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उपेक्षा का दंश झेल रहा चांदपुर-जहाजपुर का पुरातत्व

Fri, 16 Feb 2018 01:52 AM IST
Updated Fri, 16 Feb 2018 01:52 AM IST
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उपेक्षा का दंश झेल रहा चांदपुर-जहाजपुर का पुरातत्व
पहचान खो रही चांदपुर-जहाजपुर की पुरा संपदा
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ललितपुर। बेतवा नदी किनारे स्थित बारहवीं शताब्दी की चंदेलकालीन प्राचीन धरोहर चांदपुर-जहाजपुर के प्राचीन मंदिर अब उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। देवी देवताओं की हजारों खंडित प्रतिमाएं यहां के प्राचीन मंदिरों में बिखरीं पड़ीं हैं। आकर्षक नक्काशी युक्त मंदिर सैलानियों को लुभाने की अब भी सामर्थ्य रखते हैं। पुरातत्व विभाग द्वारा मात्र एक साइन बोर्ड लगाकर अपना काम पूरा मान लिया है। नंदी और वराह भगवान की विशालकाय मूर्तियां इन मंदिरों की प्राचीनता की कहानी आज भी बयां करती हैं।
विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित ललितपुर जनपद की चंदेल कालीन पुरातात्विक व प्राचीन संपदाओं के लिए विश्व विख्यात है। प्राचीन मंदिरों में धार्मिक किवदंतियों पर आधारित घटनाओं को आधार बनाकर उकेरी गईं देवी देवताओं की प्रतिमाएं आज भी अपने आप में लोक गाथाओं को संजोए हुए हैं। जनपद में प्राचीन देवगढ़ स्थित दशावतार और वराह मंदिर के अलावा दूधई, चांदपुर-जहाजपुर में अपार पुरातत्व संपदाएं बिखरी पड़ी हैं। पुरातत्व विभाग की अपेक्षा से यह देवस्थल अपना अस्तित्व खोने की कगार पर पहुंच गया है। चांदपुर-जहाजपुर में अब कुछ ही मंदिरों में मूर्तियां विराजमान हैं और वह भी खंडित हो चुकी हैं। जहाजपुर में तला का बाड़ा के दो तरफ के प्राचीन खंडित मंदिर अपने इतिहास की कहानी खुद ही बयां कर रहे हैं। लाल पत्थरों से बने इन प्राचीन मंदिरों के प्रत्येक द्वार पर देवी-देवताओं की आकर्षण कलाकृतियां बनी हुई हैं। अधिकांश स्थानों पर नंदी और वराह भगवान की मूर्तियां भी अपना अस्तित्व दर्शाती हैं। तालाब के पीछे की ओर दो मंदिर हैं जहां एक मंदिर के चारों ओर मुख्य द्वार के साथ दीवारों पर गणेश, वराह भगवान के अलावा अन्य देवी देवताओं के साथ ही हाथी घोड़ा और शेर की कलाकृतियां भी बनी हुई हैं, जिनकी भव्यता देखते ही बनती है। यहां पर कम पानी युक्त तालाब के बीचों बीच एक स्तंभ गढ़ा हुआ है, जिस पर भी कलाकृतियां उकेरी गई हैं। वहीं, रेल लाइन के दूसरी ओर पश्चिम दिशा में ही पत्थरों की बाउंड्री युक्त आधा दर्जन खंडित मंदिरों का देवस्थान भी स्थित है, जो अपनी बर्बादी की कहानी बयां करता है। इस स्थान पर सैकड़ों वर्ष पूर्व इन पुरानी मंदिरों और उनमें स्थापित प्रतिमाओं का तोड़ा गया होगा। स्थानीय लोगों के अनुसार वह और उनके पूर्वजों द्वारा इन मंदिरों को इसी स्थिति में देखा गया है। इन मंदिरों के चारों ओर बिना शिवलिंग के दर्जनों आधार शिलायुक्त अवशेष भी नजर आते हैं। वहीं, यहां विशाल मानव पैर नुमा अधूरी प्रतिमाएं जैसी सैकड़ों प्रतिमाएं भी बिखरी पड़ी हैं। यहां स्थित यह खंडित और मूर्ति विहीन मंदिरों को अब भी पुरातत्व संरक्षण की आवश्यकता है, लेकिन पुरातत्व विभाग ने इनके संरक्षण के नाम पर एक बोर्ड लगा रखा है। लेकिन, इनके अस्तित्व को बचाने के लिए अब तक गंभीरता के साथ कोई भी प्रयास नहीं किए गए हैं। हर बार शासन द्वारा पुरातत्व को संजोने के लिए वादे तो कर दिए जाते हैं, लेकिन हर बार वादा सिर्फ रुपरेखा तक ही सीमित रह जाता है।
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बुनियादी सुविधाएं कोसों दूर
ललितपुर। धौर्रा रेलवे स्टेशन से करीब चार किलोमीटर दूर चांदपुर-जहाजपुर स्थित है। यहां रेलवे गेट के पूर्व की ओर चांदपुर और पश्चिम की ओर जहाजपुर स्थित है। दोनों स्थानों पर मात्र रेल पटरियों के बीच का ही फासला है, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए न तो सड़क मार्ग ही सुगम है और न ही पानी और बिजली की ही कोई व्यवस्था की गई है। इसका कोई प्रचार प्रसार भी नहीं किया गया है और न ही मंदिरों के विकास को पहल की गई है। यहां बारिश और धूप से बचाव के लिए भी धर्मशाला या रैन बसेरा का भी अभाव है।
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