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नीलकंठ मंदिर की बदरंग इमारत कब होगी रंगीन

Tue, 17 Oct 2017 12:34 AM IST
Lalitpur
Lalitpur Updated Tue, 17 Oct 2017 12:34 AM IST
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worst condition of Neelkantha temple
administration news - फोटो : amar ujala

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पाली। पुरातत्व विभाग अपने अधीन मंदिर श्री नीलकंठेश्वर धाम में न कुछ खास विकास करता है और न ही किसी आमजन को करने देता है। ये पीड़ा है पालीवासियों की यहां आने वाले नित्य श्रद्धालुओं और सैलानियों की।  लोगों के घरों से लेकर हर एक देवालय दीपावली पर्व के स्वागत में अपनी अलग छटा बिखेरने की तैयारी में जुटे हैं। कितनी ही दीपावली यहां आई और चली गईं, लेकिन पुरातत्व विभाग ने कभी इस मंदिर को रंग रोगन करने की जिम्मेदारी नहीं दिखाई । यही वजह है कि भगवान भोलेबाबा के दर्शन और फैली प्राकृतिक सुंदरता को छोड़ दे तो सबकुछ बदरंग नजर आता है ।
  जिला मुख्यालय ललितपुर से पच्चीस किलोमीटर की दूरी पर कस्बा पाली के विंध्यांचल पर्वत की श्रृंखला में भगवान शिव का चंदेल कालीन शिखरविहीन नीलकंठधाम है । गर्भगृह में भगवान भोले अपने त्रिमुखी रूप में विराजमान हैं। आंगन में खुले आसमान के नीचे भोले की सवारी नन्दी की मूर्ति है। मूर्ति के दर्शन करने के बाद लोगों के मन में तमाम जिज्ञासाएं पैदा हो जाती हैं, कभी वह किसी से पूछकर तो कभी अपने अंतर्मन से पूर्ण करने में जुटा रहता है।
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आस्था के साथ अपने अंदर कई रहस्यों को समाए यह मंदिर बीते कई सालों से पुरातत्व विभाग के अधीन है। इससे पहले यहां भोले बाबा के भक्त अपने तरीके से यहां विकास की इबारत लिखते थे। ऐसे अब भी बहुत भक्त है जिनकी मुंह मांगी मुराद भोलेबाबा के दरबार में पूरी हुई। मन की मुराद पूरी होने पर भक्तों के मन में भी यहां कुछ छोटा बड़ा करने का मन भी होता है, लेकिन चाहकर भी वो ऐसा नहीं कर पाते, क्योंकि मंदिर बरसों से पुरातत्व विभाग के अधीन है। इसकी अनुमति के बिना यहां से कोई एक ईंट रख या उठा नहीं सकता। लोग बताते हैं कि यहां से अनुमति मिलना नामुमकिन सा है। ऐसी ही वजहों के चलते जहां लोग मनमसोस कर रह जाते हैं, वहीं पुरातत्व विभाग आगे खड़ा नजर नहीं आता। मंदिर की मुख्य दीवारों से लेकर यहां की अन्य इमारतें जलकुंड बदरंग नजर आते हैं।
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प्राकृतिक जलश्रोत से बुझती है प्यास
पाली। मंदिर में आने वाले लोगों की प्यास यहां बने प्राकृतिक जलकुंड से बुझती है। बीते एक साल से यहां का नलकूप खराब पड़ा है। जलकुंड से मोटर के माध्यम से मंदिर तक पानी पहुंचाया जा रहा है । कई मौके ऐसे भी आते हैं जब जलकुंड की धार कम पड़ जाती है। ऐसे वक्त पर यहां पानी की विकराल समस्या पैदा हो जाती है।


नहीं मिली अनुमति
पाली। आसमान के नीचे स्थापित नन्दी मूर्ति उपेक्षा की भेंट चढ़ गई है। मान्यता है कि खंडित समझी जाने वाली मूर्ति की पूजा से पुण्य लाभ नहीं मिलता। इसके चलते लोगों ने नई नन्दी मूर्ति को स्थापित करने का मन बनाया है।  विभाग से अनुमति के लिए बड़े चक्कर लगाए गए, लेकिन अब तक कोई अनुमति नहीं मिली ।

 
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