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बेगुनाह के खून से लिखी फर्जी मुठभेड़ की इबारत
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
Updated Fri, 11 Dec 2015 12:18 AM IST
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जनवरी के कड़ाके की ठंड और तेज हवा चल रही थी। समय करीब शाम छह बजे थे। स्मिता भादुड़ी और मोहित त्यागी मारुति जैन यूपी15जे 0898 से सिवाला नहर से होते मेरठ लौट रहे थे। इंस्पेक्टर और दो सिपाहियों ने झूठी वाहवाही लूटने के लिए कार पर एक या दो नहीं 11 गोलियां बरसाकर बेगुनाह स्मिता भादुड़ी के खून से हाथ रंगे।
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पुलिस तो मोहित को मारना चाहता थी, लेकिन इससे पहले उसको गोली लगती कि वह दोनो हाथ ऊपर करके कार से नीचे उतर गया। सच्चाई सामने आने के बावजूद भी इसे असल मुठभेड़ दिखाने के लिए हर कदम पर कोशिशें भी खूब हुई थीं। यहां तक कि कंट्रोल रूम पर भी मेसेज देकर कह दिया गया था कि जंगल में बदमाशों से मुठभेड़ चल रही है, और फोर्स भेजो। आला अफसर जब मौके पर पहुंचे थे तो बदमाश तो दूर, मुठभेड़ का ओर-छोर तक नहीं मिला था।
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14 जनवरी 2000 को हुए इस फर्जी मुठभेड़ से पुलिस का क्रूर चेहरा सामने आया था। जिसमें 15 साल बाद पीड़ित परिवार को सीबीआई कोर्ट से इंसाफ मिला है। नई कॉलोनी पल्लवपुरम निवासी एसके भादुड़ी मोदी रबर फैक्ट्री में इलेक्ट्रिशियन थे। मेरठ कॉलेज में बीएससी थर्ड ईयर की छात्रा उनकी बेटी स्मिता उस शाम करीब 5:30 बजे ट्यूशन जाने की बात कहकर घर से निकली थी। स्मिता की अपने सहपाठी बी ब्लॉक शास्त्रीनगर निवासी मोहित त्यागी से दोस्ती थी।
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उस शाम मोहित स्मिता को लेकर कार से दौराला में सिवाया के जंगल में गया था। कार एक कच्चे रास्ते पर रोककर दोनों कार में ही बैठे बातें कर रहे थे। इसी दौरान थाने पर सूचना पहुंची कि कार में कुछ बदमाश पेट्रोल पंप लूटने की फिराक में बैठे हैं। तत्कालीन इंस्पेक्टर दौराला अरुण कौशिक आनन-फानन में सिपाही भगवान सहाय और सुरेंद्र के साथ वहां पहुंचे। पुलिसकर्मियों ने बगैर तस्दीक करे कि कार में कौन मौजूद है, ताबड़तोड़ 11 गोलियां बरसा दीं। इनमें इंस्पेक्टर ने सरकारी रिवाल्वर से 5 और सिपाही भगवान सहाय ने ने छह गोलियां चलाई थीं। जिसमें स्मिता भादुड़ी की दो गोलियां लगने पर मौके पर मौत हो गई। हालात भांपते हुए मोहित खुद ही कार से बाहर निकला और डर के चलते आत्मसमर्पण कर दिया।
पुलिसवालों ने मोहित से पूछताछ की तो सबके होश उड़ गए। मामला तूल पकड़ने से पहले ही इंस्पेक्टर ने इसे मुठभेड़ बताते हुए अफसरों को सूचना दे दी। अफसर जब पहुंचे तो मामला फर्जी निकला। मोहित की तहरीर पर थाना दौराला पर इंस्पेक्टर और दोनों सिपाहियों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या (304 आईपीसी) का केस दर्ज हुआ। जिसकी विवेचना तत्कालीन एसएसपी आरपी सिंह ने एएसपी भजनी राम मीणा को सौंपी थी। तत्कालीन डीआईजी वीके गुप्ता ने धारा 304 आईपीसी की जगह सीधे हत्या का मामला बताते हुए इसे धारा 302 में तरमीम करने को कहा था, लेकिन वह नहीं किया गया।
मामला दबाना चाहती थी पुलिस
पुलिस ने कहानी बनाई थी कि पेट्रोल पंप पर लगातार लूटपाट की घटना हो रही थी। तभी सूचना मिली कि बदमाश लूटपाट करने आए है। पुलिस की गाड़ी देखकर मोहित ने अपनी गाड़ी भगा दी। दोनों तरफ से फायरिंग हुई, जिसमें स्मिता भादुड़ी की मौत हुई। सीबीआई ने दो बार चार्जशीट दाखिल पेश की। जांच में खुलासा हुआ कि फर्जी एनकाउंटर में छात्रा को मौत के घाट उतारा गया। आरोपी पुलिसकर्मियों ने अपने अधिकारियों को धोखे में रखकर अंधेरे में तीर चलाया था।