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बाहर नहीं निकल पाए नेपाली हाथी तो जंगल के अंदर रात भर मचाया उत्पात
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बांकेगंज। पश्चिम बंगाल से एक्सपर्ट ट्रैकर्स अब जाकर अपना असर दिखा पाए, उनकी सक्रियता के चलते नेपाली हाथी रविवार रात मड़हा जंगल से बाहर निकलने में कामयाब नहीं हो सके। जंगल के अंदर ही नेपाल के इन हाथियों ने जमकर उत्पात मचाया। किशनपुर सेंक्चुरी और बफरजोन के बॉर्डर पर नकुला के पास वन विभाग के लगे बैरियर को तोड़ दिया। रास्ते में पेड़ों की डालों को तहस-नहस कर दिया।
एक हफ्ते से किशनपुर सेंक्चुरी में शरण लिए नेपाली हाथियों के झुंड ने रविवार सारे दिन मड़हा में आराम करने के बाद रात करीब 12 बजे पहाड़नगर गांव जाने के लिए रास्ता बदल कर नकुला बैरियर की ओर अपना रुख किया। जहां आबादी की ओर जाने से पहले रास्ते में वन विभाग का बैरियर लगा था, उसे बंद देखकर हाथियों ने उसे तोड़ दिया। रास्ते में मोटे पेड़ों की डालों को भी तहस-नहस कर दिया। बंद बैरियर हाथियों को काफी नागवार गुजरा और गुस्से में वे जोर से चिंघाड़े। हाथियों के चिघाड़ने की आवाज सुनकर इनकी निगरानी में लगे ट्रैकर्स और वन कर्मी सतर्क हो गए। ट्रैकर्स ने जंगल के करीब जाकर मुंह से विशेष प्रकार की आवाज निकाली, इससे हाथी आगे बढ़े नहीं और जंगल में ही काफी देर तक उत्पात मचाने के बाद खामोश हो गए। हाथियों की खामोशी के बावजूद ट्रैकर्स और वन कर्मियों की टीम जंगल के बाहरी किनारों पर सारी रात कांबिग करते हुए लगातार उनके मूवमेंट पर नजर बनाए रहे। सोमवार सुबह निगरानी में लगे ट्रैकर्स और वन कर्मियों की टीम ने जंगल के आसपास खेतों में पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया। जहां फसलों का नुकसान न मिलने पर उन्होंने राहत की सांस ली।
उधर, डीटीआर बफरजोन के डीडी डॉ. अनिल कुमार पटेल ने बताया कि जंगल से हाथियों का झुंड आबादी की ओर न बढ़ने पाए, इसके लिए रविवार को पश्चिम बंगाल से आए एक्सपर्ट ट्रैकर्स और वन कर्मियों की दो टीमें गठित कर उनकी निगरानी के निर्देश दिए गए थे। एक्सपर्ट और वन कर्मियों की सतर्कता के चलते रविवार रात हाथियों का झुंड जंगल से बाहर नहीं निकल पाया। सोमवार सुबह से उनकी लोकेशन ट्रेस नहीं हुई है। हाथियों की लगातार निगरानी कराई जा रही है।
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एक हफ्ते से किशनपुर सेंक्चुरी में शरण लिए नेपाली हाथियों के झुंड ने रविवार सारे दिन मड़हा में आराम करने के बाद रात करीब 12 बजे पहाड़नगर गांव जाने के लिए रास्ता बदल कर नकुला बैरियर की ओर अपना रुख किया। जहां आबादी की ओर जाने से पहले रास्ते में वन विभाग का बैरियर लगा था, उसे बंद देखकर हाथियों ने उसे तोड़ दिया। रास्ते में मोटे पेड़ों की डालों को भी तहस-नहस कर दिया। बंद बैरियर हाथियों को काफी नागवार गुजरा और गुस्से में वे जोर से चिंघाड़े। हाथियों के चिघाड़ने की आवाज सुनकर इनकी निगरानी में लगे ट्रैकर्स और वन कर्मी सतर्क हो गए। ट्रैकर्स ने जंगल के करीब जाकर मुंह से विशेष प्रकार की आवाज निकाली, इससे हाथी आगे बढ़े नहीं और जंगल में ही काफी देर तक उत्पात मचाने के बाद खामोश हो गए। हाथियों की खामोशी के बावजूद ट्रैकर्स और वन कर्मियों की टीम जंगल के बाहरी किनारों पर सारी रात कांबिग करते हुए लगातार उनके मूवमेंट पर नजर बनाए रहे। सोमवार सुबह निगरानी में लगे ट्रैकर्स और वन कर्मियों की टीम ने जंगल के आसपास खेतों में पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया। जहां फसलों का नुकसान न मिलने पर उन्होंने राहत की सांस ली।
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उधर, डीटीआर बफरजोन के डीडी डॉ. अनिल कुमार पटेल ने बताया कि जंगल से हाथियों का झुंड आबादी की ओर न बढ़ने पाए, इसके लिए रविवार को पश्चिम बंगाल से आए एक्सपर्ट ट्रैकर्स और वन कर्मियों की दो टीमें गठित कर उनकी निगरानी के निर्देश दिए गए थे। एक्सपर्ट और वन कर्मियों की सतर्कता के चलते रविवार रात हाथियों का झुंड जंगल से बाहर नहीं निकल पाया। सोमवार सुबह से उनकी लोकेशन ट्रेस नहीं हुई है। हाथियों की लगातार निगरानी कराई जा रही है।
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