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Maharajganj News: देवदह व रामग्राम के बाद अब कुंवरवर्ती स्तूप के तलाश किए जाएंगे साक्ष्य

Tue, 04 Aug 2026 12:30 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Tue, 04 Aug 2026 12:30 AM IST
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After Devadaha and Ramagrama, evidence of the Kunvarvarti Stupa will now be sought.
महराजगंज। बौद्ध स्थल देवदह (बनरसिहा कला) और रामग्राम में उत्खनन के बाद अब जिले में कुंवरवर्ती स्तूप के साक्ष्य तलाशे जाएंगे। इस स्तूप का जिक्र चीन के बौद्ध भिक्षु युवांग च्वांग ने अपने यात्रा वृत्तांत सी-यु-की में किया है। नेपाल सीमा के करीब स्थित झुलनीपुर क्षेत्र में स्थित कुंवर बाती मंदिर के आसपास इसकी संभावना जताई जा रही है। अगर इसकी पुष्टि हो जाती है तो जिले के बौद्ध सर्किट में शामिल होने की संभावना भी बढ़ जाएगी।
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बौद्ध सर्किट में शामिल पिपरहवा (सिद्धार्थनगर), लुंबिनी (नेपाल), कुशीनारा (कुशीनगर) के मध्य में स्थित महराजगंज को ग्रंथों में महात्मा बुद्ध का ननिहाल बताया गया है। बुद्ध के ननिहाल माने गए देवदह और बुद्ध की अस्थियों को सुरक्षित रखने के स्थान रामग्राम में 20 करोड़ रुपये की लागत से पर्यटन विकास कार्य पूरा हो रहा है। पर्यटन विकास की योजना के तहत शासन को एक और प्रस्ताव भेजा गया है। इसके साथ ही जनपद में उस स्थल की तलाश भी तेज हुई है जिसे बौद्ध ग्रंथों में कुंवरवर्ती स्तूप बताया गया है।
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बीते सप्ताह क्षेत्रीय सहायक पुरातत्व अधिकारी और सहायक जिला पर्यटन अधिकारी ने नेपाल बॉर्डर से सटे झुलनीपुर क्षेत्र में कुंवरवर्ती स्तूप की संभावना वाले एक प्राचीन सरोवर का निरीक्षण किया है। पुरातत्व विभाग की टीम को इस सरोवर के चारों तरफ मिट्टी की एक प्राचीन दीवार मिली है। इस दीवार की पुरानी मिट्टी पत्थर की तरह सख्त हो चुकी है। यहां कुंवर बाती थान नाम का एक मंदिर है जहां लोग आज भी मुंडन संस्कार कराना शुभ मानते हैं। अनुमान है कि यहां उत्खनन में पुरातात्विक साक्ष्य मिल सकते हैं।
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चीनी यात्री ने 629 ईसवी में की थी भारत की यात्रा
कुंवरवर्ती स्तूप के बारे में जवाहर लाल नेहरू पीजी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. परशुराम गुप्ता ने अपनी किताब महराजगंज के बौद्ध स्थल में लिखा है। उन्होंने बताया कि कुंवरवर्ती स्तूप का जिक्र युवांग च्वांग (ह्वेन सांग) ने अपनी पुस्तक सी-यु-की में किया है। थॉमस वाटर्स की पुस्तक ऑन युवान च्वांग ट्रैवेल इन इंडिया भी इसकी तस्दीक करती है। कुंवरवर्ती स्तूप अशोक के शासनकाल में बना था जो झुलनीपुर स्थित पोखरे के मध्य में स्थित था। डॉ. गुप्ता ने दावा किया कि अगर पोखरे के मध्य भाग का उत्खनन कराया जाए तो स्तूप संरचना की नींव मिल सकती है। युवांग की पुस्तक में सरोवर के ईशान कोण में देवी स्थल का जिक्र है जो आज भी कुंवर बाती थान के रूप में पहचाना जाता है। यहां भगवान बुद्ध ने अपने राज वस्त्र का त्याग किया था और बाल मुंडवाकर भिक्षु बन गए थे। यहां आज भी मुंडन की परंपरा बनी हुई है।


कुंवरवर्ती स्तूप का जिक्र बौद्ध ग्रंथों में है। दूरी और पहचान के मुताबिक भारत-नेपाल की सीमा के निकट झुलनीपुर क्षेत्र में वही कुंवर बाती स्थान है। पुरातत्व विभाग की टीम ने उस स्थान का निरीक्षण किया है। जल्द ही एक और निरीक्षण किया जाएगा जिसके बाद शासन को प्रस्ताव भेजकर उत्खनन की अनुमति ली जाएगी।

- कृष्ण मोहन दुबे, सहायक क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी, गोरखपुर


महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों के बावजूद जिला बौद्ध सर्किट में पहचान नहीं बना सका। दो बौद्ध स्थलों पर पर्यटन विकास के काम तेज कराकर एक और प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। कुंवरवर्ती स्तूप का स्थल भी जनपद में ही है। तलाश करने के लिए पुरातत्व व पर्यटन विभाग से कहा गया है। इस स्तूप का स्थान भारत-नेपाल सीमा के प्राचीन सरोवर के उत्खनन से सिद्ध हो सकता है। इन तीनों स्थलों के पर्यटन विकास से महराजगंज को बौद्ध सर्किट में अहम पहचान हासिल हो सकती है।
- गौरव सिंह सोगरवाल, जिलाधिकारी, महराजगंज
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