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बाघों को जंगल से ज्यादा रास आ रहे गन्ने के खेत

Tue, 18 Aug 2020 06:48 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 18 Aug 2020 06:48 PM IST
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Wild Animals
बांकेगंज जंगल से सटे बाहरी किनारों पर छानबीन करते एसटीपीएफ के जवान। - फोटो : LAKHIMPUR
बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। दुधवा टाइगर रिजर्व के आसपास खेतों में मिलने वाले बाघों का रिकॉर्ड भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के रिकॉर्ड से मेल न खाने पर बाघ गणना पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। यह माना जा रहा है कि खेतों में प्रवास करने वाले बाघ गणना में शामिल ही नहीं होते, इससे यह अनुमान भी लगाया जा रहा है कि खीरी जिले में बाघों की संख्या रिकॉर्ड से कहीं अधिक है।
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पिछले करीब 13 माह में दो ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें मिले दो बाघिनों के शव का रिकॉर्ड भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के पास नहीं मिला। पिछले साल 10 जुलाई को गोला रेंज के बिझौली गांव के पास नहर में उतराता हुआ एक वयस्क बाघिन का शव बरामद हुआ था। जब उसकी पहचान के लिए उसकी तस्वीर डब्ल्यूआईआई को भेजी गई तो उसकी धारियां रिकॉर्ड में उपलब्ध किसी भी बाघ के रिकॉर्ड से मैच नहीं हुई। इसी तरह डीटीआर बफरजोन की मैलानी रेंज जंगल से सटे खेत में 11 अगस्त को मृत मिली बाघिन की धारियां भी किसी से मैच नहीं हुई हैं। इससे यह साफ होता है कि बाघ गणना के लिए लगाए गए कैमरों के सामने से यह बाघिन नहीं गुजरीं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि इस बाघिन का प्रवास जंगल की सीमा से बाहर खेतों में रहा होगा।
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वन्यजीव विशेषज्ञ एवं उप्र राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य डॉ वीपी सिंह का कहना है कि तराई में बड़ी संख्या में बाघ जंगल के बाहर गन्ने के खेतों में प्रवास कर रहे हैं। इनकी न तो गणना होती है न इनकी सुरक्षा के लिए अलग से इंतजाम। यदि खेतों में रहने वाले इन बाघों को भी गणना में शामिल किया जाए तो बाघों की आबादी का आंकड़ा बढ़कर डेढ़ गुना हो जाएगा। डॉ सिंह का यह भी कहना है कि जंगल के बाहर गन्ने के खेत बाघों के लिए नेचुरल हैवीटेट बन गए हैं।
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खेतों में भी बाघों को मिल रहा पर्याप्त भोजन
हिरन, जंगली सुअर आदि शाकाहारी वन्यजीव भोजन की तलाश में इन गन्ने के खेतों में आ जाते हैं। जिससे खेतों में रहने वाले बाघों को भोजन की कमी नहीं होती। यही नहीं छुट्टा जानवर और नीलगाय भी इन्हें भोजन के रूप में मिलते रहते हैं।
बदलते परिवेश में नए ढंग से वन प्रबंधन की जरूरत
बदलते हालात और वन्यजीवों के स्वभाव में आ रहे बदलाव के चलते नए ढंग से वन प्रबंधन की जरूरत महसूस की जा रही है। चूंकि बहुत से बाघ जंगल के बजाए खेतों में रह रहे हैं। इसलिए उनकी सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किए जाने चाहिए। साथ ही बाघ गणना में भी इन इलाकों के शामिल करना चाहिए, जहां जंगल के बजाए खेतों में बाघ रह रहे हैं।
जंगल के बाहर सबसे ज्यादा बाघों को खतरा
पेशेवर शिकारी सबसे पहले उन्हीं बाघों को अपना निशाना बनाते हैं जो जंगल के बाहर खेतों में रह रहे हैं। एक तो इन पर वन विभाग की नजर नहीं होती, दूसरे वह सीमित दायरे में रहते हैं। जिसके कारण शिकारी उन पर अच्छी तरह नजर रख पाते हैं। जंगल के बाहर रहने वाले बाघों के शिकार के बहुत कम मामलों का खुलासा हो पाता है।

यह बात सच है कि डीटीआर के आसपास गन्ने के खेतों में बड़ी संख्या में बाघ विचरण कर रहे हैं। जो गणना में शामिल नहीं होते, लेकिन वन विभाग उन पर भी सतर्क नजर रखता है।
- डॉ अनिल कुमार पटेल, उप निदेशक,दुधवा टाइगर रिजर्व, बफरजोन
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