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जिले के प्राकृतिक दृश्यों ने बांधा था आचार्य रामचंद्र शुक्ल को
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मिर्जापुर। हिंदी साहित्य के शलाका पुरुष आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म तो बस्ती जिले में हुआ था लेकिन उनकी कर्मस्थली मिर्जापुर ही रही। इस जिले में रहकर उन्होंने साहित्य सृजन किया। वाराणसी में वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय में सेवारत तो थे लेकिन जब उनका मन उद्विग्न हो जाता था तो वह मिर्जापुर चले आते। यहां की प्राकृतिक वादियों में उनका मन रमता और वह तरोताजा होकर पुन: वाराणसी अपनी नौकरी पर चले जाते।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पिता चंद्रबली शुक्ल वर्ष 1893 में हमीरपुर से स्थानांतरित होकर मिर्जापुर तहसील में कानूनगो पद पर आए। उस समय आचार्य की अवस्था नौ वर्ष की थी। उन्होंने एएसजे इंटर कालेज से मिडिल व लंदन मिशन स्कूल (अब बीएलजे इंटर कालेज) से हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। आचार्य शुक्ल का साहित्यिक जीवन चौधरी बद्रीनारायण प्रेमघन के सानिध्य में शुरु हुआ। 16 वर्ष की अवस्था तक पहुंचते- पहुंचते वह साहित्य सृजन करने लगे। उनकी रचनाएं आनंद कादंबिनी व सरस्वती जैसी पत्रिकाओं में छपने लगी। उन्होंने वर्ष 1904 में लंदन मिशन स्कूल से कला अध्यापक की नौकरी शुरू की। वर्ष 1908 में उनको नागरी प्रचारिणी सभा ने हिंदी शब्द सागर के सहायक अध्यापक का कार्यभार सौंपा। उन्होंने 78 हजार चार सौ पांच शब्दों को संकलित किया। मिर्जापुर में रमईपट्टी में उनका निवास था। उन्होंने हिंदी साहित्य की हर प्रकार से सेवा की। चाहे गद्य हो, पद्य हो, समीक्षा, निबंध, कहानी, संपादन आदि क्षेत्रों में उन्होंने अपनी लेखनी चलाई। और जो भी लिखा वह अनुकरणीय हो गया।
इनसेट
विंध्य क्षेत्र में लगता था उनका मन
मिर्जापुर। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मित्रों में भगवान दास हालवा, डा. काशी प्रसाद जायसवाल, लक्ष्मीशंकर मिश्र, बद्रीनाथ गौड़, उमाशंकर द्विवेदी आदि शामिल थे। वे जब मिर्जापुर आते तो विंध्य पर्वत स्थित अष्टभुजा, मां कालीखोह, गेरूआ तालाब, जोगिया, मेहदिया, आमघाट, बरघाट, लुरकिया, टांडा फाल, विंढम फाल, सिद्धनाथ की दरी, बालनाथ आदि जगहों पर जाते और प्रकृति के सानिध्य में चिंतन करते। अब उनके पौत्र राकेश शुक्ला उनके नाम पर एक विद्यालय का संचालन कर रहे हैं। साथ ही समय समय पर साहित्यिक आयोजन कर उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
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इनसेट
जयंती समारोह आज
मिर्जापुर। रमईपट्टी स्थित आचार्य रामचंद्र शुक्ल स्मारक शिक्षण संस्थान में 31 अक्टूबर को उनकी जयंती पर दोपहर तीन बजे जयंती उत्सव का आयोजन किया गया है। यह जानकारी देते हुए संस्थान के प्रबंधक राकेश कुमार शुक्ला ने बताया कि कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डा. अनुज प्रताप सिंह होंगे।
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पिता चंद्रबली शुक्ल वर्ष 1893 में हमीरपुर से स्थानांतरित होकर मिर्जापुर तहसील में कानूनगो पद पर आए। उस समय आचार्य की अवस्था नौ वर्ष की थी। उन्होंने एएसजे इंटर कालेज से मिडिल व लंदन मिशन स्कूल (अब बीएलजे इंटर कालेज) से हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। आचार्य शुक्ल का साहित्यिक जीवन चौधरी बद्रीनारायण प्रेमघन के सानिध्य में शुरु हुआ। 16 वर्ष की अवस्था तक पहुंचते- पहुंचते वह साहित्य सृजन करने लगे। उनकी रचनाएं आनंद कादंबिनी व सरस्वती जैसी पत्रिकाओं में छपने लगी। उन्होंने वर्ष 1904 में लंदन मिशन स्कूल से कला अध्यापक की नौकरी शुरू की। वर्ष 1908 में उनको नागरी प्रचारिणी सभा ने हिंदी शब्द सागर के सहायक अध्यापक का कार्यभार सौंपा। उन्होंने 78 हजार चार सौ पांच शब्दों को संकलित किया। मिर्जापुर में रमईपट्टी में उनका निवास था। उन्होंने हिंदी साहित्य की हर प्रकार से सेवा की। चाहे गद्य हो, पद्य हो, समीक्षा, निबंध, कहानी, संपादन आदि क्षेत्रों में उन्होंने अपनी लेखनी चलाई। और जो भी लिखा वह अनुकरणीय हो गया।
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विंध्य क्षेत्र में लगता था उनका मन
मिर्जापुर। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मित्रों में भगवान दास हालवा, डा. काशी प्रसाद जायसवाल, लक्ष्मीशंकर मिश्र, बद्रीनाथ गौड़, उमाशंकर द्विवेदी आदि शामिल थे। वे जब मिर्जापुर आते तो विंध्य पर्वत स्थित अष्टभुजा, मां कालीखोह, गेरूआ तालाब, जोगिया, मेहदिया, आमघाट, बरघाट, लुरकिया, टांडा फाल, विंढम फाल, सिद्धनाथ की दरी, बालनाथ आदि जगहों पर जाते और प्रकृति के सानिध्य में चिंतन करते। अब उनके पौत्र राकेश शुक्ला उनके नाम पर एक विद्यालय का संचालन कर रहे हैं। साथ ही समय समय पर साहित्यिक आयोजन कर उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
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मिर्जापुर। रमईपट्टी स्थित आचार्य रामचंद्र शुक्ल स्मारक शिक्षण संस्थान में 31 अक्टूबर को उनकी जयंती पर दोपहर तीन बजे जयंती उत्सव का आयोजन किया गया है। यह जानकारी देते हुए संस्थान के प्रबंधक राकेश कुमार शुक्ला ने बताया कि कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डा. अनुज प्रताप सिंह होंगे।