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Moradabad News: डेढ़ सौ साल से ज्यादा पुराना है ठाकुरद्वारा की रामलीला का इतिहास
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ठाकुरद्वारा। नवरात्र और दशहरे की तैयारियों के बीच रामलीला की हलचल भी माहौल में नजर आने लगी है। मथुरा-वृंदावन के कलाकार आने वाले दिनों में मंचन करते नजर आएंगे। अतीत पर निगाह डालें तो ठाकुरद्वारा में रामलीला मंचन का इतिहास 176 साल पुराना है। अंग्रेजी हुकूमत के दौर से नगर में शुरू हुए रामलीला मंचन का क्रम कोरोना काल को छोड़कर लगातार जारी है। वक्त के साथ पीढ़ियां बदलीं, कलाकार बदले, मंचन का स्थान और तरीका बदला लेकिन राम और उनकी लीला के प्रति आस्था भाव पूर्ववत है।
नगर के सनातन धर्म हिंदू इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य और ठाकुरद्वारा के इतिहास पर लिखने वाले डॉ.अजय कुमार अग्रवाल बताते हैं कि यहां वर्ष 1850 से रामलीला की शुरुआत हुई थी। उस दौर के क्षेत्र के संपन्न लोगों ने रामलीला की शुरुआत में बढ़-चढ़कर योगदान दिया था। एेसे लोगों में सबसे बड़ा नाम साहू राम रघुवीर का था, जिनके परिवार ने लाल बाग मोहल्ले में करीब एक बीघा जमीन रामलीला मंचन के लिए दी थी। यही नहीं साहू राम रघुवीर ने 1890 में भारत थिएटर नाम से स्थानीय कलाकारों की नाटक मंडली बनाई थी। यह मंडली मंचन के लिए नए कलाकार तैयार करने में भी भूमिका निभाती थी।
अग्रवाल बताते हैं कि उस समय रामलीला के आयोजन का खर्च साहू परिवार के सीताराम, बृजपाल सरन, हरीराज सरन उठाते थे। बाद में रामलीला के लिए साहू परिवार द्वारा दी गई भूमि का प्रयोग मेले के आयोजन के लिए होने लगा।
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इस पर स्वर्गीय हरि कुमार त्रिपाठी के परिसर की उस भूमि पर रामलीला मंचन का सिलसिला चला, जहां बाद में में सेंट्रल बैंक स्थापित हुआ। इसके बाद पूठिया परिवार आगे आया और उनकी जगह पर रामलीला मंचन होने लगा। वर्तमान में जहां रामलीला होती है वह जगह पंडित रामसुख नागर की है। उन्होंने इस स्थान पर नेत्र चिकित्सालय स्थापित कराया था। यह चिकित्सालय बंद हो जाने के बाद उसी भूमि पर रामलीला मंचन शुरू हो गया। अब 30 साल से लगातार इसी स्थान पर रामलीला मंचन होता आ रहा है। हालांकि पालिका के रिकॉर्ड में यह जमीन अब भी चिकित्सालय के नाम पर ही दर्ज है। पुराने दौर में रामलीला कराने की जिम्मेदारी उस समय के बड़े व्यापारी स्वर्गीय लाला शिव शंकर अग्रवाल और वरिष्ठ अधिवक्ता नरेश कुमार पूठिया (अब दिवंगत) के पास थी।
ठाकुरद्वारा में रामलीला मंचन में अभिनय का जिम्मा 1890 से 1990 तक स्थानीय कलाकारों ने ही निभाया। इससे पहले यहां पर बनारस की नाटक मंडली अभिनय के लिए आती थी। पिछले करीब 35 वर्ष से ठाकुरद्वारा में मंचन के लिए मथुरा और वृंदावन के कलाकार आ रहे हैं। इस वर्ष भी यही कलाकार रामलीला मंचन में मुख्य किरदार के रूप में नजर आएंगे। समय के साथ मंचन का स्थान और कलाकार बदले तो तकनीक के प्रयोग और लाइटिंग की नवीनता ने रामलीला प्रस्तुति को और आकर्षक बना दिया है।
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दूसरे शहरों तक किया ठाकुरद्वारा का नाम
डॉ.अजय कुमार अग्रवाल बताते हैं कि पुराने दौर में रामलीला मंचन करने वाले ठाकुरद्वारा के कई कलाकारों ने दूसरे शहरों तक में अभिनय और प्रस्तुति के तरीके से धाक जमाई थी। एक बार स्थानीय कलाकारों ने दिल्ली में मंचन से श्रेष्ठ रामलीला प्रस्तुति का पुरस्कार जीता था। साल 1941 में गंगा तट पर लगने वाले तिगरी मेले में ठाकुरद्वारा की रामलीला को प्रदेश की कई टीमों के बीच प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था। वाराणसी में भी ठाकुरद्वारा की रामलीला ने तारीफ हासिल की थी। स्वर्गीय हरि कुमार त्रिपाठी के निर्देशन में सर्वश्रेष्ठ मंचन करने पर ठाकुरद्वारा के कलाकारों को वाराणसी में मेडल मिला था।
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राम के किरदार से आईजी पुलिस तक का सफर
एक समय ठाकुरद्वारा के रामलीला मंच पर प्रभु राम का किरदार निभाने वाले जीवन चंद पांडे (अब दिवंगत) बाद में उत्तराखंड पुलिस में आईजी के ओहदे तक पहुंचे थे। ठाकुरद्वारा में ही रह रहे उनके परिजनों ने बताया कि 1977 में जीवन चंद पांडे प्रतियोगी परीक्षा पास करके यूपी पुलिस में डिप्टी एसपी बन गए। नवंबर 2000 में उत्तराखंड के गठन के समय वह नैनीताल के एसएसपी थे। इसके बाद उन्होंने अपनी पूरी सर्विस उत्तराखंड में ही की। बाद में क्रमवार डीआईजी और फिर आईजी की कुर्सी भी संभाली।
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मंच के परशुराम बाद में निर्वाचित हुए पालिकाध्यक्ष
ठाकुरद्वारा की रामलीला में परशुराम की भूमिका निभाने वाले अधिवक्ता स्वर्गीय नरेश कुमार पूठिया को वर्ष 1989 के निकाय चुनाव में ठाकुरद्वारा की जनता ने नगर पालिकाध्यक्ष की कुर्सी के लिए चुना। अब भी कुछ लोग उनकी परशुराम रूपी भूमिका को याद करते हैं तो कुछ उनके पालिकाध्यक्ष के कार्यकाल की चर्चा करते हैं। पुराने समय की रामलीला के कलाकारों में हनुमान के रूप में रामदत्त शर्मा, लक्ष्मण बनने वाले मनोज कुमार अग्रवाल, अरुण सक्सेना, भुवन चंद पांडे, रावण की भूमिका निभा चुके मगनलाल जोशी और रमाशंकर सक्सेना, अंगद बनने वाले उमेश चंद संत, राम की भूमिका में राजेंद्र चंद्र पांडे, मेघनाद बनते रहे विजयपाल सिंह को आज भी याद किया जाता है। पुराने दौर की चर्चा में किशन लाल सक्सेना उर्फ गड़बड़ दास और हुकुम पहलवान की कॉमेडी की भी मिसाल दी जाती है।
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पांडे परिवार ने निभाए थे कई किरदार
मंच पर राम की भूमिका से अभियन शुरू करके बाद में उत्तराखंड पुलिस में आईजी का जिम्मा संभालने वाले जीवन चंद पांडे परिवार में अकेले नहीं थे, जिन्हें रामलीला से लगाव था। स्थानीय लोग बताते हैं कि ठाकुरद्वारा में रामलीला मंचन के लंबे सिलसिले में पांडे परिवार का भी बड़ा योगदान रहा है। उनके छोटे भाई नगर पालिका के पूर्व सभासद राजेंद्र चंद पांडे ने बताया कि सबसे बड़े भाई की पुलिस में नौकरी लग जाने के बाद उन्होंने (राजेंद्र पांडे) और उनसे बड़े भाई भुवन चंद पांडे ने भी रामलीला पात्रों की भूमिकाएं निभाईं। यही नहीं, उनके ताऊ स्वर्गीय जनार्दन दत्त पांडे रामलीला कमेटी के प्रबंधक भी रहे थे। उन्होंने बताया कि पुराने दौर में ज्यादातर लोग जमीन पर बैठकर रामलीला मंचन देखते थे। इसमें बहुत आनंद आता था। बाद में कुर्सी पर बैठकर रामलीला देखने का दौर आया तो कुर्सी वालों को पैसे देकर टिकट लेना पड़ता था। राजेंद्र पांडे ने बताया कि उन्होंने 17 वर्ष तक लगातार रामलीला में अभिनय किया है।
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नगर के सनातन धर्म हिंदू इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य और ठाकुरद्वारा के इतिहास पर लिखने वाले डॉ.अजय कुमार अग्रवाल बताते हैं कि यहां वर्ष 1850 से रामलीला की शुरुआत हुई थी। उस दौर के क्षेत्र के संपन्न लोगों ने रामलीला की शुरुआत में बढ़-चढ़कर योगदान दिया था। एेसे लोगों में सबसे बड़ा नाम साहू राम रघुवीर का था, जिनके परिवार ने लाल बाग मोहल्ले में करीब एक बीघा जमीन रामलीला मंचन के लिए दी थी। यही नहीं साहू राम रघुवीर ने 1890 में भारत थिएटर नाम से स्थानीय कलाकारों की नाटक मंडली बनाई थी। यह मंडली मंचन के लिए नए कलाकार तैयार करने में भी भूमिका निभाती थी।
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अग्रवाल बताते हैं कि उस समय रामलीला के आयोजन का खर्च साहू परिवार के सीताराम, बृजपाल सरन, हरीराज सरन उठाते थे। बाद में रामलीला के लिए साहू परिवार द्वारा दी गई भूमि का प्रयोग मेले के आयोजन के लिए होने लगा।
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इस पर स्वर्गीय हरि कुमार त्रिपाठी के परिसर की उस भूमि पर रामलीला मंचन का सिलसिला चला, जहां बाद में में सेंट्रल बैंक स्थापित हुआ। इसके बाद पूठिया परिवार आगे आया और उनकी जगह पर रामलीला मंचन होने लगा। वर्तमान में जहां रामलीला होती है वह जगह पंडित रामसुख नागर की है। उन्होंने इस स्थान पर नेत्र चिकित्सालय स्थापित कराया था। यह चिकित्सालय बंद हो जाने के बाद उसी भूमि पर रामलीला मंचन शुरू हो गया। अब 30 साल से लगातार इसी स्थान पर रामलीला मंचन होता आ रहा है। हालांकि पालिका के रिकॉर्ड में यह जमीन अब भी चिकित्सालय के नाम पर ही दर्ज है। पुराने दौर में रामलीला कराने की जिम्मेदारी उस समय के बड़े व्यापारी स्वर्गीय लाला शिव शंकर अग्रवाल और वरिष्ठ अधिवक्ता नरेश कुमार पूठिया (अब दिवंगत) के पास थी।
ठाकुरद्वारा में रामलीला मंचन में अभिनय का जिम्मा 1890 से 1990 तक स्थानीय कलाकारों ने ही निभाया। इससे पहले यहां पर बनारस की नाटक मंडली अभिनय के लिए आती थी। पिछले करीब 35 वर्ष से ठाकुरद्वारा में मंचन के लिए मथुरा और वृंदावन के कलाकार आ रहे हैं। इस वर्ष भी यही कलाकार रामलीला मंचन में मुख्य किरदार के रूप में नजर आएंगे। समय के साथ मंचन का स्थान और कलाकार बदले तो तकनीक के प्रयोग और लाइटिंग की नवीनता ने रामलीला प्रस्तुति को और आकर्षक बना दिया है।
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दूसरे शहरों तक किया ठाकुरद्वारा का नाम
डॉ.अजय कुमार अग्रवाल बताते हैं कि पुराने दौर में रामलीला मंचन करने वाले ठाकुरद्वारा के कई कलाकारों ने दूसरे शहरों तक में अभिनय और प्रस्तुति के तरीके से धाक जमाई थी। एक बार स्थानीय कलाकारों ने दिल्ली में मंचन से श्रेष्ठ रामलीला प्रस्तुति का पुरस्कार जीता था। साल 1941 में गंगा तट पर लगने वाले तिगरी मेले में ठाकुरद्वारा की रामलीला को प्रदेश की कई टीमों के बीच प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था। वाराणसी में भी ठाकुरद्वारा की रामलीला ने तारीफ हासिल की थी। स्वर्गीय हरि कुमार त्रिपाठी के निर्देशन में सर्वश्रेष्ठ मंचन करने पर ठाकुरद्वारा के कलाकारों को वाराणसी में मेडल मिला था।
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राम के किरदार से आईजी पुलिस तक का सफर
एक समय ठाकुरद्वारा के रामलीला मंच पर प्रभु राम का किरदार निभाने वाले जीवन चंद पांडे (अब दिवंगत) बाद में उत्तराखंड पुलिस में आईजी के ओहदे तक पहुंचे थे। ठाकुरद्वारा में ही रह रहे उनके परिजनों ने बताया कि 1977 में जीवन चंद पांडे प्रतियोगी परीक्षा पास करके यूपी पुलिस में डिप्टी एसपी बन गए। नवंबर 2000 में उत्तराखंड के गठन के समय वह नैनीताल के एसएसपी थे। इसके बाद उन्होंने अपनी पूरी सर्विस उत्तराखंड में ही की। बाद में क्रमवार डीआईजी और फिर आईजी की कुर्सी भी संभाली।
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मंच के परशुराम बाद में निर्वाचित हुए पालिकाध्यक्ष
ठाकुरद्वारा की रामलीला में परशुराम की भूमिका निभाने वाले अधिवक्ता स्वर्गीय नरेश कुमार पूठिया को वर्ष 1989 के निकाय चुनाव में ठाकुरद्वारा की जनता ने नगर पालिकाध्यक्ष की कुर्सी के लिए चुना। अब भी कुछ लोग उनकी परशुराम रूपी भूमिका को याद करते हैं तो कुछ उनके पालिकाध्यक्ष के कार्यकाल की चर्चा करते हैं। पुराने समय की रामलीला के कलाकारों में हनुमान के रूप में रामदत्त शर्मा, लक्ष्मण बनने वाले मनोज कुमार अग्रवाल, अरुण सक्सेना, भुवन चंद पांडे, रावण की भूमिका निभा चुके मगनलाल जोशी और रमाशंकर सक्सेना, अंगद बनने वाले उमेश चंद संत, राम की भूमिका में राजेंद्र चंद्र पांडे, मेघनाद बनते रहे विजयपाल सिंह को आज भी याद किया जाता है। पुराने दौर की चर्चा में किशन लाल सक्सेना उर्फ गड़बड़ दास और हुकुम पहलवान की कॉमेडी की भी मिसाल दी जाती है।
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पांडे परिवार ने निभाए थे कई किरदार
मंच पर राम की भूमिका से अभियन शुरू करके बाद में उत्तराखंड पुलिस में आईजी का जिम्मा संभालने वाले जीवन चंद पांडे परिवार में अकेले नहीं थे, जिन्हें रामलीला से लगाव था। स्थानीय लोग बताते हैं कि ठाकुरद्वारा में रामलीला मंचन के लंबे सिलसिले में पांडे परिवार का भी बड़ा योगदान रहा है। उनके छोटे भाई नगर पालिका के पूर्व सभासद राजेंद्र चंद पांडे ने बताया कि सबसे बड़े भाई की पुलिस में नौकरी लग जाने के बाद उन्होंने (राजेंद्र पांडे) और उनसे बड़े भाई भुवन चंद पांडे ने भी रामलीला पात्रों की भूमिकाएं निभाईं। यही नहीं, उनके ताऊ स्वर्गीय जनार्दन दत्त पांडे रामलीला कमेटी के प्रबंधक भी रहे थे। उन्होंने बताया कि पुराने दौर में ज्यादातर लोग जमीन पर बैठकर रामलीला मंचन देखते थे। इसमें बहुत आनंद आता था। बाद में कुर्सी पर बैठकर रामलीला देखने का दौर आया तो कुर्सी वालों को पैसे देकर टिकट लेना पड़ता था। राजेंद्र पांडे ने बताया कि उन्होंने 17 वर्ष तक लगातार रामलीला में अभिनय किया है।