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मैं मोहब्बत का मोहताज मेरठ हूं...
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
Updated Mon, 18 Apr 2016 02:39 AM IST
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आबू का मकबरा पर होता अतिक्रमण
- फोटो : अमर उजाला
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मैं मेरठ हूं। विश्व में मेरी पहचान धार्मिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व की है। लोग मुझे महाज्ञानी रावण की ससुराल, राजा परीक्षित की नगरी, द्रोपदी व सती की स्थली और कौरव, पांडवों की राजधानी के रूप में जानते हैं। इतिहासविदों ने मेरा नाम मुगलिया सल्तनत के मशहूर बादशाहों, दया की देवी बेगम समरू व नवाबी हुकूमत की कहानी के रूप में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया है। क्रांतिकारियों ने मुझे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जननी का दर्जा दिया।
मेरे हृदय से ही भारत मां के सपूतों ने हिंदुस्तान को ब्रितानी शासकों के चंगुल से आजाद कराने के लिए 1857 की क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित की। महाभारत के युद्ध की कहानी आज भी मेरी शिराओं में उबल रही है। धर्म, इतिहास, क्रांति और राष्ट्रीय महत्व में मेरा नाम अमिट, अजर अमर रहेगा। लेकिन मेरे महत्व की कहानी के साक्षी रहे टीले, इमारतें और वो दरवाजे आज अपनों की बेवफाई का शिकार हैं। मेरी खूबसूरती को सींचने वाली नदियां अब प्रदूषण के कारण मेरा दामन छोड़ चुकी हैं।
मेरी शान में खड़े दरवाजे, शासकों की यादें, बुर्ज और स्तंभ इंसानों से दया की भीख मांगते हैं। आज विश्व धरोहर दिवस पर मैं अपने महत्व की याद इस उम्मीद से दिलाना चाहता हूं कि मेरी करुण पुकार सुनकर किसी का दिल पसीजे और मेरठ का यह वट वृक्ष फिर से अपनी विरासतों और धरोहरों के साथ हरा-भरा हो जाए।
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खैरनगर दरवाजा
खैरनगर दरवाजा मेरे किले में प्रवेश का प्रमुख द्वार था। यह दरवाजा छतरी वाला पीर से बुढ़ाना गेट की तरफ जाने वाली सड़क पर स्थित है। खूबसूरत लाल ईंटों से बनाया गया यह दरवाजा अद्भुत चित्रकारी का नमूना था। लेकिन आज यह अपना अस्तित्व खो रहा है। दरवाजे के चारों ओर अतिक्रमण हो चुका है। पान की पीक ने दरवाजे की लाल ईंटों का रंग स्याह कर दिया है।
आबू का मकबरा
दिल्ली रोड केसरगंज मंडी से कुछ दूरी स्थित यह मकबरा 1688 में नवाब अबू मोहम्मद खान के परिवार ने बनवाया था। नवाब अबू वही थे जिन्होंने काली नदी से मेरठ तक पानी लाने के लिए नहर का निर्माण कराया। यह नहर आज आबू नाला बन चुकी है। यह मकबरा लाली बलुआ प्रस्तर से बना था। प्याजनुमा आकार के इस मकबरे में तीन छोटे गुंबदों का निर्माण है। मुगल कला का मकबरा अब बहुमंजिला इमारतों में छिप चुका है। इमारत भी टूट रही है।
सोहराब, शाहपीर गेट
मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां ने शाहपीर मकबरे का निर्माण कराया था। उन्होंने अपने शौहर की याद में यह स्थल बनवाया। मेरठ में वो शाहपीर नामक पीर से मिली शौहर के व्यवहार में बदलाव की मन्नत मांगी, मन्नत पूरी होने पर नूरजहां ने मेरा शुक्रिया अदा करते हुए शाहपीर मकबरे का निर्माण कराया। इसी मकबरे क ोे देखकर अंग्रेज शासक ने शाहपीर गेट बनवाया। लेकिन मेरा यह दरवाजा आज आपकी दुकानों, पान की पीक और टूट फूट को सहता है। मेरा सोहराब गेट भी आपके स्वार्थ की भेंट चढ़ चुका है।
अशोक की लाट
सुभाष बाजार के पास पुराने मेरठ शहर में स्थित अशोक स्तंभ शहर में बौद्ध अनुयायियों की श्रद्धा का प्रमुख स्थल रहा है। सम्राट अशोक के चक्र के प्रतिरूप स्वरूप इस अशोक की लाट का निर्माण कराया गया, जो 1857 की आजादी में क्रांतिकारियों की बैठकों का प्रमुख स्थान रहा है। ऐतिहासिक महत्व की इस इमारत पर आज तक न आर्कियेलॉजिकल सर्व ऑफ इंडिया ने इस स्थान को अपने संरक्षण में लिया। लाट के आसपास फड़ लगाकर दुकानें लग रही हैं, पूरी तरह अतिक्रमण हो चुका है।
मेरी शान थे मेरे 9 दरवाजे
मेरे किले में प्रवेश के लिए 9 दरवाजे मेरी शान थे। दिल्ली गेट, लिसाड़ी गेट, शाहपीर गेट, सोहराब गेट, चमार दरवाजा, बागपत गेट, खैरनगर गेट थे। लेकिन 1857 की गदर के दौरान इसमें से अधिकांश दरवाजे और दीवारों को ब्रितानी हुकूमत ने ढहा दिया। अब शहर में कुल तीन प्रमुख दरवाजे शेष हैं, जो इतिहास की याद दिलाते हैं। इसमें सोहराब गेट, शाहपीर गेट और खैरनगर दरवाजा प्रमुख हैं। लेकिन ये तीनों दरवाजे अब इतिहास की नहीं बल्कि अतिक्रमण की कहानी बयां करते हैं।
श्रृंगी ऋषि आश्रम
परीक्षितगढ़ में कलयुग की जन्म स्थली कहे जाने वाले श्रृंगी ऋषि का आश्रम है। जनपद मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में स्थित परीक्षितगढ़ नगर एक कृत्रिम टीले पर बसा हुआ है। यह नगर सतयुग से कलियुग तक के हजारों वर्ष के इतिहास को अपने आंचल में समेटे है। एक जमाने में इस नगर से सट कर बहने वाली पतित पावनी गंगा आज आसिफाबाद की ओर 16 किमी दूर हो गई है। ऋषियों के केश विन्यास से पैदा हुई केश नदी पूरी तरह विलुप्त हो गई है।
गांधारी तालाब
परीक्षितगढ़ में ऐतिहासिक तालाब सौंदर्यीकरण के अभाव में आकर्षण खो रहा हैै। मान्यता है गांधारी यहां प्रतिदिन स्नान के लिए आया करती थी। गंधारी तालाब में एक तरफ से नीचे की ओर 52 सीढ़ियां हैं। लोग सुबह-शाम यहां आकर मछलियों को आटे की गोलियां खिलाते हैं। तालाब के बीच में शिव की मूर्ति स्थापित गई थी। उचित रख रखाव व सौंदर्यीकरण के अभाव से गंधारी तालाब का आकर्षण खत्म होता जा रहा है।
उपेक्षा का शिकार हस्तिनापुर
सरकारी उपेक्षा के चलते हस्तिनापुर के महाभारतकालीन अवशेष खत्म से होते जा रहे हैं। यहां प्राचीन विदूर टीला, प्राचीन पांडेश्वर मंदिर, द्रोपदी घाट, अंगराज कर्ण मंदिर, विदुर टीला भी है। यहां वर्ष 1950 में खुदाई के दौरान अद्वितीय प्राचीन इमारत निकली थी। श्री राजा रघुनाथ महल भी है जिसके संबंध में कहा जाता है कि 1857 में स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजी हुकूमत के विद्रोही एक मराठा व झांसी की रानी के मामा राजा रघुनाथ ने अपने साथियों के साथ यहां शरण ली थी। अति प्राचीन भवन व स्थल खंडहर पडे़ हैं।
ये स्थल भी हैं प्रमुख
इतना ही नहीं मेरे पास ऐतिहासिक धरोहरों के रूप में कुतुबुद्दीन ऐवक द्वारा बनवाई गई शाही ईदगाह, जामा मस्जिद, नौचंदी मैदान के पास स्थित मां चंडी देवी मंदिर, बाले मियां की मजार, खैर उल मस्जिद, नवाब खैरंदेश का मकबरा, तीर्थंकर शंातिनाथ मंदिर तीरगरान, जेल चुंगी स्थित जेम्स व्हाइट का स्मारक, केसरगंज स्थित लाखौरी ईंटों से बनी पुरानी जेल, 150 साल पुराना गंगा मंदिर, कागजी बाजार, उत्तर भारत का पुराना सेंट जोंस चर्च, लेखानगर स्थित सेंट जोंस कब्रिस्तान, ब्रिटिश कालीन कंपनी बाग, रेस कोर्स, सरधना में रोमन कैथोलिक चर्च, बेगम समरू का पुराना महल, माता मरियम चर्च भी है।
इतिहास को संजोता डॉक्टर
जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि भले ही शहर की ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति उदासीन हो चुके हों, लेकिन शहर में एक चिकित्सक ने इतिहास को संजोने का बीड़ा उठाया है। चिकित्सक डॉ. अमित पाठक ने छावनी परिषद् के साथ मिलकर शहर में 1857 की गदर से जुड़ी प्रमुख विरासतों को संरक्षित करवाया है, आगे भी उनकी यह पहल जारी है। जंग ए आजादी से जुड़े 8 प्रमुख स्थानों पर शिलालेख लगवाकर उस स्थल का महत्व अंकित कराया है। साथ ही उन स्थानों को लोहे के जाल से संरक्षित कराया है, जहां कभी आजादी की ज्वाला फूटी थी। आज भी कई विदेशी पर्यटकों को डॉ. अमित पाठक शहर के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों का दर्शन करवाते हैं।
संग्रहालय में संरक्षित इतिहास
मेरठ के शहीद स्मारक, राजकीय स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय में सांस्कृतिक विरासत की धरोहर को संग्रहालय संजोए हुए हैं। संग्रहालय के अध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार गौतम ने बताया 1857 की गदर से लेकर पुरातत्व महत्व के हस्तिनापुर की महाभारत कालीन कला वस्तुएं, बर्तन, औजार, वस्त्र, आभूषण व प्रमुख पत्र आज भी संग्रहालय के पास संरक्षित हैं।
मिशिका सोसाइटी ने उठाया बीड़ा
मिशिका सोसाइटी के अध्यक्ष अमित नागर कहते हैं, मेरठ ऐतिहासिक महत्व का शहर है। लेकिन सुरक्षा और जीर्णोद्धार के अभाव में ये धरोहरें अपना मूल्यवान महत्व खो रही हैं। इनके महत्व से युवा पीढ़ी को जागरूक बनाने के लिए हमने मिशिका सोसाइटी के माध्यम से पहल का शुभारंभ किया है। स्कूली बच्चों को शहर भ्रमण कराते हैं, व प्रदर्शनी लगाकर मेरठ की ऐतिहासिक धरोहरों का महत्व बताते हैं।
विश्व विरासत दिवस पर नजर
इंटरनेशनल काउंसिल फॉर मोन्यूमेंट्स एंड साइट्स ने 18 अप्रैल 1982 में ट्यूनिशीया में आयोजित सिम्पोजियम में मोन्यूमेंट्स एंड साइट्स डे के रूप में मनाया गया था। इसके बाद 1983 में यूनेस्को क ी 22वीं जर्नल काउंसिल के आयोजन में इसे मान्यता मिली और इसे विश्व विरासत दिवस यानि वर्ल्ड हेरिटेज मनाना तय हुआ। हर साल यूनेस्को इसे एक थीम देता है।
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मेरे हृदय से ही भारत मां के सपूतों ने हिंदुस्तान को ब्रितानी शासकों के चंगुल से आजाद कराने के लिए 1857 की क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित की। महाभारत के युद्ध की कहानी आज भी मेरी शिराओं में उबल रही है। धर्म, इतिहास, क्रांति और राष्ट्रीय महत्व में मेरा नाम अमिट, अजर अमर रहेगा। लेकिन मेरे महत्व की कहानी के साक्षी रहे टीले, इमारतें और वो दरवाजे आज अपनों की बेवफाई का शिकार हैं। मेरी खूबसूरती को सींचने वाली नदियां अब प्रदूषण के कारण मेरा दामन छोड़ चुकी हैं।
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मेरी शान में खड़े दरवाजे, शासकों की यादें, बुर्ज और स्तंभ इंसानों से दया की भीख मांगते हैं। आज विश्व धरोहर दिवस पर मैं अपने महत्व की याद इस उम्मीद से दिलाना चाहता हूं कि मेरी करुण पुकार सुनकर किसी का दिल पसीजे और मेरठ का यह वट वृक्ष फिर से अपनी विरासतों और धरोहरों के साथ हरा-भरा हो जाए।
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खैरनगर दरवाजा
खैरनगर दरवाजा मेरे किले में प्रवेश का प्रमुख द्वार था। यह दरवाजा छतरी वाला पीर से बुढ़ाना गेट की तरफ जाने वाली सड़क पर स्थित है। खूबसूरत लाल ईंटों से बनाया गया यह दरवाजा अद्भुत चित्रकारी का नमूना था। लेकिन आज यह अपना अस्तित्व खो रहा है। दरवाजे के चारों ओर अतिक्रमण हो चुका है। पान की पीक ने दरवाजे की लाल ईंटों का रंग स्याह कर दिया है।
आबू का मकबरा
दिल्ली रोड केसरगंज मंडी से कुछ दूरी स्थित यह मकबरा 1688 में नवाब अबू मोहम्मद खान के परिवार ने बनवाया था। नवाब अबू वही थे जिन्होंने काली नदी से मेरठ तक पानी लाने के लिए नहर का निर्माण कराया। यह नहर आज आबू नाला बन चुकी है। यह मकबरा लाली बलुआ प्रस्तर से बना था। प्याजनुमा आकार के इस मकबरे में तीन छोटे गुंबदों का निर्माण है। मुगल कला का मकबरा अब बहुमंजिला इमारतों में छिप चुका है। इमारत भी टूट रही है।
सोहराब, शाहपीर गेट
मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां ने शाहपीर मकबरे का निर्माण कराया था। उन्होंने अपने शौहर की याद में यह स्थल बनवाया। मेरठ में वो शाहपीर नामक पीर से मिली शौहर के व्यवहार में बदलाव की मन्नत मांगी, मन्नत पूरी होने पर नूरजहां ने मेरा शुक्रिया अदा करते हुए शाहपीर मकबरे का निर्माण कराया। इसी मकबरे क ोे देखकर अंग्रेज शासक ने शाहपीर गेट बनवाया। लेकिन मेरा यह दरवाजा आज आपकी दुकानों, पान की पीक और टूट फूट को सहता है। मेरा सोहराब गेट भी आपके स्वार्थ की भेंट चढ़ चुका है।
अशोक की लाट
सुभाष बाजार के पास पुराने मेरठ शहर में स्थित अशोक स्तंभ शहर में बौद्ध अनुयायियों की श्रद्धा का प्रमुख स्थल रहा है। सम्राट अशोक के चक्र के प्रतिरूप स्वरूप इस अशोक की लाट का निर्माण कराया गया, जो 1857 की आजादी में क्रांतिकारियों की बैठकों का प्रमुख स्थान रहा है। ऐतिहासिक महत्व की इस इमारत पर आज तक न आर्कियेलॉजिकल सर्व ऑफ इंडिया ने इस स्थान को अपने संरक्षण में लिया। लाट के आसपास फड़ लगाकर दुकानें लग रही हैं, पूरी तरह अतिक्रमण हो चुका है।
मेरी शान थे मेरे 9 दरवाजे
मेरे किले में प्रवेश के लिए 9 दरवाजे मेरी शान थे। दिल्ली गेट, लिसाड़ी गेट, शाहपीर गेट, सोहराब गेट, चमार दरवाजा, बागपत गेट, खैरनगर गेट थे। लेकिन 1857 की गदर के दौरान इसमें से अधिकांश दरवाजे और दीवारों को ब्रितानी हुकूमत ने ढहा दिया। अब शहर में कुल तीन प्रमुख दरवाजे शेष हैं, जो इतिहास की याद दिलाते हैं। इसमें सोहराब गेट, शाहपीर गेट और खैरनगर दरवाजा प्रमुख हैं। लेकिन ये तीनों दरवाजे अब इतिहास की नहीं बल्कि अतिक्रमण की कहानी बयां करते हैं।
श्रृंगी ऋषि आश्रम
परीक्षितगढ़ में कलयुग की जन्म स्थली कहे जाने वाले श्रृंगी ऋषि का आश्रम है। जनपद मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में स्थित परीक्षितगढ़ नगर एक कृत्रिम टीले पर बसा हुआ है। यह नगर सतयुग से कलियुग तक के हजारों वर्ष के इतिहास को अपने आंचल में समेटे है। एक जमाने में इस नगर से सट कर बहने वाली पतित पावनी गंगा आज आसिफाबाद की ओर 16 किमी दूर हो गई है। ऋषियों के केश विन्यास से पैदा हुई केश नदी पूरी तरह विलुप्त हो गई है।
गांधारी तालाब
परीक्षितगढ़ में ऐतिहासिक तालाब सौंदर्यीकरण के अभाव में आकर्षण खो रहा हैै। मान्यता है गांधारी यहां प्रतिदिन स्नान के लिए आया करती थी। गंधारी तालाब में एक तरफ से नीचे की ओर 52 सीढ़ियां हैं। लोग सुबह-शाम यहां आकर मछलियों को आटे की गोलियां खिलाते हैं। तालाब के बीच में शिव की मूर्ति स्थापित गई थी। उचित रख रखाव व सौंदर्यीकरण के अभाव से गंधारी तालाब का आकर्षण खत्म होता जा रहा है।
उपेक्षा का शिकार हस्तिनापुर
सरकारी उपेक्षा के चलते हस्तिनापुर के महाभारतकालीन अवशेष खत्म से होते जा रहे हैं। यहां प्राचीन विदूर टीला, प्राचीन पांडेश्वर मंदिर, द्रोपदी घाट, अंगराज कर्ण मंदिर, विदुर टीला भी है। यहां वर्ष 1950 में खुदाई के दौरान अद्वितीय प्राचीन इमारत निकली थी। श्री राजा रघुनाथ महल भी है जिसके संबंध में कहा जाता है कि 1857 में स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजी हुकूमत के विद्रोही एक मराठा व झांसी की रानी के मामा राजा रघुनाथ ने अपने साथियों के साथ यहां शरण ली थी। अति प्राचीन भवन व स्थल खंडहर पडे़ हैं।
ये स्थल भी हैं प्रमुख
इतना ही नहीं मेरे पास ऐतिहासिक धरोहरों के रूप में कुतुबुद्दीन ऐवक द्वारा बनवाई गई शाही ईदगाह, जामा मस्जिद, नौचंदी मैदान के पास स्थित मां चंडी देवी मंदिर, बाले मियां की मजार, खैर उल मस्जिद, नवाब खैरंदेश का मकबरा, तीर्थंकर शंातिनाथ मंदिर तीरगरान, जेल चुंगी स्थित जेम्स व्हाइट का स्मारक, केसरगंज स्थित लाखौरी ईंटों से बनी पुरानी जेल, 150 साल पुराना गंगा मंदिर, कागजी बाजार, उत्तर भारत का पुराना सेंट जोंस चर्च, लेखानगर स्थित सेंट जोंस कब्रिस्तान, ब्रिटिश कालीन कंपनी बाग, रेस कोर्स, सरधना में रोमन कैथोलिक चर्च, बेगम समरू का पुराना महल, माता मरियम चर्च भी है।
इतिहास को संजोता डॉक्टर
जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि भले ही शहर की ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति उदासीन हो चुके हों, लेकिन शहर में एक चिकित्सक ने इतिहास को संजोने का बीड़ा उठाया है। चिकित्सक डॉ. अमित पाठक ने छावनी परिषद् के साथ मिलकर शहर में 1857 की गदर से जुड़ी प्रमुख विरासतों को संरक्षित करवाया है, आगे भी उनकी यह पहल जारी है। जंग ए आजादी से जुड़े 8 प्रमुख स्थानों पर शिलालेख लगवाकर उस स्थल का महत्व अंकित कराया है। साथ ही उन स्थानों को लोहे के जाल से संरक्षित कराया है, जहां कभी आजादी की ज्वाला फूटी थी। आज भी कई विदेशी पर्यटकों को डॉ. अमित पाठक शहर के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों का दर्शन करवाते हैं।
संग्रहालय में संरक्षित इतिहास
मेरठ के शहीद स्मारक, राजकीय स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय में सांस्कृतिक विरासत की धरोहर को संग्रहालय संजोए हुए हैं। संग्रहालय के अध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार गौतम ने बताया 1857 की गदर से लेकर पुरातत्व महत्व के हस्तिनापुर की महाभारत कालीन कला वस्तुएं, बर्तन, औजार, वस्त्र, आभूषण व प्रमुख पत्र आज भी संग्रहालय के पास संरक्षित हैं।
मिशिका सोसाइटी ने उठाया बीड़ा
मिशिका सोसाइटी के अध्यक्ष अमित नागर कहते हैं, मेरठ ऐतिहासिक महत्व का शहर है। लेकिन सुरक्षा और जीर्णोद्धार के अभाव में ये धरोहरें अपना मूल्यवान महत्व खो रही हैं। इनके महत्व से युवा पीढ़ी को जागरूक बनाने के लिए हमने मिशिका सोसाइटी के माध्यम से पहल का शुभारंभ किया है। स्कूली बच्चों को शहर भ्रमण कराते हैं, व प्रदर्शनी लगाकर मेरठ की ऐतिहासिक धरोहरों का महत्व बताते हैं।
विश्व विरासत दिवस पर नजर
इंटरनेशनल काउंसिल फॉर मोन्यूमेंट्स एंड साइट्स ने 18 अप्रैल 1982 में ट्यूनिशीया में आयोजित सिम्पोजियम में मोन्यूमेंट्स एंड साइट्स डे के रूप में मनाया गया था। इसके बाद 1983 में यूनेस्को क ी 22वीं जर्नल काउंसिल के आयोजन में इसे मान्यता मिली और इसे विश्व विरासत दिवस यानि वर्ल्ड हेरिटेज मनाना तय हुआ। हर साल यूनेस्को इसे एक थीम देता है।