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Moradabad News: कुपोषण...हर दिन तीन मासूमों को चढ़ाना पड़ रहा खून
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मुरादाबाद। ठीक से देखभाल न होने और पौष्टिक आहार न मिलने का असर यह है कि जिला अस्पताल में आने वाले हर दूसरे बच्चे का वजन कम है। कुपोषण के कारण बच्चों में खून की कमी हो रही है। जिला अस्पताल में हर दिन औसतन तीन बच्चों को खून चढ़ाना पड़ रहा है, जबकि इन्हें कोई और बीमारी नहीं है। दो माह में 183 बच्चों को खून चढ़ाया जा चुका है।
जिले में हर माह 3000 कुपोषित बच्चे चिह्नित हो रहे हैं। मुरादाबाद शहर में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा है। इसके बाद दलपतपुर, डिलारी, भगतपुर टांडा व मूंढापांडे का नाम है। जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र में भी सभी बेड भरे रहते हैं। ऐसे बच्चों को 14 दिन तक निगरानी में रखकर पोषक आहार दिया जा रहा है। वजन सामान्य होने पर छुट्टी कर दी जाती है और हर 15 दिन बाद चेकअप के लिए बुलाया जाता है।
डॉक्टरों का मानना है कि खून की कमी का कारण गर्भावस्था से जुड़ा है। महिला अस्पताल में पिछले पांच महीने में पैदा हुए हर चौथे बच्चे का वजन कम निकला है। डॉक्टर औसत वजन 2.5 से 2.8 किलो के बीच मानते हैं, जबकि इन बच्चों का वजन 2.5 किलो से भी कम रहा। एक बच्चे के बाद दूसरे प्रसव में तीन साल का अंतर न रखने से भी ऐसे मामले सामने आए हैं।
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वहीं माता के सीवियर एनीमिक होने के कारण बच्चों में भी यह खतरा बना रहता है। गर्भावस्था में महिलाएं आयरन व कैल्शियम युक्त आहार नहीं लेती हैं तो बच्चे का वजन प्रभावित होता है। जिला अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार कम वजन वाले तमाम बच्चे जन्म के पांच साल बाद तक कुपोषण से जूझते रहते हैं। इन्हें निमोनिया व डायरिया की बीमारी आसानी से हो जाती है। बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि कुपोषित बच्चों में ऑक्सीजन लेवल कम होने का खतरा भी बना रहता है। इसके अलावा बुखार, पीलिया, निमोनाइटिस का खतरा रहता है।
डाइट में शामिल करें यह आहार
सूखे मेवे
दूध व दूध से बने उत्पाद
पालक समेत सभी हरी पत्तेदार सब्जियां
उबले हुए अंडे का सफेद हिस्सा
साबुत अनाज व इसके उत्पाद
आयरन, कैल्शियम व फाइबर युक्त सभी आहार
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ओपीडी में आने वाले 45 से 50 प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से कम है। कई बच्चे माता-पिता की लापरवाही के कारण कुपोषण से जूझ रहे हैं। हर दिन दो-तीन बच्चों को खून चढ़ाना पड़ता है। पोषण पुनर्वास केंद्र में भी कुपोषित बच्चों को सभी सुविधाएं दी जा रही हैं। - डॉ. राजेंद्र कुमार, चिकित्साधीक्षक
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जिले में हर माह 3000 कुपोषित बच्चे चिह्नित हो रहे हैं। मुरादाबाद शहर में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा है। इसके बाद दलपतपुर, डिलारी, भगतपुर टांडा व मूंढापांडे का नाम है। जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र में भी सभी बेड भरे रहते हैं। ऐसे बच्चों को 14 दिन तक निगरानी में रखकर पोषक आहार दिया जा रहा है। वजन सामान्य होने पर छुट्टी कर दी जाती है और हर 15 दिन बाद चेकअप के लिए बुलाया जाता है।
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डॉक्टरों का मानना है कि खून की कमी का कारण गर्भावस्था से जुड़ा है। महिला अस्पताल में पिछले पांच महीने में पैदा हुए हर चौथे बच्चे का वजन कम निकला है। डॉक्टर औसत वजन 2.5 से 2.8 किलो के बीच मानते हैं, जबकि इन बच्चों का वजन 2.5 किलो से भी कम रहा। एक बच्चे के बाद दूसरे प्रसव में तीन साल का अंतर न रखने से भी ऐसे मामले सामने आए हैं।
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वहीं माता के सीवियर एनीमिक होने के कारण बच्चों में भी यह खतरा बना रहता है। गर्भावस्था में महिलाएं आयरन व कैल्शियम युक्त आहार नहीं लेती हैं तो बच्चे का वजन प्रभावित होता है। जिला अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार कम वजन वाले तमाम बच्चे जन्म के पांच साल बाद तक कुपोषण से जूझते रहते हैं। इन्हें निमोनिया व डायरिया की बीमारी आसानी से हो जाती है। बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि कुपोषित बच्चों में ऑक्सीजन लेवल कम होने का खतरा भी बना रहता है। इसके अलावा बुखार, पीलिया, निमोनाइटिस का खतरा रहता है।
डाइट में शामिल करें यह आहार
सूखे मेवे
दूध व दूध से बने उत्पाद
पालक समेत सभी हरी पत्तेदार सब्जियां
उबले हुए अंडे का सफेद हिस्सा
साबुत अनाज व इसके उत्पाद
आयरन, कैल्शियम व फाइबर युक्त सभी आहार
ओपीडी में आने वाले 45 से 50 प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से कम है। कई बच्चे माता-पिता की लापरवाही के कारण कुपोषण से जूझ रहे हैं। हर दिन दो-तीन बच्चों को खून चढ़ाना पड़ता है। पोषण पुनर्वास केंद्र में भी कुपोषित बच्चों को सभी सुविधाएं दी जा रही हैं। - डॉ. राजेंद्र कुमार, चिकित्साधीक्षक