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सांसारिक सुख ही दुखों का कारण
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दोहरीघाट क्षेत्र के गोठा में चल रही संगीतमय रामकथा में गाजीपुर से पधारे मानस मर्मज्ञ पं. विनोद मिश्र ने कहा कि सांसारिक सुख ही सारे दुखों का कारण है। कोशिश होनी चाहिए कि हम प्रभु भक्ति में अपना समय बिताएं और उसका स्मरण हर समय करें। तभी हमें शांति मिल सकेगी।
श्रोताओं को फुलवारी दर्शन कराते हुए उन्होंने कहा कि मानस में दो वाटिका का वर्णन है। एक पुष्प वाटिका तथा दूसरी अशोक वाटिका दोनों में भक्ति है। एक योगी की वाटिका दूसरी भोगी की वाटिका। योगी की वाटिका में सीता रूपी भक्ति में परमात्मा के दर्शन होते हैं। वही योगी रूपी वाटिका को हनुमान जी उजाड़ देते हैं। मनुष्य का परम लक्ष्य परम पद की प्राप्ति होती है। सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति नहीं। संसार के सभी जीव सुख चाहते हैं। सुख की प्राप्ति कैसे होगी इसके लिए प्रयास नहीं करते बल्कि सांसारिक वस्तुओं के संग्रह में लगे हैं, जो दुख का कारण है।जब सुख की मूल भक्ति मिल जाए तो फिर पाना शेष नहीं रह जाता। कहा कि हमारी सनातन परंपरा में जितने भी भक्त हुए सभी ने भगवान की आराधना आत्मानंद के लिए किया। ईश्वर से भक्त कुछ मांगता नहीं। देवी कुंती ने भगवान से विपक्ति मांगी क्योंकि भगवान का दर्शन विपक्ति काल में होता रहा।
सुदामा ने भगवान से दरिद्रता मांगी क्योंकि एश्वर्य से भक्ति चली जाती है। प्रह्लाद ने तो भगवान से कह दिया कि मै आप से कुछ मांगू तो देना मत भक्त भगवान से भगवान को मांगते है। कथा के अंत में आरती प्रसाद वितरण हुआ। प्रवचन के दौरान भजनों से आचार्यो ने खूब लोगों को भक्ति रस का स्वाद चखाया।
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श्रोताओं को फुलवारी दर्शन कराते हुए उन्होंने कहा कि मानस में दो वाटिका का वर्णन है। एक पुष्प वाटिका तथा दूसरी अशोक वाटिका दोनों में भक्ति है। एक योगी की वाटिका दूसरी भोगी की वाटिका। योगी की वाटिका में सीता रूपी भक्ति में परमात्मा के दर्शन होते हैं। वही योगी रूपी वाटिका को हनुमान जी उजाड़ देते हैं। मनुष्य का परम लक्ष्य परम पद की प्राप्ति होती है। सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति नहीं। संसार के सभी जीव सुख चाहते हैं। सुख की प्राप्ति कैसे होगी इसके लिए प्रयास नहीं करते बल्कि सांसारिक वस्तुओं के संग्रह में लगे हैं, जो दुख का कारण है।जब सुख की मूल भक्ति मिल जाए तो फिर पाना शेष नहीं रह जाता। कहा कि हमारी सनातन परंपरा में जितने भी भक्त हुए सभी ने भगवान की आराधना आत्मानंद के लिए किया। ईश्वर से भक्त कुछ मांगता नहीं। देवी कुंती ने भगवान से विपक्ति मांगी क्योंकि भगवान का दर्शन विपक्ति काल में होता रहा।
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सुदामा ने भगवान से दरिद्रता मांगी क्योंकि एश्वर्य से भक्ति चली जाती है। प्रह्लाद ने तो भगवान से कह दिया कि मै आप से कुछ मांगू तो देना मत भक्त भगवान से भगवान को मांगते है। कथा के अंत में आरती प्रसाद वितरण हुआ। प्रवचन के दौरान भजनों से आचार्यो ने खूब लोगों को भक्ति रस का स्वाद चखाया।
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