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Maharajganj News: दर्जिनिया ताल...यहां सुस्त पड़ गई है विकास की चाल
Sun, 26 Mar 2023 07:05 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
Updated Sun, 26 Mar 2023 07:05 AM IST
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दर्जिनिया ताल।संवाद
महराजगंज जिले में पर्यटन के विकास का पहिया जाम हो गया है। बेहतर सुविधा नहीं मिलने के कारण पर्यटक जाना नहीं चाहते हैं। सबसे प्रमुख पर्यटन स्थल दर्जिनिया ताल 14 लाख खर्च होने के बाद भी संवर नहीं सका। यहां विकास की चाल सुस्त पड़ गई है। इस ताल को संवारने के लिए 50 लाख के बजट की दरकार है। वर्तमान में वाॅच टाॅवर से लेकर बैठने के लगे बेंच भी खराब हो चुके हैं। ताल को खूबसूरत दिखाने के लिए कुछ खास प्रयास नहीं दिख रहा है।
दर्जिनिया ताल पर मगरमच्छ देखने वाले पर्यटकों की भीड़ कम हो रही है। पहले यहां प्रतिदिन 200 से 250 पर्यटक पहुंचते थे। अब अधिकतम 100 पर्यटक ही आते हैं। दर्जिनिया ताल तक लोगों को पहुंचाने व मगरमच्छों की चहलकदमी दिखाने के लिए वर्ष 2016 में शासन ने 14.50 लाख रुपये दिए थे। रकम से ताल का सुंदरीकरण, पर्यटकों के बैठने की व्यवस्था कराई गई थी।
ताल के बीच में मगरमच्छों को देखने के लिए वाॅच टाॅवर बनाने के लिए दो लाख रुपये खर्च हुए थे। बीते एक वर्ष में करीब 70 हजार पर्यटकों ने मनोरम वादियों के बीच स्थित दर्जिनिया ताल पर पहुंचकर मगरमच्छों को देखकर लुत्फ उठाया है।
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पर्यटकों को मगरमच्छ देखने के लिए दूरबीन कैमरे, वाॅच टॉवर, बैठने, स्वच्छ पेयजल के अलावा अन्य व्यवस्थाएं की गई थीं। ये अब बदहाल हो चुकी हैं। बीते जनवरी के आंकड़ों को देखा जाए तो औसतन हर रोज 150 से 200 पर्यटक ताल पर पहुंचते थे। फरवरी 2023 से अब तक के आंकड़ों देखा जाए तो औसतन हर रोज 60 से 100 पर्यटक ताल पर पहुंच रहे हैं।
पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला दर्जिनिया ताल
दर्जिनिया ताल करीब पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। मनोरम वादियों के कारण यहां मगरमच्छों के लिए अनुकूल आबोहवा है। प्रत्येक वर्ष इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष हुई गणना में इनकी संख्या 350 थी। इस वर्ष इनकी संख्या बढ़कर करीब 450 पहुंच गई है।
दर्जिनिया पर पर्यटकों का घूमने का सही समय
दर्जिनिया ताल घूमने और मगरमच्छों को आसानी से घंटों तक देखने के लिए नवंबर से मार्च का महीना सबसे बेहतर माना जाता है। ठंड के दौरान मगरमच्छ ज्यादातर समय रेस्टिंग आइलैंड पर बिताते हैं। यहां मगरमच्छों को अठखेलियां करते हुए देखा जा सकता है।
बटरफ्लाई पार्क भी नहीं बन सका
दर्जिनिया में 80 लाख की लागत से करीब 50 डिस्मिल जमीन पर पूर्वांचल का पहला बटरफ्लाई पार्क बनेगा। इसके किनारे तकरीबन 70 मीटर इंटरलॉकिंग सड़क होगी। पर्यटक आराम से टहल कर सैकड़ों प्रजाति की रंग-बिरंगी तितलियों को भी देख कर लुत्फ उठा सकेंगे। वहीं, पार्क में एंट्री गेट, ओक ट्री सहित अनेक प्रजाति के प्लांट लगाए जाएंगे। अभी इस योजना की फाइल शासन में धूल फांक रही है।
काठ बंगले को संवरने का इंतजार
शिवपुर यूनिट में जंगल के बीच बना काठ बंगला आज बदहाल है। कभी इसे देखने के लिए नेपाल, बिहार या अन्य जगहों से लोग आते थे। 1970 में बने इस लकड़ी के डाक बंगले में आधुनिक युग की सभी सुविधाएं थीं। अब यह बेकार हो चुका है। इसमें दो बेडरूम अटैच बाथरूम, एक किचन, एक डाइनिंग हाॅल, बरामदा, सोफा, लाइटिंग आदि का कार्य कराया जाना प्रस्तावित है।
पर्यटकों को रास नहीं आ रहा जंगल सफारी
सोहगीबरवां वन्यजीव प्रभाग में जंगल सफारी करीब 34 किलोमीटर में है। इसमें अनेक प्रकार के वन्य जीव और पक्षियों को देखा जा सकता है। दो रूटों पर सफारी के रोमांच का आनंद लेने के लिए पर्यटकों को 3700 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। सफारी के प्रत्येक ट्रिप से वन विभाग को 300 रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। पर्यटकों को सुविधा नहीं मिलने से यह व्यवस्था भी बदहाल हो चुकी है। जंगल के अंदर बनी झोपड़ी में चूल्हा भी बुझ चुका है। पर्यटकों को लुभाने के लिए बेहतर सुविधा देने का दावा किया गया था।
रकम मिलने पर काम शुरू है
निचलौल रेंजर सुनील राव ने बताया कि पिछले वर्ष अक्तूबर में मधवलिया और डोमा विश्राम गृह के जीर्णोद्धार के लिए 10-10 लाख रुपये का बजट बनाकर भेजा गया था। इसमें फरवरी में 5-5 लाख रुपये मिलने के बाद से कार्य शुरू करा दिया गया है। काठ बंगला के लिए 20 लाख और दर्जिनिया ताल के लिए 50 लाख रुपये की बजट की मांग की गई है। अभी तक कोई धनराशि प्राप्त नहीं हुई है।
सुविधा नहीं होने से पर्यटकों में निराशा
बैठवलिया गांव के प्रभाकर कहते हैं कि सुविधा नहीं बढ़ाई जा रही है। सिर्फ प्रस्ताव बनाकर भेजा जाता है, कुछ होता नहीं है। सुविधा बढ़ती तो पर्यटन का विकास होता।
जयश्री के सत्येंद्र यादव ने बताया कि पर्यटन विकास के लिए कुछ किया नहीं जा रहा है। समस्याओं का समाधान नहीं किया जा रहा है।
जिले में पर्यटन को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है। जंगल सफारी संचालित है। पर्यटकों को बेहतर सुविधा देने के लिए व्यवस्था बनाई जा रही है।-सत्येंद्र कुमार, जिलाधिकारी
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दर्जिनिया ताल पर मगरमच्छ देखने वाले पर्यटकों की भीड़ कम हो रही है। पहले यहां प्रतिदिन 200 से 250 पर्यटक पहुंचते थे। अब अधिकतम 100 पर्यटक ही आते हैं। दर्जिनिया ताल तक लोगों को पहुंचाने व मगरमच्छों की चहलकदमी दिखाने के लिए वर्ष 2016 में शासन ने 14.50 लाख रुपये दिए थे। रकम से ताल का सुंदरीकरण, पर्यटकों के बैठने की व्यवस्था कराई गई थी।
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ताल के बीच में मगरमच्छों को देखने के लिए वाॅच टाॅवर बनाने के लिए दो लाख रुपये खर्च हुए थे। बीते एक वर्ष में करीब 70 हजार पर्यटकों ने मनोरम वादियों के बीच स्थित दर्जिनिया ताल पर पहुंचकर मगरमच्छों को देखकर लुत्फ उठाया है।
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पर्यटकों को मगरमच्छ देखने के लिए दूरबीन कैमरे, वाॅच टॉवर, बैठने, स्वच्छ पेयजल के अलावा अन्य व्यवस्थाएं की गई थीं। ये अब बदहाल हो चुकी हैं। बीते जनवरी के आंकड़ों को देखा जाए तो औसतन हर रोज 150 से 200 पर्यटक ताल पर पहुंचते थे। फरवरी 2023 से अब तक के आंकड़ों देखा जाए तो औसतन हर रोज 60 से 100 पर्यटक ताल पर पहुंच रहे हैं।
पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला दर्जिनिया ताल
दर्जिनिया ताल करीब पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। मनोरम वादियों के कारण यहां मगरमच्छों के लिए अनुकूल आबोहवा है। प्रत्येक वर्ष इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष हुई गणना में इनकी संख्या 350 थी। इस वर्ष इनकी संख्या बढ़कर करीब 450 पहुंच गई है।
दर्जिनिया पर पर्यटकों का घूमने का सही समय
दर्जिनिया ताल घूमने और मगरमच्छों को आसानी से घंटों तक देखने के लिए नवंबर से मार्च का महीना सबसे बेहतर माना जाता है। ठंड के दौरान मगरमच्छ ज्यादातर समय रेस्टिंग आइलैंड पर बिताते हैं। यहां मगरमच्छों को अठखेलियां करते हुए देखा जा सकता है।
बटरफ्लाई पार्क भी नहीं बन सका
दर्जिनिया में 80 लाख की लागत से करीब 50 डिस्मिल जमीन पर पूर्वांचल का पहला बटरफ्लाई पार्क बनेगा। इसके किनारे तकरीबन 70 मीटर इंटरलॉकिंग सड़क होगी। पर्यटक आराम से टहल कर सैकड़ों प्रजाति की रंग-बिरंगी तितलियों को भी देख कर लुत्फ उठा सकेंगे। वहीं, पार्क में एंट्री गेट, ओक ट्री सहित अनेक प्रजाति के प्लांट लगाए जाएंगे। अभी इस योजना की फाइल शासन में धूल फांक रही है।
काठ बंगले को संवरने का इंतजार
शिवपुर यूनिट में जंगल के बीच बना काठ बंगला आज बदहाल है। कभी इसे देखने के लिए नेपाल, बिहार या अन्य जगहों से लोग आते थे। 1970 में बने इस लकड़ी के डाक बंगले में आधुनिक युग की सभी सुविधाएं थीं। अब यह बेकार हो चुका है। इसमें दो बेडरूम अटैच बाथरूम, एक किचन, एक डाइनिंग हाॅल, बरामदा, सोफा, लाइटिंग आदि का कार्य कराया जाना प्रस्तावित है।
पर्यटकों को रास नहीं आ रहा जंगल सफारी
सोहगीबरवां वन्यजीव प्रभाग में जंगल सफारी करीब 34 किलोमीटर में है। इसमें अनेक प्रकार के वन्य जीव और पक्षियों को देखा जा सकता है। दो रूटों पर सफारी के रोमांच का आनंद लेने के लिए पर्यटकों को 3700 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। सफारी के प्रत्येक ट्रिप से वन विभाग को 300 रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। पर्यटकों को सुविधा नहीं मिलने से यह व्यवस्था भी बदहाल हो चुकी है। जंगल के अंदर बनी झोपड़ी में चूल्हा भी बुझ चुका है। पर्यटकों को लुभाने के लिए बेहतर सुविधा देने का दावा किया गया था।
रकम मिलने पर काम शुरू है
निचलौल रेंजर सुनील राव ने बताया कि पिछले वर्ष अक्तूबर में मधवलिया और डोमा विश्राम गृह के जीर्णोद्धार के लिए 10-10 लाख रुपये का बजट बनाकर भेजा गया था। इसमें फरवरी में 5-5 लाख रुपये मिलने के बाद से कार्य शुरू करा दिया गया है। काठ बंगला के लिए 20 लाख और दर्जिनिया ताल के लिए 50 लाख रुपये की बजट की मांग की गई है। अभी तक कोई धनराशि प्राप्त नहीं हुई है।
सुविधा नहीं होने से पर्यटकों में निराशा
बैठवलिया गांव के प्रभाकर कहते हैं कि सुविधा नहीं बढ़ाई जा रही है। सिर्फ प्रस्ताव बनाकर भेजा जाता है, कुछ होता नहीं है। सुविधा बढ़ती तो पर्यटन का विकास होता।
जयश्री के सत्येंद्र यादव ने बताया कि पर्यटन विकास के लिए कुछ किया नहीं जा रहा है। समस्याओं का समाधान नहीं किया जा रहा है।
जिले में पर्यटन को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है। जंगल सफारी संचालित है। पर्यटकों को बेहतर सुविधा देने के लिए व्यवस्था बनाई जा रही है।-सत्येंद्र कुमार, जिलाधिकारी