्रत्याशी बनने का दावा किया। पांच सितंबर को कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। सात सितंबर को जिलेभर में दंगा भड़का और सबसे ज्यादा मार-काट संजीव के गांव कुटबा में हुई। यहां आठ लोग मारे गए। सेना ने गांव से दूसरे समुदाय के लोगों को सुरक्षित निकालकर राहत शिविरों में पहुंचाया। कुटबा की हिंसा में सौ से ज्यादा लोगों की नामजदगी हुई। यह माना जाता रहा है कि अगर संजीव बालियान की गिरफ्तारी नहीं होती तो दंगों में उनका फंसना तय था। पुलिस की कार्रवाई बालियान की ढाल बन गई। दंगों के बाद जेल से रिहाई के बाद संजीव ने मुकदमों में फंसे लोगों के लिए लड़ाई लड़ी। संजीव ने खुद कंप्यूटर और प्रिंटर ले जाकर गांव-गांव में लोगों के शपथपत्र बनवाए और जांच आयोग के समक्ष प्रस्तुत कराए। यही वजह रही कि संजीव की मजबूत पकड़ होने पर पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाया। हालांकि यह राह भी आसान नहीं थी। पार्टी की गुटबाजी के चलते कुछ वरिष्ठ नेताओं ने टिकट को लेकर हाईकमान के कान भरे, लेकिन संजीव की किस्मत ने यहां भी साथ दिया और अंतत: टिकट पाने में कामयाब हो गए।
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शाहपुर का कुटबा गांव अब डॉ. संजीव बालियान के नाम से जाना जाने लगा है। 42 साल के संजीव की दो साल पहले भाजपा में सक्रियता बढ़ी। इसके बाद अपने गांव कुटबा में नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह की रैली कराकर उन्होंने प्रत्याशी बनने का दावा किया। पांच सितंबर को कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। सात सितंबर को जिलेभर में दंगा भड़का और सबसे ज्यादा मार-काट संजीव के गांव कुटबा में हुई। यहां आठ लोग मारे गए। सेना ने गांव से दूसरे समुदाय के लोगों को सुरक्षित निकालकर राहत शिविरों में पहुंचाया। कुटबा की हिंसा में सौ से ज्यादा लोगों की नामजदगी हुई। यह माना जाता रहा है कि अगर संजीव बालियान की गिरफ्तारी नहीं होती तो दंगों में उनका फंसना तय था। पुलिस की कार्रवाई बालियान की ढाल बन गई। दंगों के बाद जेल से रिहाई के बाद संजीव ने मुकदमों में फंसे लोगों के लिए लड़ाई लड़ी। संजीव ने खुद कंप्यूटर और प्रिंटर ले जाकर गांव-गांव में लोगों के शपथपत्र बनवाए और जांच आयोग के समक्ष प्रस्तुत कराए। यही वजह रही कि संजीव की मजबूत पकड़ होने पर पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाया। हालांकि यह राह भी आसान नहीं थी। पार्टी की गुटबाजी के चलते कुछ वरिष्ठ नेताओं ने टिकट को लेकर हाईकमान के कान भरे, लेकिन संजीव की किस्मत ने यहां भी साथ दिया और अंतत: टिकट पाने में कामयाब हो गए।
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