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हेपेटाइटिस सी: अब टेबलेट से होता है इलाज
Updated Mon, 19 Mar 2018 02:43 AM IST
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मेरठ। जिला अस्पताल स्थित हेपेटाइटिस-सी क्लीनिक में इस बीमारी से पीड़ित मरीज का निशुल्क इलाज किया जाता है। पहले इसके लिए इंजेक्शन लगाए जाते थे, लेकिन अब ओरल टैबलेट दी जाती हैं। टैबलेट के साइड इफेक्ट नहीं हैं।
हेपेटाइटिस सी पीड़ित मरीज का इलाज निजी अस्पताल कराने पर 30 से 50 हजार रुपये तक का खर्च आता है। वहीं जिला अस्पताल में यह सुविधा निशुल्क है। हेपेटाइटिस सी क्लीनिक के इंचार्ज डॉ. हेमंत ने बताया कि यहां पहले मरीज का रजिस्ट्रेशन कराया जाता है। इसके बाद काउंसिलिंग होती है। लेबोरेट्री में ब्लड सैंपल लेकर रैपिड और एंटीबॉडीज टेस्ट कराए जाते हैं। रिपोर्ट में यदि हेपेटाइटिस सी के लक्षण पाए जाते हैं तो उसका इलाज शुरू किया जाता है। इंफेक्शन के हिसाब से उसे सोफोसबुविर-डक्लटस्वीर टैबलेट दी जाती हैं। यह इस टैबलेट का जेनेरिक नाम है। किसी को यह हर रोज एक खानी होती है तो किसी को दो या इससे ज्यादा भी। यहां जीनोटाइप वन और जीनोटाइप थ्री के मरीज ज्यादा होते हैं। जीनोटाइप वन के मरीजों में जीनोटाइप थ्री के मरीजों के मुकाबले इंफेक्शन कम होता है।
मरीजों की है भरमार
जिला अस्पताल में हेपेटाइटिस-सी के मरीजों की भरमार है। अभी तक यहां स्क्रीनिंग के लिए तारीख मिलती थी, लेकिन अब रजिस्ट्रेशन ही अगले तीन माह के लिए बंद कर दिए गए हैं। अभी भी करीब ढाई हजार मरीजों की स्क्रीनिंग के लिए वेटिंग हैं। हेपेटाइटिस-सी (यकृतशोथ ग) इसे काला पीलिया भी कहते हैं। यह एक संक्रामक रोग है, जो हेपेटाइटिस-सी वायरस एचसीवी की वजह से होता है और यकृत को प्रभावित करता है। यह वायरस रक्त से रक्त के संपर्क द्वारा फैलता है। इलाज और देखभाल से यह ठीक हो जाता है।
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25 प्रतिशत खुद हो जाते हैं ठीक
हेपेटाइटिस सी क्लीनिक के इंचार्ज डॉ. हेमंत ने बताया कि पहले रैपिड टेस्ट कराया जाता है, जिससे पता चलता है कि हेपेटाइटिस सी का इंफेक्शन कितना है। इंफेक्शन हुआ है या नहीं। दरअसल करीब 25 प्रतिशत मरीज अपने आप ठीक हो जाते हैं। इन्हें दवाओं की जरूरत नहीं पड़ती है, जो रिकवर नहीं कर पाते हैं उन्हें एंटीबॉडीज टेस्ट कराना पड़ता है। जिसमें देखा जाता है कि ब्लड में एक्टिव वायरल लोड है या नहीं। इसके बाद जीनोटाइप करते हैं। जीनोटाइप वन का इलाज करीब तीन माह और जीनोटाइप थ्री का इलाज करीब छह माह चलता है।
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हेपेटाइटिस सी पीड़ित मरीज का इलाज निजी अस्पताल कराने पर 30 से 50 हजार रुपये तक का खर्च आता है। वहीं जिला अस्पताल में यह सुविधा निशुल्क है। हेपेटाइटिस सी क्लीनिक के इंचार्ज डॉ. हेमंत ने बताया कि यहां पहले मरीज का रजिस्ट्रेशन कराया जाता है। इसके बाद काउंसिलिंग होती है। लेबोरेट्री में ब्लड सैंपल लेकर रैपिड और एंटीबॉडीज टेस्ट कराए जाते हैं। रिपोर्ट में यदि हेपेटाइटिस सी के लक्षण पाए जाते हैं तो उसका इलाज शुरू किया जाता है। इंफेक्शन के हिसाब से उसे सोफोसबुविर-डक्लटस्वीर टैबलेट दी जाती हैं। यह इस टैबलेट का जेनेरिक नाम है। किसी को यह हर रोज एक खानी होती है तो किसी को दो या इससे ज्यादा भी। यहां जीनोटाइप वन और जीनोटाइप थ्री के मरीज ज्यादा होते हैं। जीनोटाइप वन के मरीजों में जीनोटाइप थ्री के मरीजों के मुकाबले इंफेक्शन कम होता है।
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मरीजों की है भरमार
जिला अस्पताल में हेपेटाइटिस-सी के मरीजों की भरमार है। अभी तक यहां स्क्रीनिंग के लिए तारीख मिलती थी, लेकिन अब रजिस्ट्रेशन ही अगले तीन माह के लिए बंद कर दिए गए हैं। अभी भी करीब ढाई हजार मरीजों की स्क्रीनिंग के लिए वेटिंग हैं। हेपेटाइटिस-सी (यकृतशोथ ग) इसे काला पीलिया भी कहते हैं। यह एक संक्रामक रोग है, जो हेपेटाइटिस-सी वायरस एचसीवी की वजह से होता है और यकृत को प्रभावित करता है। यह वायरस रक्त से रक्त के संपर्क द्वारा फैलता है। इलाज और देखभाल से यह ठीक हो जाता है।
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25 प्रतिशत खुद हो जाते हैं ठीक
हेपेटाइटिस सी क्लीनिक के इंचार्ज डॉ. हेमंत ने बताया कि पहले रैपिड टेस्ट कराया जाता है, जिससे पता चलता है कि हेपेटाइटिस सी का इंफेक्शन कितना है। इंफेक्शन हुआ है या नहीं। दरअसल करीब 25 प्रतिशत मरीज अपने आप ठीक हो जाते हैं। इन्हें दवाओं की जरूरत नहीं पड़ती है, जो रिकवर नहीं कर पाते हैं उन्हें एंटीबॉडीज टेस्ट कराना पड़ता है। जिसमें देखा जाता है कि ब्लड में एक्टिव वायरल लोड है या नहीं। इसके बाद जीनोटाइप करते हैं। जीनोटाइप वन का इलाज करीब तीन माह और जीनोटाइप थ्री का इलाज करीब छह माह चलता है।