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जेल से निकल रहा है कैदियों का जनाजा
Mirzapur
Updated Thu, 03 May 2012 12:00 PM IST
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मिर्जापुर। जिला जेल से बंदियों व कैदियों का जनाजा निकल रहा है। एक-एक कर बंदी मरते जा रहे हैं परंतु जेल प्रशासन व सरकार को इसकी फिक्र नहीं है। बंदी क्यों मर रहे हैं? उनकी समस्याएं क्या हैं इससे जानना जरूरी नहीं समझा जा रहा है। जेल के अंदर बैरकों में बंदियों की लाशें तब तब गिर रही हैं जबकि बड़े अधिकारियों का दौरा व छापा आए दिन हो रहा है।
मंगलवार की रात जेल की बैरक नंबर चार में मृत बब्बन यादव अकेला कैदी नहीं है जिसे जेल में सजा-ए-मौत मिली है। उससे पहले भी मिर्जापुर जिला कारागार में बंदियों व कैदियों की लाशें गिरती रही हैं। हर घटना के बाद मजिस्ट्रेटी जांच होती है और जांच में मौत के कारणों को बीमारी से जोड़ कर सब कुछ ओके कर दिया जाता है।
बब्बन यादव की मौत से जुड़ा सबसे अहम सवाल यह है कि 30 अप्रैल को ही जेल में मेडिकल कैंप लगाया गया था। जिला अस्पताल से डाक्टरों की पूरी फौज पहुंची थी। अन्य बंदियों की तरह ही बब्बन यादव का भी मेडिकल चेकअप होना बताया जा रहा है। उस समय तक वह बिल्कुल फिट था। फिर 36 घंटे के अंदर न जाने ऐसी क्या बात हुई जिससे पैंतीस वर्षीय बब्बन यादव की एकदम से हालत बिगड़ी और उसे अस्पताल पहुंचाने तक का मौका जेल प्रशासन को नहीं मिला। जेल अधीक्षक बब्बन की मौत का कारण ब्रेम हैमरेज बता रहे हैं।
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बब्बन यादव से पहले जेल में नक्सली हिंसा में बंद एक अधेड़ कैदी की अर्थी निकल चुकी है। रोहतास जिले के डूमर खोहा गांव निवासी 45 वर्षीय नक्सली डाक्टर उर्फ कइल चेरो की मौत 26 नवंबर वर्ष 2011 को हुई थी। कईल चेरो को 28 जनवरी वर्ष 2010 को नक्सली गतिविधियों में लिप्त होेने और हिंसा फैलाने के आरोप में सोनभद्र पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उसी समय से वह मिर्जापुर जेल में निरुद्घ चल रहा था। इस नक्सली का फैसला अदालत से आ भी नहीं पाया था और उसे सजा-ए-मौत मिल गई। नक्सली कइल चेरो को जेल में खान-पान ठीक नहीं होने के कारण बीमार होना पड़ा था। डाक्टरों ने उसे डायरिया, पीलिया और एनीमिया रोगों से ग्रस्त बताया था। उसे गत वर्ष 21 नवंबर को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था और पांच दिन बाद ही उसकी मौत हो गई थी। नक्सली चेरो के परिजनों को भी बीमारी की सूचना जेल प्रशासन की तरफ से नहीं दी गई थी। उसके मरने के बाद ही घरवालों को सूचित किया जा सका था।
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मंगलवार की रात जेल की बैरक नंबर चार में मृत बब्बन यादव अकेला कैदी नहीं है जिसे जेल में सजा-ए-मौत मिली है। उससे पहले भी मिर्जापुर जिला कारागार में बंदियों व कैदियों की लाशें गिरती रही हैं। हर घटना के बाद मजिस्ट्रेटी जांच होती है और जांच में मौत के कारणों को बीमारी से जोड़ कर सब कुछ ओके कर दिया जाता है।
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बब्बन यादव की मौत से जुड़ा सबसे अहम सवाल यह है कि 30 अप्रैल को ही जेल में मेडिकल कैंप लगाया गया था। जिला अस्पताल से डाक्टरों की पूरी फौज पहुंची थी। अन्य बंदियों की तरह ही बब्बन यादव का भी मेडिकल चेकअप होना बताया जा रहा है। उस समय तक वह बिल्कुल फिट था। फिर 36 घंटे के अंदर न जाने ऐसी क्या बात हुई जिससे पैंतीस वर्षीय बब्बन यादव की एकदम से हालत बिगड़ी और उसे अस्पताल पहुंचाने तक का मौका जेल प्रशासन को नहीं मिला। जेल अधीक्षक बब्बन की मौत का कारण ब्रेम हैमरेज बता रहे हैं।
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बब्बन यादव से पहले जेल में नक्सली हिंसा में बंद एक अधेड़ कैदी की अर्थी निकल चुकी है। रोहतास जिले के डूमर खोहा गांव निवासी 45 वर्षीय नक्सली डाक्टर उर्फ कइल चेरो की मौत 26 नवंबर वर्ष 2011 को हुई थी। कईल चेरो को 28 जनवरी वर्ष 2010 को नक्सली गतिविधियों में लिप्त होेने और हिंसा फैलाने के आरोप में सोनभद्र पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उसी समय से वह मिर्जापुर जेल में निरुद्घ चल रहा था। इस नक्सली का फैसला अदालत से आ भी नहीं पाया था और उसे सजा-ए-मौत मिल गई। नक्सली कइल चेरो को जेल में खान-पान ठीक नहीं होने के कारण बीमार होना पड़ा था। डाक्टरों ने उसे डायरिया, पीलिया और एनीमिया रोगों से ग्रस्त बताया था। उसे गत वर्ष 21 नवंबर को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था और पांच दिन बाद ही उसकी मौत हो गई थी। नक्सली चेरो के परिजनों को भी बीमारी की सूचना जेल प्रशासन की तरफ से नहीं दी गई थी। उसके मरने के बाद ही घरवालों को सूचित किया जा सका था।