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भक्त संसार को भगवान मय देखता है
Updated Tue, 10 Jul 2018 01:12 AM IST
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चंदौसी। इस संसार विचित्र है कि इसे जो जिस रुप में देखना चाहता है। यह उसी रुप में दिखाई देने लगता है। इसलिए हम भगवान के रुप संसार को देखना चाहिए। यह सद्विचार कथा व्यास ब्रजेश पाठक ने श्री रामकथा में व्यक्त किए।
सीता रोड स्थित श्री गीता सत्संग भवन में हो रही श्रीराम कथा के अंतिम दिन कथा व्यास ने कहा कि जिसकी आंख में काम बैठा है, उसे सारा संसार स्त्री के रुप में दिखाई पड़ता है। जिसकी आंख में क्रोध है, उसे सारा संसार दुश्मन की तरह दिखाई देता है। जिसकी आंख में लोभ है उसे सारे संसार में धन ही धन दिखाई देता है, लेकिन इस संसार को सही रुप में भगवान का भक्त ही देखता है। क्योंकि उसकी आंखों में भगवान विराजते है। इसलिए उसे सारा संसार भगवानमय दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि आज तक जितने भी भक्त हुए है। उन्होंने अपनी दृष्टि से को भगवान मय ही बनाया है। क्योंकि जब तक यह भाव नहीं बनता है। तब तक न तो व्यवहार पवित्र होता है और न ही हृदय शुद्घ होता है, जो भक्त भक्ति भाव केवल मंदिर में भगवान को दिखाए, वह अधूरी भक्ति है। भक्ति की पूर्णता तो होती है। जब मंदिर के बाहर जन जन में भगवान दिखाईं दें। महाआरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया। कथा में अखिलेश्वर शास्त्री आदि ने सहयोग किया।
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सीता रोड स्थित श्री गीता सत्संग भवन में हो रही श्रीराम कथा के अंतिम दिन कथा व्यास ने कहा कि जिसकी आंख में काम बैठा है, उसे सारा संसार स्त्री के रुप में दिखाई पड़ता है। जिसकी आंख में क्रोध है, उसे सारा संसार दुश्मन की तरह दिखाई देता है। जिसकी आंख में लोभ है उसे सारे संसार में धन ही धन दिखाई देता है, लेकिन इस संसार को सही रुप में भगवान का भक्त ही देखता है। क्योंकि उसकी आंखों में भगवान विराजते है। इसलिए उसे सारा संसार भगवानमय दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि आज तक जितने भी भक्त हुए है। उन्होंने अपनी दृष्टि से को भगवान मय ही बनाया है। क्योंकि जब तक यह भाव नहीं बनता है। तब तक न तो व्यवहार पवित्र होता है और न ही हृदय शुद्घ होता है, जो भक्त भक्ति भाव केवल मंदिर में भगवान को दिखाए, वह अधूरी भक्ति है। भक्ति की पूर्णता तो होती है। जब मंदिर के बाहर जन जन में भगवान दिखाईं दें। महाआरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया। कथा में अखिलेश्वर शास्त्री आदि ने सहयोग किया।
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