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स्मार्ट सिटी प्रपोजल में धोखा, लापरवाही पर भड़के विधायक लक्ष्मीकांत वाजपेयी
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
Updated Thu, 02 Mar 2017 05:43 PM IST
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नगर निगम की हीलाहवाली के कारण एक बार फिर स्मार्ट सिटी के मामले में शहर से धोखा हो सकता है। निगम टैक्स अधिकारियों ने जहां राजस्व बढ़ाने के अभिलेख ही खो दिए हैं, वहीं लाखों रुपये में तैयार की गई जीआईएस सर्वे की रिपोर्ट को सुरक्षित रखना भी गवारा नहीं समझा। जिसका सीधा असर स्मार्ट सिटी के राजस्व बिंदु पर पड़ेगा। बुधवार को शहर विधायक ने भी इस मुद्दे को उठाया।
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17 साल पहले कराया था सर्वे
सन 2000 में निगम ने एक कंपनी से शहर का जीआईएस सर्वे कराने के लिए 58 लाख रुपये में करार किया था। कंपनी ने पहले दस वार्डों की सर्वे रिपोर्ट निगम प्रशासन को सौंपी थी। स्पष्ट कहा था कि वह उनकी सर्वे रिपोर्ट का सत्यापन भी करा लें। जिसमें टैक्स से छूटे भवन और नगर निगम की अवैध कब्जे वाली भूमि का खुलासा हो जाएगा। निगम प्रशासन ने कंपनी को सर्वे के नाम पर करीब 50 प्रतिशत धनराशि अदा कर दी थी। निगम का हाउस टैक्स विभाग जहां सर्वे रिपोर्ट का सत्यापन कराना भूला, तो कंपनी भी वापस लौट गई। अब निगम के पास जीआईएस रिपोर्ट भी नहीं है। बुधवार को जब शहर विधायक डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने टैक्स सुपरिंटेंडेंट असीम रंजन से वार्ता कर सर्वे रिपोर्ट मांगी तो इसका खुलासा हुआ। बता दें कि निगम को 30 मार्च को केंद्र सरकार को मजबूत प्रपोजल सौंपना है। पांच मार्च को लखनऊ में प्रपोजल को लेकर बैठक होगी। लेकिन प्रपोजल को लेकर कोई सरगर्मी नहीं दिख रही है।
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प्रपोजल में राजस्व बड़ा बिंदु
स्मार्ट सिटी सूची में शामिल होने के लिए एक मुख्य बिंदु नगर निगम के राजस्व का भी है। पिछली बार मेरठ नगर निगम की टैक्स वसूली के बिंदु पर किरकिरी हुई थी। उसके बाद भी निगम प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया। शहर में छूटे भवनों पर टैक्स तक नहीं लगाया। जबकि निगम अधिकारी बड़े भवनों पर बिना टैक्स लगाए ही अपनी जेब भर रहे हैं। यदि निगम जीआईएस रिपोर्ट के आधार पर छूटे भवनों पर टैक्स लगा देता तो 30 प्रतिशत से ज्यादा राजस्व बढ़ोत्तरी होती। जिसका फायदा स्मार्ट सिटी प्रपोजल में लिया जा सकता है।
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पेमेंट के बिना कैसा प्रपोजल
कंसलटेंट बीके पटेल पर स्मार्ट सिटी प्रपोजल बनाने की जिम्मेदारी है। पिछले साल कंसलटेंट ने टीम के साथ रहकर प्रपोजल तैयार कराया था। लेकिन इस बार एक माह बीतने के बाद भी वे मेरठ नहीं आए। इसके पीछे खुलासा हुआ है कि निगम प्रशासन ने कंसलटेंट का पिछला 15 लाख का भुगतान नहीं किया है। जिसके कारण कंसलटेंट प्रपोजल बनाने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
प्रपोजल में लापरवाही पर भड़के विधायक
स्मार्ट सिटी प्रपोजल को लेकर हो रही लेटलतीफी पर शहर विधायक ने निगम के चीफ इंजीनियर कुलभूषण वार्ष्णेय के कार्यालय में स्मार्ट सिटी सेल के अधिकारियों से बात की। वोटिंग और लखनऊ में प्रपोजल प्रस्तुत कराने में सहयोग देने के साथ चेतावनी दी कि अगर प्रपोजल कमजोर तैयार किया तो निगम की ईंट से ईंट बजा देंगे। क्योंकि केंद्र सरकार मेरठ को स्मार्ट सिटी बनाना चाहती है। स्मार्ट सिटी सेल के कोऑर्डिनेटर मोइनुद्दीन और अमृत योजना के अधिकारियों से उन्होंने कहा कि निगम प्रशासन की लापरवाही के कारण पूर्व के चक्र में मेरठ को मायूसी हाथ लगी। इसलिए इस बार हम प्रपोजल की मॉनिटरिंग करेंगे। इस दौरान अजय गुप्ता, पार्षद गौरव, विनोद उपाध्याय, नरेंद्र उपाध्याय, वेद पांडेय, कुलदीप वाल्मीकि, पंकज कश्यप, चिराग पांडेय, शगुन शर्मा, गौरव शर्मा, संजीव पुंडीर मौजूद रहे।
नगरायुक्त से ले लो जवाब
पूर्व में स्मार्ट सिटी शहरों की सूची में शामिल न होने के पीछे निगम की आय कम होना बताया गया था। विधायक ने टैक्स सुपरिंटेंडेंट असीम रंजन से जीआईएस सर्वे पर खर्च रकम, उसकी रिपोर्ट और निगम द्वारा किए स्थलीय निरीक्षण का रिकॉर्ड मांगा, तो असीम रंजन ने इसका जवाब नगरायुक्त से मांगने की बात कह दी। जिस पर विधायक भड़क उठे और असीम रंजन को कमरे से बाहर निकलने की चेतावनी दे दी। विधायक ने कहा कि निगम टैक्स विभाग के अधिकारी अपनी जेब के हित में कार्य कर रहे हैं। जीआईएस सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक छूटे भवनों पर टैक्स लगाने से निगम को लाखों का राजस्व प्राप्त हो सकता है।