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UP: पश्चिम में आसपा बिगाड़ सकती है दिग्गजों का खेल, इस 'भाग्यशाली' सीट से चंद्रशेखर आजाद ठोक सकते हैं ताल

Mon, 11 May 2026 10:13 AM IST
Sharukh Khan अरीश रिजवी, अमर उजाला, मेरठ
अरीश रिजवी, अमर उजाला, मेरठ Published by: Sharukh Khan Updated Mon, 11 May 2026 10:13 AM IST
सार

पश्चिमी यूपी में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) दिग्गजों का खेल बिगाड़ सकती है। पार्टी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद हस्तिनापुर सीट से चुनावी ताल ठोक सकते हैं। मेरठ जिले की सातों सीटों पर प्रत्याशी उतारने की तैयारी है।

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UP Vidhan Sabha Election 2027 Chandrashekhar Azad may contest from Hastinapur seat in the west
Chandrashekhar Azad - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। नगीना से सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के मुखिया चंद्रशेखर आजाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए मेरठ को प्रचार का केंद्र बनाएंगे। 
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चर्चा है कि पार्टी जिले की सभी सातों विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। चंद्रशेखर खुद हस्तिनापुर से ताल ठोंक सकते हैं। वहीं, सरधना से शाहजेब रसूलपुर और मेरठ शहर विधानसभा से बदर अली के नामों की सुगबुगाहट ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
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हस्तिनापुर (सुरक्षित) सीट हमेशा से ही यूपी की राजनीति में सत्ता की कुंजी मानी जाती रही है। कहा जाता है कि यहां से जीतने वाली पार्टी ही लखनऊ की गद्दी पर बैठती है। चंद्रशेखर आजाद के यहां से चुनाव लड़ने की चर्चा के पीछे गहरी रणनीतिक वजहें हैं।

 

मेरठ और आसपास के जिलों में दलित युवाओं के बीच चंद्रशेखर की बढ़ती लोकप्रियता बसपा के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है। सबसे अधिक नुकसान बहुजन समाज पार्टी को होने की आशंका है। 

 
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वोट बंटने पर बसपा की होगी मुश्किल
पश्चिमी यूपी में दलित मतदाता विशेषकर युवा वर्ग अब चंद्रशेखर को एक आक्रामक विकल्प के रूप में देख रहा है। अगर दलित वोट बंटता है तो बसपा के लिए मुश्किल होगी। 

भाजपा पर भी पड़ेगा असर
इन सीटों पर आसपा मजबूती से लड़ती है तो सपा का पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला मेरठ में दरक सकता है। दरअसल, सपा को उम्मीद है कि दलित वोट भाजपा के खिलाफ उनके पाले में आ सकता है, लेकिन चंद्रशेखर के अलग लड़ने से दलित वोटों का काफी हिस्सा आसपा की ओर शिफ्ट हो सकता है। इसका असर भाजपा पर भी पड़ेगा।

भाजपा भी दलितों को अपना वोट बैंक मान रही है। कैंट से संजीव पाल दावा कर रहे हैं, जबकि मेरठ दक्षिण से नूर सैफी का नाम चल रहा है। किठौर और सिवालखास से भी दावेदारों के नाम मांगे जा रहे हैं। फिलहाल आसपा के उम्मीदवारों की चर्चा ने बड़े दलों को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया है।

मुस्लिम मतों में बिखराव की आशंका
रणनीतिकार मानते हैं कि सरधना सीट से दावेदार शाहजेब रसूलपुर की उम्मीदवारी मुस्लिम वोटों में बिखराव पैदा कर सकती है। इसका सीधा असर सपा के समीकरणों पर पड़ेगा। सरधना से सपा के अतुल प्रधान विधायक हैं। 

 

शहर विधानसभा में त्रिकोणीय मुकाबला
वहीं, मेरठ शहर विधानसभा सीट के दावेदार बदर अली की स्थानीय स्तर पर पहचान और उनके साथ जुड़ रहे युवाओं की टोली शहर विधानसभा में त्रिकोणीय मुकाबला बना सकती है। यहां मुस्लिम मतदाताओं का दबदबा है। 

 

यहां पारंपरिक रूप से सपा और भाजपा के बीच मुकाबला होता रहा है, लेकिन बदर अली की मौजूदगी इसे दिलचस्प बना सकती है। शहर सीट से सपा के रफीक अंसारी विधायक हैं। 

दक्षिण से पिछली बार सपा से आदिल चौधरी चुनाव लड़े थे और उन्हें भाजपा के सोमेंद्र तोमर को कड़ी टक्कर दी थी। इस बार नूर सैफी की उम्मीदवारी इस सीट के भी समीकरण बदल सकती है।
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