पहल: विलुप्त होती धान की देसी किस्मों को संरक्षित कर रहे वैज्ञानिक,18 प्रजाति के धान को किया संरक्षित, एक पर चल रहा शोध
धान की पुरानी प्रजातियों में तेज सुगंध, स्वाद व पोषण से भरपूर हुआ करते थे, जिसमें आयरन व जिंक प्रचुर मात्रा में होता था। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि विलुप्त हो रही प्रजातियों का किसानों के हित में संरक्षण बहुत जरूरी है। इससे नई प्रजाति विकसित करने में सहायता मिलती है।
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान की विलुप्त होती प्रजातियों को संरक्षित करने में वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। विलुप्त होती प्रजातियों की जानकारी कर उनके बीजों को एकत्रित कर रहे हैं, ताकि उनके जीन से दूसरी प्रजाति को विकसित किया जा सके।
देसी धान के संरक्षण को लेकर वैज्ञानिकों ने देसी बासमती, जसवा, मंसूरी, बिरनफूल, साद सरना, कुकुरझाली, काला नयना, फूल पकरी, काला बुधनी, देसी मंसूरी, सफेद सुंदरी, चनाचूर, कैमा समेत 18 प्रजाति के धान को नेशनल जीन बैंक में संरक्षित किया है, जबकि करगी प्रजाति पर शोध किया जा रहा है। करगी प्रजाति को जौनपुर जिले के मछली शहर पौहा से संकलित कर उसके बीज को राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो नई दिल्ली (एनबीपीजीआर) में संरक्षण के लिए बीज बैंक में संरक्षित कराया है।
सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि के कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरएस सेंगर और शोध छात्र अभिषेक सिंह ने गांव-गांव जाकर सर्वे किया। उन्होंने बताया कि नई पीढ़ियों के किसानों ने देसी धान की प्रजातियों का संरक्षण नहीं किया, जिस कारण पुरानी देसी प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है। किसान अब देसी प्रजातियों के धान की खेती लगभग छोड़ चुके हैं और बाजार में उपलब्ध बीज पर निर्भर हैं।
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धान की पुरानी प्रजातियों में तेज सुगंध, स्वाद व पोषण से भरपूर हुआ करते थे, जिसमें आयरन व जिंक प्रचुर मात्रा में होता था। धान की देसी किस्में खुद सैकड़ों वर्षों से खुद की प्रतिरोधक शक्ति विकसित करते हुए जलवायु परिवर्तन के विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए तैयार हुई थीं।
इस कारण इन सभी धान की पुरानी प्रजातियों में बाढ़ और सूखा से लड़ने की क्षमता थी। नई प्रजातियां छह-सात क्विंटल प्रति एकड़ उपज देती हैं। वहीं, धान की पुरानी प्रजातियों कि उपज केवल तीन-चार क्विंटल प्रति एकड़ थी, जो बढ़ती हुई जनसंख्या का पेट भरने के लिए काफी नहीं थी।
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धान की 19 प्रजाति हो गईं विलुप्त
कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरएस सेंगर व शोध छात्र अभिषेक सिंह ने क्षेत्र भ्रमण और संग्रहण के दौरान किसानों से चर्चा की। इस दौरान कलम, पंसार, गोकुल, नाजिर, कमद, खैरा, कार्तिक, परहा, मोटा कलम, कनियाल जैसी देसी धान की 19 किस्में विलुप्त पाई गई। उन्होंने किसानों से कहा कि जिनके पास इन किस्मों या देसी प्रजातियां के धान उपलब्ध हो, वह उन्हें बीज उपलब्ध कराएंगे तो उनके नाम से बीजों को संरक्षित किया जाएगा।
विलुप्त हो रही प्रजातियों का किसानों के हित में संरक्षण बहुत जरूरी है। इससे नई प्रजाति विकसित करने में सहायता मिलती है। - डॉ. आरके मित्तल, कुलपति कृषि विवि मोदीपुरम
विलुप्त हो रही प्रजातियों को खोज कर कृषि विवि जीन बैंक में संरक्षित कर रहा है। इससे पुरानी प्रजातियों को दोबारा से बढ़ावा मिलेगा। - डॉ. टीपी सिंह, निदेशक अनुसंधान कृषि विवि