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बेबसी : घर नदी में समाया... इस बार दिवाली सड़क पर मनेगी

Sat, 26 Oct 2024 01:29 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 26 Oct 2024 01:29 AM IST
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Helplessness: The house got submerged in the river... this time Diwali will be celebrated on the road
अपने हाथों से तोड़े गए घर पर खड़ी जमुनादेवी बताती है सड़क पर मनाएंगे दीपावली। संवाद
तिकुनिया। सुख-समृद्धि के त्योहार दिवाली के मौके पर जसनगर के लोगों को लिए मोहाना नदी अभिशाप बन गई। 49 घरों वाले इस छोटे से गांव के आठ ग्रामीणों के घर नदी में समा गए। अब इन लोगों की दिवाली सड़क किनारे बने तंबुओं में ही मनेगी। जिन लोगों के घर कटने की कगार पर हैं, वे अपने ही हाथों से उन्हें तोड़ रहे हैं।
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इस समय सभी का वक्त अपने घरों को सजाने-संवारने में बीत रहा है। घर को रोशन करने के लिए कोई झालरें ला रहा है तो कोई दीयों की खरीदारी कर रहा है। लेकिन, जसनगर के लोग इस वक्त पीड़ा में डूबे हुए हैं। गांव निवासी जगदीश, श्रीराम, हरीश श्यामलाल, नत्थू राम और धर्मेंद्र के पक्के मकान मोहाना नदी में समा गए हैं।
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अब यह लोग सड़क पर रहने को मजबूर हैं। तंबू के नीचे किसी तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इन लोगों का कहना है कि पाई-पाई जोड़कर जो घर बनवाया था, वह अब छिन चुका है। वो भी त्योहार के मौके पर। अब तो सड़क पर ही दिवाली मनेगी। इन बाढ़ पीड़ितों के चेहरे पर आक्रोश साफ देखा जा सकता है।
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प्रशासनिक मदद मिली या नहीं, इस सवाल पर गुस्से में कहते हैं कि जब कोई सुनने वाला ही नही है तो किससे कहें। अभी तक कोई मदद नहीं मिली है। मदद तो दूर की बात है, कोई जिम्मेदार अफसर झांकने तक नहीं आया। बाढ़ पीड़ितों ने तय किया है कि अब वे लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री के जनता दरबार में अपनी पीड़ा कहेंगे।




रोशनी के त्योहार पर इनके घर अंधेरा
जसनगर गांव निवासी छोटी पत्नी नत्थूलाल रोते हुए कहती हैं कि हम सब कंगाल हो गए हैं। मकान था, चार एकड़ जमीन थी... सब कुछ नदी में समा गया। दिवाली के मौके पर हम बर्बाद हो गए, कोई सुनने वाला नहीं है। इसी गांव की जमुना देवी पत्नी शिव भगवान बताती हैं जमीन से परिवार की गुजर बसर होती थी। दो बेटे, दो बेटियां हैं। चिंता खाए जा रही है कि अब खर्चा कैसे चलेगा।

अपने हाथों से तोड़ा बसेरा
तारा देवी पत्नी जगदीश बताती हैं गांव में उनका पक्का मकान था। पूरा परिवार हंसी-खुशी रहता था, लेकिन मोहाना नदी ने सब छीन लिया। जिस घर को बड़ी उम्मीदों से बनाया था, उसे अपने ही हाथों तोड़ना पड़ा। अब जीवन किस तरह जिया जाए, समझ में नहीं आ रहा। सरकारी अफसर भी हाल पूछने नहीं आए।
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गांव को बचाने के लिए प्लास्टिक की बोरियों में मिट्टी भरकर नदी में डाला जा रहा है। इसकी परियोजना बनाई जा रही है। पक्का काम किया जाएगा।
संपूर्णानंद, अवर अभियंता सिंचाई विभाग
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