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फर्जी अनुभव प्रमाण-पत्र में मामले में कसा शिकंजा
Updated Wed, 08 Aug 2018 02:20 AM IST
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फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र में मामले में कसा शिकंजा
अमृत योजना का 2.17 करोड़ का काम हड़पने का है मामला
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। जल संस्थान के अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी कार्य अनुभव प्रमाण-पत्र बनकर अमृत योजना का करीब 2.17 करोड़ लागत का काम हड़पने के मामले में जिला प्रशासन से शिकंजा कस दिया है। डीएम के निर्देशन पर एडीएम ने जल संस्थान व जल निगम के अधिकारियों को पत्रावलियों के साथ तलब कर लिया है। इससे जल संस्थान विभाग में हड़कंप का माहौल है।
जल निगम में पंजीकृत ठेकेदार रमेश यादव ने जल संस्थान के तत्कालीन व वर्तमान में तैनात अधिकारियों के साथ मिलीभगत से करीब साढ़े 04 करोड़ रुपये के कार्य अनुभव का फर्जी प्रमाण पत्र बनवाकर केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी अमृत योजना का करीब 2.17 करोड़ रुपये का कार्य हड़पा लिया है। इसका खुलासा विगत दिनों एक आरटीआई में हुआ है, जिसमें जल संस्थान के अधिशासी अभियंता ने लिखित रूप में दिया है कि उक्त कार्य अनुभव प्रमाण पत्र में जिन पांच कार्यों को दर्शाया गया है, विभागीय अभिलेखों में उनमें से तीन कार्यों का अनुबंध पत्रांक गलत है। इस फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी मानवेंद्र सिंह ने विगत दिनों मामले की जांच शुरू कर दी थी। अब यह जांच जिलाधिकारी ने अपर जिलाधिकारी योगेंद्र बहादुर सिंह को दे दी है। विगत रोज अपर जिलाधिकारी ने जल संस्थान व जल निगम दोनों के ही अधिकारियों को कलेक्ट्रेट में संबंधित पत्रावालियों समेत तलब किया। इसके बाद उन्होंने पत्रावालियों को खंगालना शुरु कर दिया है। अपर जिलाधिकारी ने बताया कि मामले की जल्द ही जांच कर, रिपोर्ट जिलाधिकारी को प्रेषित कर दी जाएगी।
यह हैं जांच के मुख्य बिंदू
इस मामले के ऐसे कुछ मुख्य बिंदू हैं जो जांच अधिकारियों को इस फर्जीबाड़े की हकीकत तक ले जा सकते हैं। जल संस्थान के अधिकारियों ने करीब 04 लाख 45 लाख रुपए की लागत का कार्य अनुभव प्रमाण पत्र बनाया है। इसमें पांच कार्यों का अनुभव बताया गया है, पांचों की लागत लगभग एक जैसी 90 लाख के करीब है। इसके अलावा यह पांचों कार्य एक वर्ष के कार्यकाल के हैं। विभागीय अधिकारियों की मानें तो पूरे एक साल का इतना विभाग का कुल बजट ही नहीं होता है, जितना अनुभव प्रमाण पत्र बना दिया गया है। यदि अनुभव प्रमाण पत्र में दर्शाय गए कार्यों का भौतिक सत्यापन करा लिया जाए और भुगतान के वित्तीय अभिलेख देख लिए जाएं तो सारी हकीकत सामने आ जाएगी।
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अमृत योजना का 2.17 करोड़ का काम हड़पने का है मामला
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। जल संस्थान के अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी कार्य अनुभव प्रमाण-पत्र बनकर अमृत योजना का करीब 2.17 करोड़ लागत का काम हड़पने के मामले में जिला प्रशासन से शिकंजा कस दिया है। डीएम के निर्देशन पर एडीएम ने जल संस्थान व जल निगम के अधिकारियों को पत्रावलियों के साथ तलब कर लिया है। इससे जल संस्थान विभाग में हड़कंप का माहौल है।
जल निगम में पंजीकृत ठेकेदार रमेश यादव ने जल संस्थान के तत्कालीन व वर्तमान में तैनात अधिकारियों के साथ मिलीभगत से करीब साढ़े 04 करोड़ रुपये के कार्य अनुभव का फर्जी प्रमाण पत्र बनवाकर केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी अमृत योजना का करीब 2.17 करोड़ रुपये का कार्य हड़पा लिया है। इसका खुलासा विगत दिनों एक आरटीआई में हुआ है, जिसमें जल संस्थान के अधिशासी अभियंता ने लिखित रूप में दिया है कि उक्त कार्य अनुभव प्रमाण पत्र में जिन पांच कार्यों को दर्शाया गया है, विभागीय अभिलेखों में उनमें से तीन कार्यों का अनुबंध पत्रांक गलत है। इस फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी मानवेंद्र सिंह ने विगत दिनों मामले की जांच शुरू कर दी थी। अब यह जांच जिलाधिकारी ने अपर जिलाधिकारी योगेंद्र बहादुर सिंह को दे दी है। विगत रोज अपर जिलाधिकारी ने जल संस्थान व जल निगम दोनों के ही अधिकारियों को कलेक्ट्रेट में संबंधित पत्रावालियों समेत तलब किया। इसके बाद उन्होंने पत्रावालियों को खंगालना शुरु कर दिया है। अपर जिलाधिकारी ने बताया कि मामले की जल्द ही जांच कर, रिपोर्ट जिलाधिकारी को प्रेषित कर दी जाएगी।
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यह हैं जांच के मुख्य बिंदू
इस मामले के ऐसे कुछ मुख्य बिंदू हैं जो जांच अधिकारियों को इस फर्जीबाड़े की हकीकत तक ले जा सकते हैं। जल संस्थान के अधिकारियों ने करीब 04 लाख 45 लाख रुपए की लागत का कार्य अनुभव प्रमाण पत्र बनाया है। इसमें पांच कार्यों का अनुभव बताया गया है, पांचों की लागत लगभग एक जैसी 90 लाख के करीब है। इसके अलावा यह पांचों कार्य एक वर्ष के कार्यकाल के हैं। विभागीय अधिकारियों की मानें तो पूरे एक साल का इतना विभाग का कुल बजट ही नहीं होता है, जितना अनुभव प्रमाण पत्र बना दिया गया है। यदि अनुभव प्रमाण पत्र में दर्शाय गए कार्यों का भौतिक सत्यापन करा लिया जाए और भुगतान के वित्तीय अभिलेख देख लिए जाएं तो सारी हकीकत सामने आ जाएगी।
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