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लोक व्यवहार की आचार संहिता है तुलसी साहित्य
लखीमपुर खीरी
Updated Sat, 22 Aug 2015 10:11 PM IST
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तुलसी जयंती के मौके पर जिले भर में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। भगवानदीन आर्यकन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग और हिंदी साहित्य परिषद के तत्वावधान में तुलसी जयंती समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि पूर्व प्राचार्य डॉ. विमला शर्मा और विशिष्ट अतिथि डॉ. ओपी मिश्र रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. निरुपमा अशोक ने की।
इस मौके पर तुलसी साहित्य में लोक व्यवहार विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी का विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. शशि प्रभा वाजपेयी ने कहा कि लोक व्यवहार जीवन की प्रभावशाली कला है। यह सामान्य को विशिष्ट बना देती है। तुलसी साहित्य लोक व्यवहार की आचार संहिता है।
डॉ. उमा कटियार ने रामकथा के विविधि पक्षों में तुलसी की लोक मांगलिक चेतना और सामाजिक सरोकारों का उल्लेख करते हुए तुलसी साहित्य में रची बसी व्यवहार रीतियों और संदर्भों के शोधपरक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. सुशीला सिंह ने कहा कि रामचरित मानस लोकमत का प्रधान काव्य है। इसमें रीति रिवाजों, संस्कार, त्योहारों, देश और समाज संचालन की नीति की व्यवहारिक व्याख्या की गई है।
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मुख्य वक्ता डॉ. ओपी मिश्र ने तुलसी की बहुज्ञता की चर्चा करते हुए उनके जीवन से जुड़े तथ्यों को ग्रहण करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि तुलसीकृत रामचरित मानस को केवल धर्मग्रंथ के रूप में ही नही सद्ग्रंथ के रूप में नीति ग्रंथ के रूप में अध्ययन करें।
मुुख्य अतिथि डॉ. विमला शर्मा ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास मर्यादावादी कवि हैं। आचरणगत नैतिकता और संबंधों में समर्पणशील अहेतुक भाव ही लोकव्यवहार की विशद व्याख्या है।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्राचार्या डॉ. निरुपमा अशोक ने श्रद्धा विश्वास को जीवन का प्रेरणा सूत्र बनाने का आह्वान किया। गोष्ठी में सरला और बीना रानी गुप्ता ने भी अपने विचार रखे। इस मौके पर संगीत विभाग की ओर से मनमोहक सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन और नीति वचन प्रस्तुत किए गए। कला विभाग ने आकर्षक रंगोली बनाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. शशि प्रभा वाजपेयी ने किया। इस मौके पर प्रबंध समिति सचिव शिवचंद्र सिंह, डॉ. अन्नपूर्णा गुप्ता, डॉ. पुष्पा मलिक, डॉ. गीता शुक्ला, डॉ. रेखा पांडेय, अर्चना सिंह, रीता सिंह, जसविंदर, संघमित्रा समेत सभी शिक्षकाएं, शिक्षणेत्तर कर्मचारी मौजूद रहे।
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इस मौके पर तुलसी साहित्य में लोक व्यवहार विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी का विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. शशि प्रभा वाजपेयी ने कहा कि लोक व्यवहार जीवन की प्रभावशाली कला है। यह सामान्य को विशिष्ट बना देती है। तुलसी साहित्य लोक व्यवहार की आचार संहिता है।
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डॉ. उमा कटियार ने रामकथा के विविधि पक्षों में तुलसी की लोक मांगलिक चेतना और सामाजिक सरोकारों का उल्लेख करते हुए तुलसी साहित्य में रची बसी व्यवहार रीतियों और संदर्भों के शोधपरक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. सुशीला सिंह ने कहा कि रामचरित मानस लोकमत का प्रधान काव्य है। इसमें रीति रिवाजों, संस्कार, त्योहारों, देश और समाज संचालन की नीति की व्यवहारिक व्याख्या की गई है।
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मुख्य वक्ता डॉ. ओपी मिश्र ने तुलसी की बहुज्ञता की चर्चा करते हुए उनके जीवन से जुड़े तथ्यों को ग्रहण करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि तुलसीकृत रामचरित मानस को केवल धर्मग्रंथ के रूप में ही नही सद्ग्रंथ के रूप में नीति ग्रंथ के रूप में अध्ययन करें।
मुुख्य अतिथि डॉ. विमला शर्मा ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास मर्यादावादी कवि हैं। आचरणगत नैतिकता और संबंधों में समर्पणशील अहेतुक भाव ही लोकव्यवहार की विशद व्याख्या है।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्राचार्या डॉ. निरुपमा अशोक ने श्रद्धा विश्वास को जीवन का प्रेरणा सूत्र बनाने का आह्वान किया। गोष्ठी में सरला और बीना रानी गुप्ता ने भी अपने विचार रखे। इस मौके पर संगीत विभाग की ओर से मनमोहक सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन और नीति वचन प्रस्तुत किए गए। कला विभाग ने आकर्षक रंगोली बनाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. शशि प्रभा वाजपेयी ने किया। इस मौके पर प्रबंध समिति सचिव शिवचंद्र सिंह, डॉ. अन्नपूर्णा गुप्ता, डॉ. पुष्पा मलिक, डॉ. गीता शुक्ला, डॉ. रेखा पांडेय, अर्चना सिंह, रीता सिंह, जसविंदर, संघमित्रा समेत सभी शिक्षकाएं, शिक्षणेत्तर कर्मचारी मौजूद रहे।