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अंतरात्मा के स्वरूप का चिंतन करने से विकसित होता है तप धर्म

Sun, 30 Aug 2020 01:21 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 30 Aug 2020 01:21 AM IST
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tap religon is develop when we listen our soul sound
जंबूद्वीप में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु। - फोटो : MAWANA
हस्तिनापुर(मेरठ)। दशलक्षण पर्व के सातवें दिन जंबूद्वीप पर उत्तम तप धर्म का महत्व बताया गया। ज्ञानमती माता जी ने बताया कि तपस्या के माध्यम से कायक्लेश करना और अपनी आत्मा की शक्ति को उजागर कर समस्त कर्मों से मुक्ति प्राप्त कर लेना तपधर्म का सर्वोपरि लक्षण है। तप धर्म अपनी अंतरात्मा के स्वरूप का चिंतन करने से विकसित होता है।
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प्रात:काल श्रीजी का पंचामृत महामस्तकाभिषेक किया गया। मध्याह्न में संघस्थ ब्र. बहनों द्वारा सरस्वती माता एवं लक्ष्मी माता की पूजा की गई। प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा तत्तवार्थ सूत्र के 7वें अध्याय की वाचना की गई। उन्होंने तप के विषय की जानकारी प्रदान की। संस्थान के पीठाधीश स्वस्ति रवींद्रकीर्ति स्वामी ने महाशांतिधारा के मंत्रों का उच्चारण किया। संपूर्ण विधि विधान वरिष्ठ प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन, प्रवीण चंद जैन शास्त्री जंबूद्वीप द्वारा संपन्न कराए गए। वहीं गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता जी ने बताया कि तीर्थंकरों ने भी तपस्या कर कर्मों की निर्जरा की। इसके बाद ही उन्हें तीर्थंकर जैसी पदवी की प्राप्ति का महान पुण्य अर्जित हुआ। आज भी मुनिगण उपवास आदि के माध्यम से मनुष्य जीवन को सफल करते हैं। उन्होंने बताया कि बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती महाराज का व्यक्तित्व इस तप धर्म के लिए सबसे बड़ा आदर्श है। उन्होंने अपने 35 वर्षीय दीक्षित जीवन काल में साढ़े 25 वर्ष उपवास करके व्यतीत किए। एक रानी ने मय नाम के ऋद्धियुक्त मुनि का स्पर्श करके विष से मूर्छित अपने पति राजा सिंहेंदु का स्पर्श किया तो उसी क्षण वे निर्विष हो गए। दोनों ने उन महामुनि की पूजा-अर्चना की। यह शास्त्रों में लिखा सच्चा उदाहरण है। इसके माध्यम से हम तपस्या का प्रभाव जान सकते हैं। तप करने वाले मुनियों को अनेक प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियां सहज ही हो जाती हैं, लेकिन वे मुनि उन ऋद्धि-सिद्धियों के प्रभाव से अत्यंत दूर रहते हुए अपनी आत्मा के कल्याण हेतु तपस्या में निमग्न रहते हैं। एक दिन उन्हें उसी तप के बल पर ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है और वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। उन्होंने बताया कि तप बारह प्रकार का होता है, जिसमें 6 बाह्य और 6 अंतरंग तप कहे जाते हैं। अनशन उपवास अवमौदर्य-भूख से कम खाना, वृत्त परिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्त शयनासन और कायक्लेश यह छह बाह्य तप हैं, जबकि प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान, यह छह अंतरंग तप कहे जाते हैं, जिनकी साधना करके एक मनुष्य अपने जीवन को कुंदन बना सकता है। वहीं सायंकालीन सभा में तीर्थंकर भगवंतों की मंडल एवं पूज्य माता जी की आरती संपन्न की गई। उत्तम तप धर्म की वाचना डॉ. अनेकांत जैन, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा की गई। सांस्कृतिक कार्यक्रम में जंबूद्वीप परिवार के बच्चों द्वारा नृत्य कार्यक्रम किया गया।
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