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आस्था और सौहार्द का प्रतीक थी सांझी, अब भजनों से नहीं होती नवरात्र की सुबह, पढ़िए खास रिपोर्ट

Fri, 16 Oct 2020 06:06 PM IST
कपिल kapil शालू अग्रवाल, अमर उजाला, मेरठ
शालू अग्रवाल, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Fri, 16 Oct 2020 06:06 PM IST
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Navratri 2020: Sanjhi was a symbol of faith and harmony
सांझी - फोटो : अमर उजाला

घर घर तेरी जोत जले, सांझी माई तेरी जय... सांझी सांझी सबको दे मुराद मनमानी, सांझी तेरी जय, सांझी तेरी जय। शारदीय नवरात्र के आगमन के साथ ठंडी होती भोर में सांझी के ये गीत ग्रामीण माहौल की शोभा हुआ करते थे।

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पश्चिमी उप्र के गांवों में शारदेय नवरात्र में नौ दिन तक होने वाला सांझी पूजन ग्रामीणों की घड़ी था। जो अलसाई होती सर्दियों में उठने और शाम को घर वापसी का संकेत देता था। 
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परंपरा अदायगी के लिए घरों में सांझी पूजन आज भी होता है, लेकिन गोबर नहीं मिट्टी की सांझी पूजी जाती है। कांच के टुकड़ों से सजी गोबर की सांझी अब मिट्टी की खूबसूरत प्रतिमा में ढल गई है। सौहार्द, एकता और त्योहारी उल्लास की प्रतीक सांझी अब रस्म निभाने तक शेष है।
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सांझी लगाना थी निपुणता की निशानी
कैली की रहने वाली ममता सिंघल बचपन को याद कर कहती हैं कि घरों में सांझी लगाना, पूजा और सांझी गीत भी स्त्री निपुणता की निशानी थी। कौन भाभी, ननद, बहन या रिश्तेदारी की महिला कितनी सुंदर सांझी सजाती है, यह आंका जाता था। कितना मधुर गीत गाती है, आरती गाने में कुशल है। इसी से बहुओं, बेटियों की कुशलता परखी जाती थी। अच्छी सांझी लगाने वाली महिला की सबसे ज्यादा तारीफ होती थी। बिना खर्च में पूजा, मनोरंजन और भक्ति का प्रतीक थी सांझी। अब तो इतना सब नहीं हो पाता। पहले कन्याओं या नई बहू से सांझी का पूजन कराना बहुत खास होता था। अब बनी हुई सांझी की पूजा हो जाती है। नियम भी पहले जैसे नहीं हैं। केवल रस्म निभाई जाती है। 

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सब मिलते, गाते थे गीत 
मूलत: लावड़ निवासी सरोज कहती हैं कि सांझी केवल मान्यता या पूजन नहीं था, बल्कि हम लोगों के लिए आपस में मिलने, गीत गाने, बतियाने का माध्यम था। नवरात्र से पहले अमावस्या को हर घर के बाहर दीवार की सफाई होती। दीवार लीपकर चूल्हे की पीली मिट्टी या गोबर से सांझी बनाते थे। उसे चूड़ी, कांच, बिंदी, कौढ़ी, सितारे, आटा, रोली, गेरु, रुई, धागे से सजाते। फूल पत्ते सजाते। नौ दिन सुबह, शाम सांझी की पूजा होती। गांव की औरतें, लड़कियां मिलकर गीत गीत गाती थीं। 

समय बताती थी सांझी
मवाना से ताल्लुक रखने वाली उषा अब मेरठ में रहने लगी हैं। वह कहती हैं कि अब शहरों में पक्के, छोटे घर हैं। आंगन है नहीं तो सांझी कहां सजाएं। घर के अंदर ही या मंदिर में लोग बाजार से मिट्टी की सांझी लगाकर सजा लेते हैं। नियम तो यह है कि घर के बाहर दीवार, आंगन में सांझी रखें। मंदिर के पास सांझी न रखें। सांझी एक तरह से समय सूचक थी। सूर्योदय से पहले लड़कियां सांझी पूजा करके पूरे गांव में भजन गाती थीं। लोगों को जगाया करती थीं।

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