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सांप्रदायिक सौहार्द : महोबा में दो मुस्लिम करते हैं सुंदरकांड का पाठ

Tue, 22 Aug 2023 11:51 PM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, महोबा
संवाद न्यूज एजेंसी, महोबा Updated Tue, 22 Aug 2023 11:51 PM IST
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Communal Harmony: Two Muslims recite Sunderkand in Mahoba
महोबा। बुंदेलखंड के महोबा जिले में मुस्लिम समाज के दो लोगों ने सामाजिक एकता व सद्भाव की अनूठी मिसाल कायम की है। दोनों को पूरा सुंदरकांड कंठस्थ है। पहले जहां दोनों गांव में ही शामिल होकर हिंदू भाइयों के साथ सुंदरकांड का पाठ करते थे, तो अब वह दूर-दूर तक सुंदरकांड का पाठ करने जाते हैं। दोनों मुस्लिमों का सामाजिक सौहार्द का यह सिलसिला पिछले 16 सालों से चला आ रहा है।
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जिले की तहसील कुलपहाड़ क्षेत्र के सुगिरा गांव निवासी मो. जहीर और सुलेमान के लिए न कोई मजहब की दीवार है और न ही कोई भेदभाव। उनका तो सिर्फ एक ही जुनून है, सामाजिक सद्भाव कायम रहे। हिंदू भाइयों के साथ दोनों वर्षों से सुंदरकांड का पाठ करते आ रहे हैं। गांव व आसपास कहीं भी सुंदरकांड का पाठ होता है तो वह पूरी श्रद्धा के साथ पहुंचते हैं। अब तो सुगिरा समेत जिले में कहीं भी सुंदरकांड होता है तो इन्हें बुलाया जाता है। ये ईश्वर को एक मानते है।
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सोमवार की रात गांव के ही अमित द्विवेदी के घर में सुंदरकांड का पाठ हुआ। जिसमें दोनों मुस्लिम युवकों को पाठ पढ़ते देख कर लोग अचंभित थे। आज के इस दौर में दोनों मुस्लिम युवक कौमी एकता के साथ भाईचारे को मजबूत कर रहे है। ढोलक-मजीरा के बीच भक्ति में डूबे माहौल में मुस्लिम समाज के दोनों लोगों को सुंदरकांड का पाठ करता देख लोग उनकी सराहना कर रहे हैं।
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सुंदरकांड का पाठ करने वाले मो. जहीर बताते है कि वह वर्षों से सुंदरकांड का पाठ कर रहे है। हम सब ईश्वर की संतानें हैं। जिनको राजनीति की रोटियां सेंकना है वो हिंदू-मुस्लिम में भेद डाल रहे हैं। हमारी भावनाओं से खेल रहे हैं। सुलेमान ने बताया कि वह पिछले 16 वर्षों से सुंदरकांड का पाठ कर रहे है। हमारे गांव में हिंदू-मुस्लिम में कोई भेदभाव नहीं है। सभी धर्मों के लोग मिलकर रहते हैं और एक-दूसरे के त्योहार में भी शामिल होते हैं। जरूरत पड़ने पर हिन्दू भाई उनकी मदद भी करते हैं।

सुंदरकांड का पाठ करने वाले सुलेमान ने बताया कि उसके पिता बशीर रामलीला के मंचन के दौरान बाणासुर का अभिनय करते थे। पिता का निधन हो चुका है। उनके पिता ने अपने पुत्रों से कहा था कि उनकी मौत के बाद मुस्लिम रीति-रिवाज से उनका चालीसवां भी करना और हिंदू परंपरा के अनुसार तेरहवीं संस्कार भी करना। पिता के निधन पर परिजनों ने चालीसवां व तेरहवीं संस्कार दोनों किया था।
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