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यूपी के इस गांव में शास्त्रीय संगीत सीखने देश-विदेश से आ रहे युवा, निशुल्क मिलती है शिक्षा

Wed, 11 Sep 2019 03:15 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिजनौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिजनौर Published by: Dimple Sirohi Updated Wed, 11 Sep 2019 03:15 PM IST
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Drupada and Thumri tunes  resonated across the country from Gajraula Shiva village of Bijnor UP
तबला, सितार, हारमोनियम और मृदंगम - फोटो : amar ujala

शास्त्रीय संगीत, तबले की थाप और हारमोनियम पर राग-रागिनी, ठुमरी आदि को यूपी के बिजनौर जनपद के एक छोटे से गांव गजरौलाशिव के संगीताचार्य महेशचंद्र ने सहेज रखा है। आज शास्त्रीय संगीत पूरे देश में लुप्त होता जा रहा है, लेकिन गांव गजरौलाशिव से शास्त्रीय संगीत की धुन आज भी पूरे देश में गूंज रही हैं। गांव निवासी संगीताचार्य महेश चंद शास्त्रीय संगीत को सहेजे हुए हैं। उनसे राग, तबला और हारमोनियम सीखने के लिए देशभर से बच्चे आते हैं।



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Drupada and Thumri tunes  resonated across the country from Gajraula Shiva village of Bijnor UP
विद्यार्थियों को संगीत सिखाते आचार्य महेश चंद्र - फोटो : अमर उजाला
महेशचंद एक किसान परिवार से हैं। उन्हें तबला और हारमोनियम सीखने की प्रेरणा अपने पिता रामचंद्र से मिली। रामचंद्र सिंह गांव में होने वाली रामलीला में तबले और हारमोनियम बजाकर श्रीरामलीला का पाठ करते थे। जब रामचंद्र खेत पर काम करने जाते थे तो इस दौरान महेश चंद ने भी पिता से छिपकर तबला और हारमोनियम बजाना सीख लिया। 

एक बार गांव कसौर में आयोजित आर्य समाज के कार्यक्रम में महेश चंद एक भजन पर ढोलक बजा रहे थे तो ढोलक नहीं बजी। तब दर्शकों में से एक व्यक्ति आए और उन्होंने ढोलक बजाई। वे शास्त्रीय संगीताचार्य विद्यारत्न आर्य थे। महेश चंद ने उन्हें गुरु बनाकर उनसे शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली।
Drupada and Thumri tunes  resonated across the country from Gajraula Shiva village of Bijnor UP
संगीत सीखने आईं छात्रा गौरी व गौरवी - फोटो : अमर उजाला

विद्यारत्न आर्य ने महेश चंद में शास्त्रीय संगीत को और निखारा। देश भर में होने वाले कार्यक्रमों में महेश चंद को बुलाया जाता है। उनकी दो बेटी संगीत विषय की शिक्षिका हैं। आज शास्त्रीय संगीत देश भर में विलुप्त होता जा रहा है, क्योंकि शास्त्रीय संगीताचार्य भी नहीं बचे हैं। जिन बच्चों की शास्त्रीय संगीत में रुचि है वे अपने गुरू की तलाश में दूर दूर जाने को मजबूर हैं। 

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उनकी तलाश महेश चंद के पास आकर खत्म होती है। महेश चंद से देश भर के बच्चे शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने आते हैं। वे बच्चों को राग-रागिनी, छोटा ख्याल-बड़ा ख्याल, ठुमरी, नौटंकी की गायकी, भजन, गजल, गीत, मौसम, ऋतुओं के गीत, तबला और हारमोनियम बजाना सिखाने के लिए कोई रुपया नहीं लेते हैं।

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Drupada and Thumri tunes  resonated across the country from Gajraula Shiva village of Bijnor UP
शास्त्रीय संगीत सिखाने वाले शिक्षक विनीत कुमार - फोटो : अमर उजाला
होली पर सब सुनते हैं ठुमरी
डीजे के शोर के दौर में भी महेश चंद के गांव के आसपास आज भी शास्त्रीय संगीत को ही तरजीह दी जाती है। होली पर अनेक सामाजिक संस्थाएं अपने कार्यक्रमों में ठुमरी आदि सुनने के लिए महेशचंद को ही बुलाते हैं।

महेशचंद्र का कहना है कि शास्त्रीय संगीत देश की पहचान रही है। लेकिन युवा पीढ़ी शास्त्रीय संगीत को भूल चुकी है। उनका दायित्व शास्त्रीय संगीत को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है। वे शास्त्रीय संगीत के प्रति खुद के दायित्व को पूरा कर रहे हैं।
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Drupada and Thumri tunes  resonated across the country from Gajraula Shiva village of Bijnor UP
- फोटो : अमर उजाला
नि:शुल्क देते हैं विद्यार्थियों को शिक्षा
महेश चंद अपने घर पर ही बच्चों को शिक्षा देते हैं और घर पर ही उनके रहने खाने की नि:शुल्क व्यवस्था करते हैं। उनके पास गर्मियों की छुट्टी में दो से तीन महीने तक बच्चे रुकते हैं। दिल्ली व आसपास के जिलों के बच्चे स्कूलों की तीन से चार दिन की छुट्टी होने पर भी उनके पास आ जाते हैं।

मुजफ्फरनगर की गौरी राजपूत, अमरोहा की गौरी गर्ग, नगीना का मोतीन, नजीबाबाद का विनीत कुमार महेश चंद से शिक्षा लेते हैं। उनका कहना है कि गुरु जी जैसे कर्मठ व्यक्तियों की वजह से आज भी शास्त्रीय संगीत जिंदा है।
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