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क्रांति दिवस: यूं ही नहीं भड़की थी 1857 की क्रांति की ज्वाला, पढ़िए आखिर क्या था पूरा इतिहास

Mon, 10 May 2021 12:31 PM IST
कपिल kapil अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ
अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Mon, 10 May 2021 12:31 PM IST
सार

10 मई 1857 को मेरठ छावनी में क्रांति की ज्वाला यूं ही नहीं भड़की थी। मंदिर के पुजारी ने भारतीय सैनिकों के आत्मसम्मान को ललकारा था। हिंदू-मुस्लिम सैनिकों की आत्मा को झकझोरा था, तब जाकर क्रांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित हुई थी।

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Meerut News: Read the complete history of the revolution of 1857
1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

10 मई 1857 को मेरठ छावनी में क्रांति की ज्वाला यूं ही नहीं भड़की थी। मंदिर के पुजारी ने भारतीय सैनिकों के आत्मसम्मान को ललकारा था। हिंदू-मुस्लिम सैनिकों की आत्मा को झकझोरा था, तब जाकर क्रांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित हुई थी। जिस एतिहासिक कुएं पर सैनिकों ने अंग्रेजों को मार गिराने की कसम खाई थी, उसी कुएं पर बने शहीद स्मारक पर सोमवार को शहीद क्रांतिकारियों को नमन किया जाएगा। लोगों को ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित करने के लिए कहा गया है।

Meerut News: Read the complete history of the revolution of 1857
1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

1857 में देश में अंग्रेजों का अत्याचार चरम पर था। ऐसे में मेरठ से भड़की क्रांति की चिंगारी पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ एक जंग बन गई। इस क्रांति में औघड़नाथ मंदिर का विशेष योगदान था। मंदिर तब छोटी सी जगह में था। मंदिर के पीछे के मैदान पर अंग्रेजों का सैनिक प्रशिक्षण केंद्र था।

Meerut News: Read the complete history of the revolution of 1857
1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

मंदिर के वर्तमान पुजारी पंडित श्रीधर त्रिपाठी के पूर्वज पंडित शिवचरण दास उर्फ बाबा उस समय पुजारी थे। वे सैनिकों को देशभक्ति के बारे में बताते थे। 10 मई 1857 से पहले एक दिन बाबा शिवचरण दास ने सैनिकों को कुएं का पानी पिलाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि हिंदू सैनिक गाय और मुसलमान सैनिक सूअर की चर्बी से बने कारतूसों को मुंह से लगा रहे हैं। सुनकर सैनिकों का आत्म सम्मान जाग गया। 85 सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। 10 मई को 50 से ज्यादा अंग्रेज अफसरों-सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया।

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Meerut News: Read the complete history of the revolution of 1857
1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

नौ मई की रात से होने लगी थी क्रांति की शुरुआत 
नौ मई 1857 की रात से ही बगावत की सूचना अंग्रेज अफसरों को मिलने लगी थी, लेकिन वे इसे भांप नहीं पाए। कर्नल कुस्टान्स और कर्नल जॉन फिनिश मेरठ के तत्कालीन कमिश्नर एचएच ग्रीथेड के बंगले पर रात्रिभोज का लुत्फ उठा रहे थे। उन्हें यह सूचना मिली कि शहर में लोगों को भड़काने वाले पोस्टर लगाए गए हैं। इनमें अंग्रेजों को काट डालने की अपील की गई है, लेकिन अंग्रेज अफसरों ने इसे हल्के में लिया। 

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Meerut News: Read the complete history of the revolution of 1857
1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

200 बेड़ियों में कैद करने की फैली थी अफवाह
नौ मई को ही यह अफवाह पूरे शहर में फैल गई थी कि 200 बेड़ियां बनवाई जा रही हैं, जिसमें भारतीय सैनिकों को बंदी बनाया जाएगा। अफवाह यह भी थी कि हड्डियों के चूर्ण से मिश्रित आटा बनवाया जा रहा है जिसे बाजार में बेचा जाएगा। ऐसी ही तमाम अफवाहों ने शहर के लोगों के खून में उबाल ला दिया। दस मई की शाम पांच बजे विद्रोह की चिंगारी फूट पड़ी। भीड़ नंगी तलवारों के साथ सड़कों पर उतार आई। पहले काली पल्टन सेना के जवान, उनके पीछे पीछे भीड़ सेना के परेड ग्राउंड पर पहुंच गए। सदर बाजार से लेकर परेड ग्राउंड तक विद्रोह शुरू हो चुका था।

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