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इमाम हुसैन की शहादत सुन छलक आए आंसू
अमर उजाला ब्यूरो, मैनपुरी
Updated Tue, 04 Oct 2016 11:40 PM IST
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मोहर्रम
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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माह-ए-मोहर्रम जगह-जगह मजलिसों का दौर शुरू हो गया है। देर रात तक जिक्र-ए-इमाम हुसैन हो रहा है। उलमा करबला की शहादत बया कर हजरत इमाम और अहले बैत कर जिंदगी पर रोशनी डाल रहे हैं। करबला के वाकिये को सुनकर लोगों की आंखों से आंसू आ गए।
शहर के इमामबाड़े में आयोजित मजलिस में बोलते हुए मौलाना वसीम ने कहा कि इसी दिन नवासा-ए-नबी हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के छोटे से लश्कर के साथ करबला आ गए। नहर अलकमा के पास खेमे लगा दिए। नहरे अलकमा फरात नदी का हिस्सा था। जब जालिम यजीद इमाम हुसैन के आने और नहर किनारे खेमे लगाने का पता चला, तो अपनी फौज के सरदार इब्ने जेयाद ने हजरत इमाम हुसैन को नहर किनारे से खेमे हटाने को कहा। इस पर जब हजरत इमाम हुसैन ने खेमे हटाने से इंकार कर दिया तो फौज ने नहर पर पहरा लगाकर पानी बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन ने इस्लाम को बचाने की खातिर ही खुद की शहादत दी। मौलाना ने बताया कि हिंदुस्तान ही एक इकलौता ऐसा देश है जहां सवा दो महीने तक अजादार गम-ए हुसैन मनाता है। बताते चलें कि दस मोहर्रम के दिन इमाम हुसैन को यजीदी लश्कर ने उनके 72 साथियों के साथ शहीद कर दिया था। इसमें एक हजरत इमाम हुसैन के छह महीने के बेटे हजरत अली असगर भी शामिल थे। शहादतों के बाद यजीदी लश्कर ने इनके घर की औरतों को गिरफ्तार कर करबला से कूफा व कूफा से शाम (सीरिया) यजीद के दरबार में पहुंचाया था।
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शहर के इमामबाड़े में आयोजित मजलिस में बोलते हुए मौलाना वसीम ने कहा कि इसी दिन नवासा-ए-नबी हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के छोटे से लश्कर के साथ करबला आ गए। नहर अलकमा के पास खेमे लगा दिए। नहरे अलकमा फरात नदी का हिस्सा था। जब जालिम यजीद इमाम हुसैन के आने और नहर किनारे खेमे लगाने का पता चला, तो अपनी फौज के सरदार इब्ने जेयाद ने हजरत इमाम हुसैन को नहर किनारे से खेमे हटाने को कहा। इस पर जब हजरत इमाम हुसैन ने खेमे हटाने से इंकार कर दिया तो फौज ने नहर पर पहरा लगाकर पानी बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन ने इस्लाम को बचाने की खातिर ही खुद की शहादत दी। मौलाना ने बताया कि हिंदुस्तान ही एक इकलौता ऐसा देश है जहां सवा दो महीने तक अजादार गम-ए हुसैन मनाता है। बताते चलें कि दस मोहर्रम के दिन इमाम हुसैन को यजीदी लश्कर ने उनके 72 साथियों के साथ शहीद कर दिया था। इसमें एक हजरत इमाम हुसैन के छह महीने के बेटे हजरत अली असगर भी शामिल थे। शहादतों के बाद यजीदी लश्कर ने इनके घर की औरतों को गिरफ्तार कर करबला से कूफा व कूफा से शाम (सीरिया) यजीद के दरबार में पहुंचाया था।
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