बचपन में ही यदि बच्चों के सिर से मां का साया उठ जाए, तो आप खुद ही समझ सकते हैं कि उस परिवार की हालत क्या होगी। घर की जिम्मेदारी के साथ बच्चों की परवरिश। उनकी पढ़ाई लिखाई और देखरेख आसान नहीं है, लेकिन यूपी के शामली के रहने वाले संजीव और हारून पिता के साथ-साथ मां का भी फर्ज अदा कर रहे हैं। यहां तक कि बच्चों की ही खातिर दूसरी शादी नहीं की। फादर्स डे पर पढ़ें उनकी दिल छू लेने वाली कहानियां:-
Father’s Day: पिता के साथ संजीव और हारून निभा रहे मां का भी फर्ज, बच्चों की खातिर नहीं की दूसरी शादी
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इस हादसे के बाद मानो परिवार पर गमों का पहाड़ टूट गया। उस वक्त उनकी बेटी मुस्कान 10 साल की थी और पांचवीं में पढ़ती थी। छोटा बेटा मानव नौ साल का था और कक्षा पांच का छात्र था। बच्चों के बचपन में ही मां का साया उठ गया था। घर में संजीव की एक बुजुर्ग मां थी जो अक्सर बीमार रहती थी। ऐसे में पूरे घर की जिम्मेदारी संजीव पर आ गई थी। बकौल संजीव पत्नी की मृत्यु के बाद एक महीने तो उनकी सास साथ में रही, लेकिन उनके जाने के बाद खुद ही घर संभाला।
बच्चों के सोने के बाद कपड़े धोए
संजीव ने बताया कि रात को बच्चों की पढ़ाई पर भी ध्यान दिया। बच्चों को सुलाने के बाद कपड़े धोए। धीरे धीरे बच्चों की क्लास बढ़ी तो ट्यूशन भी लगाया। उनकी पढ़ाई लिखाई में कोई अड़चन नहीं आने दी।
बच्चों की खातिर नहीं की दूसरी शादी
संजीव के अनुसार पत्नी के निधन के बाद वह एकदम अकेला पड़ गया था। तेरहवीं के दिन ही रिश्तेदारों ने दूसरी शादी की तैयारी कर ली थी। उस पर दबाव बनाया, लेकिन उसने साफ मना कर दिया। बाद में भी रिश्तेदारों का दबाव बना, लेकिन उसने पहले ही ठान ली थी कि दूसरी शादी नहीं करनी। बताया कि उन्हें डर था कि दूसरी पत्नी बच्चों को उतना प्यार ना दे जितना वो चाहते हैं। सुशील के अनुसार दुख की घड़ी में उनके प्रेस मालिकों ने पूरा सहयोग दिया। मिलने वालों ने भी सहयोग मिला। इसी के दम पर आज वे पिता के साथ मां की भी जिम्मेदारी निभा सके। आज वो और उनका परिवार खुश है।
ऐसे संभाला घर
सुबह उठकर घर की सफाई के बाद बच्चों के लिए नाश्ता बनाकर दिया, उन्हें स्कूल भेजते थे। दोपहर में उनके स्कूल से आने के वक्त अपनी जॉब से लंच में आते और सबका खाना बनाते थे। बीमार मां और बच्चों को खाना खिलाने के बाद जॉब पर चला जाता था। रात को आकर फिर बच्चों के लिए खाना बनाता और सब बैठकर खाते थे।
रिक्शा चलाकर कर रहा बच्चों की परवरिश
चार साल पहले जब पत्नी का निधन हुआ तो मानो हारून पर गमों का पहाड़ टूट गया। फेफड़ों में इन्फेक्शन से बीमार हारून के पास न सिर्फ अपने इलाज की जिम्मेदारी थी, बल्कि घर में मौजूद छह बच्चों को बेहतर भविष्य देने की चुनौती भी। ऐसी स्थिति में आर्थिक तंगी ने हारून की और कमर तोड़ दी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। रिक्शा चलाकर आज अपने छह बच्चों को न केवल अच्छी परवरिश दे रहे हैं, बल्कि सभी को अच्छी तालीम भी दिला रहे हैं।
कस्बे के रेलवे स्टेशन के समीप रहने वाले रिक्शा चालक मौहम्मद हारून की कहानी भी कुछ ऐसी है। वे बताते हैं कि उसकी माली हालत ठीक नहीं है। खुद वह अपने परिवार को लेकर किराए के मकान में रहते हैं। चार साल पहले जब पत्नी मोहसिना का इंतकाल हुआ तो मानो गमों का पहाड़ टूट गया हो। वह स्वयं फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहा था। रिश्तेदारों ने दूसरी शादी का दबाव डाला, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य को याद कर उसने ऐसा करने से मना कर दिया।
आज वह रिक्शा चलाकर 200 से 300 रुपये प्रतिदिन कमा लेता है। इसी कमाई से वह अपना घर चलाते हैं। उसकी बड़ी बेटी आसमां (21) ने मदरसा की पढ़ाई की है, जल्द उसकी शादी होने वाली है। बेटे आस मौहम्मद (19) ने कक्षा-6 के बाद पढ़ाई नहीं की और मामा के यहां जाकर रहने लगा। इसके बाद आसमीन (16) मदरसा, रेशमा दस वर्ष तीसरी कक्षा, अरशद आठ वर्ष दूसरी कक्षा और आफीन छह वर्ष पहली कक्षा में पढ़ाई कर रहे हैं।
इसके अलावा वह पांच बजे उठकर बच्चों को उठाते हैं, उनके लिए खाना बनाने में बड़ी बेटी की मदद करती है। इसके बाद बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कराना, उनकी पढ़ाई पर ध्यान देना और फिर आठ बजे रिक्शा लेकर काम पर चले जाना ही उनकी नियमित दिनचर्या बन गई है।