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-5 डिग्री की ठंड में एमबीबीएस के छात्रों ने फर्श पर बैठकर गुजारी रात
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युक्रेन से भारत के लिए रवाना होते छात्र छात्राएं व भारतीय नागरीक। संवाद
- फोटो : CITY
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मुरादाबाद। यूक्रेन में फंसे मुरादाबाद के बच्चों ने माइनस पांच डिग्री सेल्सियस में ठंडे फर्श पर बैठकर रात बिताई है। भूख-प्यास से बेहाल बच्चे खुद को सुरक्षित रखने के लिए बंकर और बॉर्डर की ओर दौड़ लगा रहे हैं। बच्चों का कहना है कि उन्होंने मिसाइल से बम बरसते हुए अपनी आंखों से देखे हैं। दहशत का मंजर उनके हौसलों को पस्त कर रहा है। खाने के लिए बिस्कुट और एक बोतल पानी ही साथ है। अब उन्हें दूतावास से ही उम्मीद है, ताकि वह सकुशल अपने देश लौट सकें।
अवंतिका निवासी निमिष सक्सेना के पिता प्रदीप सक्सेना ने बताया कि शुक्रवार की रात सात बजे सायरन बजते ही छात्रों ने खुद को सुरक्षित रखने के लिए बंकर की ओर दौड़ लगा दी थी। इस जल्दबाजी में वह खाना लेना भी भूल गए थे। निमिष के पास आधी बोतल पानी था। दो किलोमीटर की दौड़ लगाने के बाद वह बंकर में पहुंचे। यूक्रेन का तापमान माइनस पांच डिग्री सेल्सियस है। ठिठुरन भरी रात को उन्होंने ठंडे फर्श पर बैठकर बिताई है। पूरी रात दहशत में गुजरी है। सुबह सात बजे पुलिस के कहने पर वह वापस हॉस्टल लौटे, लेकिन खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी। साथ के सभी चार-पांच बच्चों ने एक-एक अंडा उबालकर वही खाया है। पूरा दिन वह दूतावास के निर्देशों का इंतजार करते रहे। उन्हें रोमानिया बॉर्डर पर ले जाने के लिए बसों की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन वहां के एजेंटों ने बच्चों ने सात से आठ हजार रुपये भी ले लिए हैं। वह बॉर्डर पर कब तक पहुंचेंगे और फ्लाइट कब मिलेगी, इसकी कोई जानकारी नहीं है। भोजन का भी कोई इंतजाम नहीं है।
शीतलहर में 40 किलोमीटर पैदलकर चलकर पहुंचे कैफे
मुरादाबाद। चंदौसी के रजत जोहान ने बताया कि वह लवीव शहर में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्र हैं। उनके साथ सहारनपुर निवासी पारस सिंह भी है। उन्होंने बताया कि पोलैंड बॉर्डर पर भारतीयों को वीजा नहीं दिया जा रहा है। वहां पर पहले नाइजीरिया और इजिप्टिशियन और यूक्रेन के स्थानीय लोगों को वीजा दे रहे हैं। दोनों छात्र दूतावास के निर्देश पर शुक्रवार शाम चार बजे छात्रावास से निकले थे, लेकिन बॉर्डर से पहले ही जाम लगा हुआ है। ठंडी तेज हवा के बीच सामान को खींचते हुए वह पैदल ही बॉर्डर के लिए निकले। 40 किलोमीटर पैदल चलने के बाद वह एक कैफे में पहुंचे। कड़ाके की ठंड की वजह से हाथ और पैर सुन्न पड़ने लगे हैं। यहां से भी बॉर्डर 12 किलोमीटर दूर है। कैफे की संचालिका ने उन्हें खाना खिलाया। जब उन्होंने रुपये देना चाहा तो महिला ने रुपये नहीं लिए। रात उन्होंने कैफे में बैठकर ठिठुरते हुए बिताई। सुबह छह बजे दिन का खाना देने के बाद महिला उन्हें वहीं पास में एक स्कूल में बने शेल्टर होम में पहुंचा गई। उन्होंने बताया कि दस छात्रों का ग्रुप है। हालात बहुत खराब हो रहे हैं। बॉर्डर से उन्हें कब और कैसे फ्लाइट मिलेगी, इसकी कोई जानकारी नहीं है। उनके पास अभी खाने के लिए जूस के पैकेट, चिप्स और बिस्किट हैं।
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अवंतिका निवासी निमिष सक्सेना के पिता प्रदीप सक्सेना ने बताया कि शुक्रवार की रात सात बजे सायरन बजते ही छात्रों ने खुद को सुरक्षित रखने के लिए बंकर की ओर दौड़ लगा दी थी। इस जल्दबाजी में वह खाना लेना भी भूल गए थे। निमिष के पास आधी बोतल पानी था। दो किलोमीटर की दौड़ लगाने के बाद वह बंकर में पहुंचे। यूक्रेन का तापमान माइनस पांच डिग्री सेल्सियस है। ठिठुरन भरी रात को उन्होंने ठंडे फर्श पर बैठकर बिताई है। पूरी रात दहशत में गुजरी है। सुबह सात बजे पुलिस के कहने पर वह वापस हॉस्टल लौटे, लेकिन खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी। साथ के सभी चार-पांच बच्चों ने एक-एक अंडा उबालकर वही खाया है। पूरा दिन वह दूतावास के निर्देशों का इंतजार करते रहे। उन्हें रोमानिया बॉर्डर पर ले जाने के लिए बसों की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन वहां के एजेंटों ने बच्चों ने सात से आठ हजार रुपये भी ले लिए हैं। वह बॉर्डर पर कब तक पहुंचेंगे और फ्लाइट कब मिलेगी, इसकी कोई जानकारी नहीं है। भोजन का भी कोई इंतजाम नहीं है।
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शीतलहर में 40 किलोमीटर पैदलकर चलकर पहुंचे कैफे
मुरादाबाद। चंदौसी के रजत जोहान ने बताया कि वह लवीव शहर में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्र हैं। उनके साथ सहारनपुर निवासी पारस सिंह भी है। उन्होंने बताया कि पोलैंड बॉर्डर पर भारतीयों को वीजा नहीं दिया जा रहा है। वहां पर पहले नाइजीरिया और इजिप्टिशियन और यूक्रेन के स्थानीय लोगों को वीजा दे रहे हैं। दोनों छात्र दूतावास के निर्देश पर शुक्रवार शाम चार बजे छात्रावास से निकले थे, लेकिन बॉर्डर से पहले ही जाम लगा हुआ है। ठंडी तेज हवा के बीच सामान को खींचते हुए वह पैदल ही बॉर्डर के लिए निकले। 40 किलोमीटर पैदल चलने के बाद वह एक कैफे में पहुंचे। कड़ाके की ठंड की वजह से हाथ और पैर सुन्न पड़ने लगे हैं। यहां से भी बॉर्डर 12 किलोमीटर दूर है। कैफे की संचालिका ने उन्हें खाना खिलाया। जब उन्होंने रुपये देना चाहा तो महिला ने रुपये नहीं लिए। रात उन्होंने कैफे में बैठकर ठिठुरते हुए बिताई। सुबह छह बजे दिन का खाना देने के बाद महिला उन्हें वहीं पास में एक स्कूल में बने शेल्टर होम में पहुंचा गई। उन्होंने बताया कि दस छात्रों का ग्रुप है। हालात बहुत खराब हो रहे हैं। बॉर्डर से उन्हें कब और कैसे फ्लाइट मिलेगी, इसकी कोई जानकारी नहीं है। उनके पास अभी खाने के लिए जूस के पैकेट, चिप्स और बिस्किट हैं।
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