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शाकाहार और सदाचार से जीवन सदाबहार
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शाकाहार और सदाचार से जीवन सदाबहार
ललितपुर। आर्य जगत के सन्यासी स्वामी गुरुकुलानंद सरस्वती (डॉ. कच्चाहारी) पिथौरागढ़ से चलकर एक दिन के प्रवास पर ललितपुर आए। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि शाकाहार और सदाचार से जीवन सदाबहार बना रहता है।
उन्होंने कहा कि 1875 में आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के दस नियम बनाकर वेदों की ओर लौटो का नारा हर-हर नारी को दिया था। वेद परमात्मा का अमर ज्ञान है, जो आज दिया जा रहा है। वेद में मंत्र हैं, मंत्र अर्थात विचार हैं। वेद के अनुसार चलने से विश्व में मानवतावाद फैलता है। वेद पढ़ने का अधिकार हर नर-नारी को है। वेद मानव धर्म का आधार है। स्वामी गुरुकुलानंद सरस्वती ने कन्या भ्रूण हत्या को पाप एवं अपराध बताते हुए कहा कि समाज को इस पर आत्म चिंतन करना चाहिए। उन्होंने शाकाहार, सदाचार से जीवन में सदाबहार पर चलने की आवश्यकता पर बल दिया। बता दें कि स्वामी गुरुकुलानंद सरस्वती ने पढ़ाई के दौरान एक युवती की प्रसव पीड़ा की चीख से जीवन की दिशा बदली और संकल्प लिया कि एमबीबीएस डॉक्टर बनूंगा तथा फीस नहीं लूंगा। उन्होंने 1965 में एमबीबीएस किया और 1966 में प्रांतीय चिकित्सा सेवा में आ गए। लेकिन, उन्होंने सरकारी सेवा में होने के बाद भी संन्यास ले लिया और डॉ. ज्ञानप्रकाश कच्चाहारी से स्वामी गुरुकुलानंद कच्चाहारी बन गए।
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ललितपुर। आर्य जगत के सन्यासी स्वामी गुरुकुलानंद सरस्वती (डॉ. कच्चाहारी) पिथौरागढ़ से चलकर एक दिन के प्रवास पर ललितपुर आए। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि शाकाहार और सदाचार से जीवन सदाबहार बना रहता है।
उन्होंने कहा कि 1875 में आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के दस नियम बनाकर वेदों की ओर लौटो का नारा हर-हर नारी को दिया था। वेद परमात्मा का अमर ज्ञान है, जो आज दिया जा रहा है। वेद में मंत्र हैं, मंत्र अर्थात विचार हैं। वेद के अनुसार चलने से विश्व में मानवतावाद फैलता है। वेद पढ़ने का अधिकार हर नर-नारी को है। वेद मानव धर्म का आधार है। स्वामी गुरुकुलानंद सरस्वती ने कन्या भ्रूण हत्या को पाप एवं अपराध बताते हुए कहा कि समाज को इस पर आत्म चिंतन करना चाहिए। उन्होंने शाकाहार, सदाचार से जीवन में सदाबहार पर चलने की आवश्यकता पर बल दिया। बता दें कि स्वामी गुरुकुलानंद सरस्वती ने पढ़ाई के दौरान एक युवती की प्रसव पीड़ा की चीख से जीवन की दिशा बदली और संकल्प लिया कि एमबीबीएस डॉक्टर बनूंगा तथा फीस नहीं लूंगा। उन्होंने 1965 में एमबीबीएस किया और 1966 में प्रांतीय चिकित्सा सेवा में आ गए। लेकिन, उन्होंने सरकारी सेवा में होने के बाद भी संन्यास ले लिया और डॉ. ज्ञानप्रकाश कच्चाहारी से स्वामी गुरुकुलानंद कच्चाहारी बन गए।
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