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Maharajganj News: महाभारत काल से जुड़ी है मां बनैलिया के दरबार की महिमा
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संवाद न्यूज एजेंसी
नौतनवा। नौतनवा में स्थित मां बनैलिया मंदिर भारत और नेपाल के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। हिमालय की तलहटी में अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज आठ किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। नवरात्र में यहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान राजा विराट के भवन से लौटते समय पांडवों ने मां वन शक्ति की आराधना की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने पिंडी स्वरूप में दर्शन दिए। कालांतर में माता की पिंडी खेतों के बीच समाहित हो गई। इसके बाद किसान केदार मिश्र के स्वप्न में माता ने दर्शन देकर खेत में मौजूद पिंडी को खोजने और वहां मंदिर बनवाने का निर्देश दिया।
बताया जाता है कि किसान केदार मिश्र ने वर्ष 1888 में पिंडी की खोज कर वहां छोटे मंदिर का निर्माण कराया। समय के साथ यह मंदिर विशाल धार्मिक स्थल के रूप में विकसित हो गया। मंदिर की विधिवत स्थापना 20 जनवरी 1991 को हुई। तभी से हर वर्ष इस तिथि को वार्षिकोत्सव मनाया जाता है। इस अवसर पर नगर में शोभायात्रा निकाली जाती है। मंदिर समिति के अध्यक्ष संतोष जायसवाल के अनुसार, यहां प्रतिदिन दूर-दराज से श्रद्धालु पूजा-अर्चना और मन्नत मांगने आते हैं।
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नौतनवा। नौतनवा में स्थित मां बनैलिया मंदिर भारत और नेपाल के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। हिमालय की तलहटी में अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज आठ किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। नवरात्र में यहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान राजा विराट के भवन से लौटते समय पांडवों ने मां वन शक्ति की आराधना की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने पिंडी स्वरूप में दर्शन दिए। कालांतर में माता की पिंडी खेतों के बीच समाहित हो गई। इसके बाद किसान केदार मिश्र के स्वप्न में माता ने दर्शन देकर खेत में मौजूद पिंडी को खोजने और वहां मंदिर बनवाने का निर्देश दिया।
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बताया जाता है कि किसान केदार मिश्र ने वर्ष 1888 में पिंडी की खोज कर वहां छोटे मंदिर का निर्माण कराया। समय के साथ यह मंदिर विशाल धार्मिक स्थल के रूप में विकसित हो गया। मंदिर की विधिवत स्थापना 20 जनवरी 1991 को हुई। तभी से हर वर्ष इस तिथि को वार्षिकोत्सव मनाया जाता है। इस अवसर पर नगर में शोभायात्रा निकाली जाती है। मंदिर समिति के अध्यक्ष संतोष जायसवाल के अनुसार, यहां प्रतिदिन दूर-दराज से श्रद्धालु पूजा-अर्चना और मन्नत मांगने आते हैं।
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