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जब जिला मुख्यालय पर आयोजित हो रहा देवगढ़ महोत्सव तो कैसे मिलेगा पर्याटन को बढ़ावा
Updated Thu, 15 Feb 2018 02:04 AM IST
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देवगढ़ महोत्सव का आयोजन 32 किमी दूर जिला मुख्यालय पर
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर।
जिला मुख्यालय के करीब 32 किलोमीटर दूरी पर स्थित धार्मिक आस्था व प्राकृतिक छटा का केंद्र विश्व पर्यटन स्थल देवगढ़ को बढ़ावा देने के लिए जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग सात दिवसीय देवगढ़ महोत्सव कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है। लेकिन देवगढ़ पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर होने वाला यह यह सात दिवसीय देवगढ़ महोत्सव देवगढ़ की जगह जिला मुख्यालय पर ही स्थित श्रीतुवन मंदिर मैदान में आयोजित किया जा रहा है। पर्यटन विभाग और प्रशासन का मानना है कि जिला मुख्यालय पर आयोजित इस महोत्सव में देवगढ़ समेत जनपद के अन्य पर्यटन स्थलों का स्टॉल लगाकर लोगों को पर्यटन के प्रति जागरूक किया जाएगा, लेकिन बिना स्थल तक पहुंचे बिना ही लोग पर्यटन स्थल देवगढ़ की प्राकृतिक छटा और यहां की कलाकृतियों को कैसे देख सकेंगे।
इस सात दिवसीय महोत्सव का शुभारंभ 15 फरवरी से किया जा रहा है, जो 21 फरवरी तक चलेगा। इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य देवगढ़ पर्याटन स्थल को बढ़ावा देना है, ताकि मेले में लगने वाला क्रॉफ्ट व शिल्प मेला और यहां आयोजित होने वाली बुंदेली व सांस्कृतिक कार्यक्रमों को देखने के बहाने लोग देवगढ़ तक पहुंचे। इसके लिए सरकारी कोष से 15 लाख रुपये का बजट व्यय किया जा रहा है। शायद कार्यक्रम से देवगढ़ पर्यटन स्थल को बढ़ावा देने की मंशा पूरी नहीं हो सकेगी।
यह है देवगढ़ की विशेषताएं
जिला मुख्यालय से मात्र 32 किलोमीटर की दूूरे पर बेतवा नदी के सुरमय किनारे के समीप एक ऊंची पहाड़ी पर त्रिधर्म आस्था केंद्र व पुरातत्व धरोहरों की शान देवगढ़ भारतीय संस्कृति और शिल्प का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। यहां से हिंदू, जैन और बौद्घ तीनों की धर्म की आस्था जुड़ी हुई है। यहां पर बना भगवान विष्णु का दशावातार मंदिर दुनियां में इकलौता मंदिर होने के कारण देवगढ़ को विश्व पर्याटन की सूची में शामिल किया है। देवगढ़ का यह ऐतिहासिक मंदिर पांचवी शताब्दी के गुप्त काल में बना दशावतार मंदिर है। जो उत्तर भारत का सब से पहला पंचायतन शैली में निर्मित मंदिर है। इस मंदिर का इतिहास, भव्यता तथा वास्तुकला की वजह से विश्व में प्रसिद्ध है। दशावतार मंदिर भग्नप्राय अवस्था में है, और राष्ट्रीय पुरातात्विक सर्वेक्षण द्वारा सरंक्षित है। किन्तु यह निश्चित है कि प्रारम्भ में इसमें अन्य गुप्त कालीन देवालयों की भांति ही गर्भगृह के चतुर्दिक पटा हुआ प्रदक्षिणा पथ रहा होगा। इस मन्दिर के एक के बजाए चार प्रवेश द्वार थे और उन सबके सामने छोटे-छोटे मंडप तथा सीढ़िया थी। चारों कोनों में चार छोटे मन्दिर थे। इनके शिखर आमलकों से अलंकृत थेए क्योंकि खंडहरों से अनेक आमलक प्राप्त हुए हैं। मुख्य मन्दिर के चतुर्दिक कई छोटे मन्दिर थे, जिनका आधार मुख्य मन्दिर के आधार से नीचे है। मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार पर गंगा, यमुना, सूर्य, चन्द्र घट पुरुष तथा अनेक देवताओ की मूर्तियां अंकित हैं। मंदिर की तीनों बाह्य दीवारों पर नर नारायणए गजेंद्र मोक्ष तथा शेषशायी विष्णु के कलात्मक मूर्ति चित्र अंकित हैं। विगत वर्षो में यहां पर एक बौद्घगुफा भी प्रकाश में आई है। यह गुफा यहां पर गुप्तकालीन शिल्पकला को साबित करती है कि प्राचीन काल में यहां जैन, वैष्णव, शैव, और बौद्ध धर्मों का अस्तित्व एक साथ था और सभी ने अपने अपने स्तर पर यहां विकास किया था। इसके अलावा देवगढ़ जैन एवं वैष्णव सम्प्रदाय की मूर्ति कला का केंद्र रहा है। यहां 41 जैन मंदिरों, हजारों की तादाद में जैन प्रतिमों के अतिरिक्त, 18 मानसतंभ व सैकड़ों की संख्या में अभिलेख उत्कीर्ण है। देवगढ़ की तीन घाटियों में सिद्धघाटी, राजघाटी एवं नाहरघाटी में गुप्तकालीन कला के दर्शन होते है। यहां समीप ही ऊंची जगती पर बना 7वीं सदी का वराह मंदिर एवं कीर्तिगिरि दुर्ग के अवशेष भी दर्शनीय हैं। कुंज द्वार, हाथी दरवाजा, एक पत्थर की वावड़ी, देवगढ़ ग्राम स्थित शिव मंदिर, दुर्गा मंदिर, सती स्तम्भ, देवगढ़ से 03 किलो मीटर की दूरी पर वन्य क्षेत्र में स्थित कुचदों कुरैयावीर देवालय, बावड़ी भी देखने लायक हैं। देवगढ़ में जैन मूतियों का अतुल भंडार 09वीं सदी से लेकर 15वीं सदी का द्रष्टिगोचर है। जैन मंदिरों में शान्तिनाथ को समर्पित मंदिर संख्या 12 स्थापत्य, शिल्प की द्रष्टि से सर्वाधिक महत्वूपर्ण मंदिर है। यहां पर तीन संग्रहालय भी मौजूद है जिनमेें पहाड़ी पर देवगढ़ स्थित संग्रहालय, जैन धर्मशाला परिसर में स्थित साहू जैन संग्रहालय, दशावतार मंदिर परिसर स्थित पुरातत्व विभाग का संग्रहालय दर्शनीय है।
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अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर।
जिला मुख्यालय के करीब 32 किलोमीटर दूरी पर स्थित धार्मिक आस्था व प्राकृतिक छटा का केंद्र विश्व पर्यटन स्थल देवगढ़ को बढ़ावा देने के लिए जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग सात दिवसीय देवगढ़ महोत्सव कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है। लेकिन देवगढ़ पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर होने वाला यह यह सात दिवसीय देवगढ़ महोत्सव देवगढ़ की जगह जिला मुख्यालय पर ही स्थित श्रीतुवन मंदिर मैदान में आयोजित किया जा रहा है। पर्यटन विभाग और प्रशासन का मानना है कि जिला मुख्यालय पर आयोजित इस महोत्सव में देवगढ़ समेत जनपद के अन्य पर्यटन स्थलों का स्टॉल लगाकर लोगों को पर्यटन के प्रति जागरूक किया जाएगा, लेकिन बिना स्थल तक पहुंचे बिना ही लोग पर्यटन स्थल देवगढ़ की प्राकृतिक छटा और यहां की कलाकृतियों को कैसे देख सकेंगे।
इस सात दिवसीय महोत्सव का शुभारंभ 15 फरवरी से किया जा रहा है, जो 21 फरवरी तक चलेगा। इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य देवगढ़ पर्याटन स्थल को बढ़ावा देना है, ताकि मेले में लगने वाला क्रॉफ्ट व शिल्प मेला और यहां आयोजित होने वाली बुंदेली व सांस्कृतिक कार्यक्रमों को देखने के बहाने लोग देवगढ़ तक पहुंचे। इसके लिए सरकारी कोष से 15 लाख रुपये का बजट व्यय किया जा रहा है। शायद कार्यक्रम से देवगढ़ पर्यटन स्थल को बढ़ावा देने की मंशा पूरी नहीं हो सकेगी।
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यह है देवगढ़ की विशेषताएं
जिला मुख्यालय से मात्र 32 किलोमीटर की दूूरे पर बेतवा नदी के सुरमय किनारे के समीप एक ऊंची पहाड़ी पर त्रिधर्म आस्था केंद्र व पुरातत्व धरोहरों की शान देवगढ़ भारतीय संस्कृति और शिल्प का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। यहां से हिंदू, जैन और बौद्घ तीनों की धर्म की आस्था जुड़ी हुई है। यहां पर बना भगवान विष्णु का दशावातार मंदिर दुनियां में इकलौता मंदिर होने के कारण देवगढ़ को विश्व पर्याटन की सूची में शामिल किया है। देवगढ़ का यह ऐतिहासिक मंदिर पांचवी शताब्दी के गुप्त काल में बना दशावतार मंदिर है। जो उत्तर भारत का सब से पहला पंचायतन शैली में निर्मित मंदिर है। इस मंदिर का इतिहास, भव्यता तथा वास्तुकला की वजह से विश्व में प्रसिद्ध है। दशावतार मंदिर भग्नप्राय अवस्था में है, और राष्ट्रीय पुरातात्विक सर्वेक्षण द्वारा सरंक्षित है। किन्तु यह निश्चित है कि प्रारम्भ में इसमें अन्य गुप्त कालीन देवालयों की भांति ही गर्भगृह के चतुर्दिक पटा हुआ प्रदक्षिणा पथ रहा होगा। इस मन्दिर के एक के बजाए चार प्रवेश द्वार थे और उन सबके सामने छोटे-छोटे मंडप तथा सीढ़िया थी। चारों कोनों में चार छोटे मन्दिर थे। इनके शिखर आमलकों से अलंकृत थेए क्योंकि खंडहरों से अनेक आमलक प्राप्त हुए हैं। मुख्य मन्दिर के चतुर्दिक कई छोटे मन्दिर थे, जिनका आधार मुख्य मन्दिर के आधार से नीचे है। मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार पर गंगा, यमुना, सूर्य, चन्द्र घट पुरुष तथा अनेक देवताओ की मूर्तियां अंकित हैं। मंदिर की तीनों बाह्य दीवारों पर नर नारायणए गजेंद्र मोक्ष तथा शेषशायी विष्णु के कलात्मक मूर्ति चित्र अंकित हैं। विगत वर्षो में यहां पर एक बौद्घगुफा भी प्रकाश में आई है। यह गुफा यहां पर गुप्तकालीन शिल्पकला को साबित करती है कि प्राचीन काल में यहां जैन, वैष्णव, शैव, और बौद्ध धर्मों का अस्तित्व एक साथ था और सभी ने अपने अपने स्तर पर यहां विकास किया था। इसके अलावा देवगढ़ जैन एवं वैष्णव सम्प्रदाय की मूर्ति कला का केंद्र रहा है। यहां 41 जैन मंदिरों, हजारों की तादाद में जैन प्रतिमों के अतिरिक्त, 18 मानसतंभ व सैकड़ों की संख्या में अभिलेख उत्कीर्ण है। देवगढ़ की तीन घाटियों में सिद्धघाटी, राजघाटी एवं नाहरघाटी में गुप्तकालीन कला के दर्शन होते है। यहां समीप ही ऊंची जगती पर बना 7वीं सदी का वराह मंदिर एवं कीर्तिगिरि दुर्ग के अवशेष भी दर्शनीय हैं। कुंज द्वार, हाथी दरवाजा, एक पत्थर की वावड़ी, देवगढ़ ग्राम स्थित शिव मंदिर, दुर्गा मंदिर, सती स्तम्भ, देवगढ़ से 03 किलो मीटर की दूरी पर वन्य क्षेत्र में स्थित कुचदों कुरैयावीर देवालय, बावड़ी भी देखने लायक हैं। देवगढ़ में जैन मूतियों का अतुल भंडार 09वीं सदी से लेकर 15वीं सदी का द्रष्टिगोचर है। जैन मंदिरों में शान्तिनाथ को समर्पित मंदिर संख्या 12 स्थापत्य, शिल्प की द्रष्टि से सर्वाधिक महत्वूपर्ण मंदिर है। यहां पर तीन संग्रहालय भी मौजूद है जिनमेें पहाड़ी पर देवगढ़ स्थित संग्रहालय, जैन धर्मशाला परिसर में स्थित साहू जैन संग्रहालय, दशावतार मंदिर परिसर स्थित पुरातत्व विभाग का संग्रहालय दर्शनीय है।
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