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जो कांकी रीत आए कै, डीजल महंगो और अनाज सस्तो बिक रओ
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जा कांकी रीत आए कै, डीजल महंगो और अनाज सस्तो बिक रओ
ललितपुर। लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में उतरे उम्मीदवार के पक्ष में वातावरण तैयार करने के लिए पार्टी प्रचार में रोड शो का सहारा लिया जा रहा है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों से उपज बेचने के लिए गल्ला मंडी पहुंच रहे किसान मंडी में चबूतरा पर बैठकर सियासी चर्चा कर रहे हैं। ऐसा ही नजारा कृषि उत्पादन मंडी का रहा है।
ग्राम रोड़ा निवासी खुशीलाल कहते हैं कि देश कृषि प्रधान क्वाउत, ईके बाद भी किसानन की कोनऊ सुनवे बारो नइयां। जब तक खेतन में फसल ठांड़ी रत, तब तक लगत कै, फसल कबै घरे पौंच पाऊत और जब घरे फसल आ जात तौ बैंकन को ब्याज भरवे की चिंता सतान लगत। जब बैंकन को कर्जा भरवे की बारी आऊत तो किसान के हक्के कछु नहीं लगत। पूरो पइसा बैंकन के ब्याज में चलो जात। किसानन की जा हालत है कै, वे ब्याजइ ब्याज भरवे के लाजें कमाऊत और बैंकन को ब्याज भरत-भरत मर जात। ग्राम दावनी निवासी कामता प्रसाद समर्थन करते हुए कहते हैं कि किसानन को कोनऊ नइयां। कैवे के लाजें किसानन खों सुविधाएं हैं। सांची बात जा आए कै, साठ रुपइया डीजल बिक रओ और गेहूं बीस रुपइया से कम बिक रओ। ईमें किसानन की का लगगत निकरे। ई अनाज को उगावे में साठ रुपइया को डीजल लगे, खाद की बोरी लगी और मेहनत लगी। ईके बाद हाथ में किसान के का आओ, ईसें समझ लो।
ग्राम जाखलौन निवासी कंछेदीलाल कहते हैं कि किसानन में एका नइया, ईसें किसानन की कोनऊ चिंता नहीं करत। जी दिना किसानन में एका हो, ऊ दिन सरकार थर्रान लगे और उनके काम होन लगें। ग्राम जैरवारा निवासी भैय्यन कहते हैं कि किसान और मजदूरन की हालत एक जैसी है। कोनऊ सरकार मजदूरन के हितन की बातें नहीं करत। मजदूरन की मजदूरी कोनऊ फिक्स नइयां। जी दिना मजदूरी मिल गइ, ऊ दिना घर को चूल्हो जल गओ और जीना मजदूरी नहीं मिली, वा दिन भूखे सोवे के अलावा कोनऊ चारो नइयां। यूनियन के नेता केवल अपने स्वारथ पूरे करवे में लगे।
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ग्राम जैरवारा निवासी भगवान सिंह कहते हैं कि गल्ला मंडी में खूबइ मनमानी होत। कोनऊ देखवे और रोकवे बारो नइयां। ऐइ सैं किसान पनप नहीं पा रये। इते तौलवे में कबे डांड़ी मार देवैं पतो नहीं परत। जोइ बोली बोलवे के दौरान होत। चार व्यापारी पैले से सेंटिंग करके आऊत और कै देत कि ई से जादा में माल नहीं बिके। जा बताओ ऐसे में किसान अपनौ माल उठाकें तो घरे ले नहीं जें। उये तो सारंगे करने, रिश्तेदारी में व्यवहार चुकाने। ऐसे में किसान मन मारकें अपनो माल बेच देत। पूरी मंडी में जोइ हो रओ। जातो कोनऊ देखवे कि मंडी में बोली सही लग रइ कै नहीं, अधिकारी भी दुपरिया में कूलर छोड़कें नहीं निकरत। इसी दौरान कुछ व्यापारी बोली लगाने आ जाते हैं, जिससे चर्चा पर विराम लग जाता है।
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ललितपुर। लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में उतरे उम्मीदवार के पक्ष में वातावरण तैयार करने के लिए पार्टी प्रचार में रोड शो का सहारा लिया जा रहा है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों से उपज बेचने के लिए गल्ला मंडी पहुंच रहे किसान मंडी में चबूतरा पर बैठकर सियासी चर्चा कर रहे हैं। ऐसा ही नजारा कृषि उत्पादन मंडी का रहा है।
ग्राम रोड़ा निवासी खुशीलाल कहते हैं कि देश कृषि प्रधान क्वाउत, ईके बाद भी किसानन की कोनऊ सुनवे बारो नइयां। जब तक खेतन में फसल ठांड़ी रत, तब तक लगत कै, फसल कबै घरे पौंच पाऊत और जब घरे फसल आ जात तौ बैंकन को ब्याज भरवे की चिंता सतान लगत। जब बैंकन को कर्जा भरवे की बारी आऊत तो किसान के हक्के कछु नहीं लगत। पूरो पइसा बैंकन के ब्याज में चलो जात। किसानन की जा हालत है कै, वे ब्याजइ ब्याज भरवे के लाजें कमाऊत और बैंकन को ब्याज भरत-भरत मर जात। ग्राम दावनी निवासी कामता प्रसाद समर्थन करते हुए कहते हैं कि किसानन को कोनऊ नइयां। कैवे के लाजें किसानन खों सुविधाएं हैं। सांची बात जा आए कै, साठ रुपइया डीजल बिक रओ और गेहूं बीस रुपइया से कम बिक रओ। ईमें किसानन की का लगगत निकरे। ई अनाज को उगावे में साठ रुपइया को डीजल लगे, खाद की बोरी लगी और मेहनत लगी। ईके बाद हाथ में किसान के का आओ, ईसें समझ लो।
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ग्राम जाखलौन निवासी कंछेदीलाल कहते हैं कि किसानन में एका नइया, ईसें किसानन की कोनऊ चिंता नहीं करत। जी दिना किसानन में एका हो, ऊ दिन सरकार थर्रान लगे और उनके काम होन लगें। ग्राम जैरवारा निवासी भैय्यन कहते हैं कि किसान और मजदूरन की हालत एक जैसी है। कोनऊ सरकार मजदूरन के हितन की बातें नहीं करत। मजदूरन की मजदूरी कोनऊ फिक्स नइयां। जी दिना मजदूरी मिल गइ, ऊ दिना घर को चूल्हो जल गओ और जीना मजदूरी नहीं मिली, वा दिन भूखे सोवे के अलावा कोनऊ चारो नइयां। यूनियन के नेता केवल अपने स्वारथ पूरे करवे में लगे।
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ग्राम जैरवारा निवासी भगवान सिंह कहते हैं कि गल्ला मंडी में खूबइ मनमानी होत। कोनऊ देखवे और रोकवे बारो नइयां। ऐइ सैं किसान पनप नहीं पा रये। इते तौलवे में कबे डांड़ी मार देवैं पतो नहीं परत। जोइ बोली बोलवे के दौरान होत। चार व्यापारी पैले से सेंटिंग करके आऊत और कै देत कि ई से जादा में माल नहीं बिके। जा बताओ ऐसे में किसान अपनौ माल उठाकें तो घरे ले नहीं जें। उये तो सारंगे करने, रिश्तेदारी में व्यवहार चुकाने। ऐसे में किसान मन मारकें अपनो माल बेच देत। पूरी मंडी में जोइ हो रओ। जातो कोनऊ देखवे कि मंडी में बोली सही लग रइ कै नहीं, अधिकारी भी दुपरिया में कूलर छोड़कें नहीं निकरत। इसी दौरान कुछ व्यापारी बोली लगाने आ जाते हैं, जिससे चर्चा पर विराम लग जाता है।