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होली में धमाल की जगह हुड़दंग, बदल गया रंग-ढंग
लखीमपुर खीरी
Updated Thu, 05 Mar 2015 06:18 PM IST
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समय के साथ होली मनाने के ढंग में भी बदलाव आया है। समय की कमी से हफ्तों तक चलने वाला उमंग का त्योहार सिमटकर महज एक-दो दिन की रह गया है। प्राकृतिक की जगह कैमिकल रंगों ने ले ली है। महीनों पहले से होने वाली तैयारियां एक दिन के बाजार में सिमट कर रह गईं हैं। होली के रंग और उमंग में कमी नहीं आई है लेकिन मनाने के ढंग में बदलाव जरूर आया है। होली के बदलते रंग-ढंग पर शहर के प्रमुख लोगों से बात की गई तो वे पुरानी यादों में खो गए। कहा कि होली हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। होली के रंग और ढंग में भले ही बदलाव आया हो लेकिन इसकी मूल भावना में कोई बदलाव नहीं आया है।
होली मनाने का ढंग बदला पर उमंग नहीं
पहले होली की तैयारियां एक माह पहले से शुरू हो जाती थी। घरों में आलू के चिप्स और पापड़ बनने लगते थे। टेसू के फूलों को उबाल कर प्राकृतिक रंग बनाया जाता था। अब समय की कमी से घरों में बनने वाली चीजों की जगह लोग बाजार की चीजों से काम चला रहे है लेकिन होली की मूल भावना में कोई कमी नहीं आई है।
-डॉ. इरा श्रीवास्तव, अध्यक्ष, नगर पालिका, लखीमपुर
आज भी याद है होली का धमाल
होली के उत्साह में भले ही कमी आई हो लेकिन प्रेम सौहार्द्र की भावना में कमी नहीं आई है। गांवों में होली के बाद जो धमाल होता था वह आज भी याद है। रंग इतना खेला जाता था कि एक-दूसरे को पहचानना मुश्किल हो जाता था। प्राकृतिक की जगह कैमिकल युक्त रंगों का इस्तेमाल होने से लोग रंग खेलने से परहेज करने लगे हैं।
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-ज्ञान प्रकाश वाजपेयी, पूर्व अध्यक्ष नगर पालिका
अपने आप में सिमटते जा रहे हैं लोग
पहले होली सामूहिक रूप से मनाई जाती थी अब लोग अपने आप में सिमटते जा रहे हैं इसके चलते होलियारे समूह में निकलते कम दिखते हैं। सच तो यह है कि लोगों में सामुदायिक भावना का हृास हो रहा है। होली में बढ़ रहा भाेंडापन अच्छी बात नहीं है। होली में सद्भाव और प्रेम की विकसित होने वाली भावना में कमी नहीं आई है।
-विजय कुमार पांडेय, एडवोकेट
सामूहिक भावना में कमी आई
होली आने के पहले ही उत्सव जैसा माहौल बन जाता था। रंग खेलने को पूरा मोहल्ला एक साथ निकलता था। शाम को होली मिलन की होड़ होती रहती थी। आज इसमें बदलाव आया है। प्राकृतिक की जगह कैमिकल युक्त रंगों ने ले ली है। सामूहिक भावना में कमी जरूर आई है लेकिन उत्साह में कमी नहीं है।
-डॉ. राकेश माथुर, चिकित्सक
रंग में कमी हुई पर उमंग में नहीं
पहले लोग लाल, गुलाबी, पीले रंगों और गुलाल से होली खेलते थे। अब हरे-काले रंगों, पेंट, वार्निश आदि का चलन बढ़ गया है। इससे लोगों की त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंच रहा है। इससे लोगों में रंग खेलने का उत्साह कम हुआ है। बाजारू चीजों के इस्तेमाल से खाद्य पदार्थों की शुद्धता में कमी आई है।
-राम मोहन गुप्त, समाजसेवी
आत्मीयता की जगह औपचारिकता ने ली
हमें याद है जब होली आने के पहले टेसू के फूलों से रंग बनाते थे। बांस से बनने वाली पिचकारियों से रंग खेला जाता था। सुबह से लोग समूह बनाकर रंग खेलने निकलते थे एक सप्ताह पहले होली के लोकगीत शुरू हो जाते थे। वर्षों से होली के लोकगीत सुनने को कान तरस गए हैं। अब आत्मीयता की जगह औपचारिकता ने ले ली है।
-डॉ. रामपाल सिंह, शिक्षक
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होली मनाने का ढंग बदला पर उमंग नहीं
पहले होली की तैयारियां एक माह पहले से शुरू हो जाती थी। घरों में आलू के चिप्स और पापड़ बनने लगते थे। टेसू के फूलों को उबाल कर प्राकृतिक रंग बनाया जाता था। अब समय की कमी से घरों में बनने वाली चीजों की जगह लोग बाजार की चीजों से काम चला रहे है लेकिन होली की मूल भावना में कोई कमी नहीं आई है।
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-डॉ. इरा श्रीवास्तव, अध्यक्ष, नगर पालिका, लखीमपुर
आज भी याद है होली का धमाल
होली के उत्साह में भले ही कमी आई हो लेकिन प्रेम सौहार्द्र की भावना में कमी नहीं आई है। गांवों में होली के बाद जो धमाल होता था वह आज भी याद है। रंग इतना खेला जाता था कि एक-दूसरे को पहचानना मुश्किल हो जाता था। प्राकृतिक की जगह कैमिकल युक्त रंगों का इस्तेमाल होने से लोग रंग खेलने से परहेज करने लगे हैं।
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-ज्ञान प्रकाश वाजपेयी, पूर्व अध्यक्ष नगर पालिका
अपने आप में सिमटते जा रहे हैं लोग
पहले होली सामूहिक रूप से मनाई जाती थी अब लोग अपने आप में सिमटते जा रहे हैं इसके चलते होलियारे समूह में निकलते कम दिखते हैं। सच तो यह है कि लोगों में सामुदायिक भावना का हृास हो रहा है। होली में बढ़ रहा भाेंडापन अच्छी बात नहीं है। होली में सद्भाव और प्रेम की विकसित होने वाली भावना में कमी नहीं आई है।
-विजय कुमार पांडेय, एडवोकेट
सामूहिक भावना में कमी आई
होली आने के पहले ही उत्सव जैसा माहौल बन जाता था। रंग खेलने को पूरा मोहल्ला एक साथ निकलता था। शाम को होली मिलन की होड़ होती रहती थी। आज इसमें बदलाव आया है। प्राकृतिक की जगह कैमिकल युक्त रंगों ने ले ली है। सामूहिक भावना में कमी जरूर आई है लेकिन उत्साह में कमी नहीं है।
-डॉ. राकेश माथुर, चिकित्सक
रंग में कमी हुई पर उमंग में नहीं
पहले लोग लाल, गुलाबी, पीले रंगों और गुलाल से होली खेलते थे। अब हरे-काले रंगों, पेंट, वार्निश आदि का चलन बढ़ गया है। इससे लोगों की त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंच रहा है। इससे लोगों में रंग खेलने का उत्साह कम हुआ है। बाजारू चीजों के इस्तेमाल से खाद्य पदार्थों की शुद्धता में कमी आई है।
-राम मोहन गुप्त, समाजसेवी
आत्मीयता की जगह औपचारिकता ने ली
हमें याद है जब होली आने के पहले टेसू के फूलों से रंग बनाते थे। बांस से बनने वाली पिचकारियों से रंग खेला जाता था। सुबह से लोग समूह बनाकर रंग खेलने निकलते थे एक सप्ताह पहले होली के लोकगीत शुरू हो जाते थे। वर्षों से होली के लोकगीत सुनने को कान तरस गए हैं। अब आत्मीयता की जगह औपचारिकता ने ले ली है।
-डॉ. रामपाल सिंह, शिक्षक