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एप्लास्टिक एनीमिया से पीड़ित बच्चे की मौत
लखीमपुर खीरी।
Updated Sun, 31 Jan 2016 07:46 PM IST
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जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में रविवार की सुबह भर्ती कराए गए एक पांच वर्षीय बच्चे ने इलाज कुछ घंटों बाद दम तोड़ दिया। डॉक्टरों ने बताया कि बच्चा एप्लास्टिक एनीमिया से पीड़ित था, जिसका समय से इलाज न होने के कारण उसे बचाया नहीं जा सका।
खीरी थाना क्षेत्र के गांव चौफेरी निवासी रमेश कुमार का पांच वर्षीय पुत्र छोटू चार दिन पहले सर्दी बुखार से बीमार हुआ था। इस पर परिवार वालों ने उसका इलाज नकहा में कराया। तीन दिनों तक इलाज कराने पर भी बच्चे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि दस्त आने के साथ ही बच्चे का पेट भी फूलने लगा। लिहाजा परिवार वाले बच्चे को लेकर जिला अस्पताल भागे और रविवार की सुबह आठ बजे इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया। डॉक्टरों ने बच्चे की गंभीर हालत देखते हुए तुरंत चिल्ड्रेन वार्ड में भर्ती कर इलाज शुरू किया। करीब तीन घंटे तक चले इलाज के बाद बच्चे ने दम तोड़ दिया। इलाज कर रहे डॉ राजेश कुमार ने बताया कि बच्चे में एप्लास्टिक एनीमिया के लक्षण पाए गए, जिससे खून बनना बंद हो गया था। ब्लड कैंसर की तरह ही एप्लास्टिक एनीमिया गंभीर बीमारी है, जिसका बड़ा महंगा इलाज है जो सिर्फ एम्स या पीजीआई जैसे बड़े अस्पतालों में ही संभव है। इस बीमारी के कारणों के बारे में डॉ राजेश कुमार नेेे बताया कि दवाओं के रिएक्शन से बोनमैरो प्रभावित हो जाता हैै, जिससे रक्त निर्माण की सतत प्रक्रिया बंद हो जाती है। ऐसी बीमारी के केस कभी कभार ही आते हैं।
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क्यों होता है एप्लास्टिक एनीमिया
डॉ राजेश कुमार ने बताया कि बोनमैरो की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने से खून का बनना बंद हो जाता है। इस अवस्था के लिए दवाओं का गलत प्रभाव या रिएक्शन जिम्मेदार होता है। इसके लिए रोगी के शरीर में खून चढ़ाना पड़ता है, लेकिन यह आंशिक तौर पर कारगर है। पूर्ण रूप से इलाज के लिए बोनमैरो का ट्रांसप्लांट किया जाता है, लेकिन इसमें भी सफलता की गारंटी कम होती है। उन्होंने बताया: पिछले वर्ष भी एक केस एप्लास्टिक एनीमिया का आया था।
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खीरी थाना क्षेत्र के गांव चौफेरी निवासी रमेश कुमार का पांच वर्षीय पुत्र छोटू चार दिन पहले सर्दी बुखार से बीमार हुआ था। इस पर परिवार वालों ने उसका इलाज नकहा में कराया। तीन दिनों तक इलाज कराने पर भी बच्चे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि दस्त आने के साथ ही बच्चे का पेट भी फूलने लगा। लिहाजा परिवार वाले बच्चे को लेकर जिला अस्पताल भागे और रविवार की सुबह आठ बजे इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया। डॉक्टरों ने बच्चे की गंभीर हालत देखते हुए तुरंत चिल्ड्रेन वार्ड में भर्ती कर इलाज शुरू किया। करीब तीन घंटे तक चले इलाज के बाद बच्चे ने दम तोड़ दिया। इलाज कर रहे डॉ राजेश कुमार ने बताया कि बच्चे में एप्लास्टिक एनीमिया के लक्षण पाए गए, जिससे खून बनना बंद हो गया था। ब्लड कैंसर की तरह ही एप्लास्टिक एनीमिया गंभीर बीमारी है, जिसका बड़ा महंगा इलाज है जो सिर्फ एम्स या पीजीआई जैसे बड़े अस्पतालों में ही संभव है। इस बीमारी के कारणों के बारे में डॉ राजेश कुमार नेेे बताया कि दवाओं के रिएक्शन से बोनमैरो प्रभावित हो जाता हैै, जिससे रक्त निर्माण की सतत प्रक्रिया बंद हो जाती है। ऐसी बीमारी के केस कभी कभार ही आते हैं।
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क्यों होता है एप्लास्टिक एनीमिया
डॉ राजेश कुमार ने बताया कि बोनमैरो की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने से खून का बनना बंद हो जाता है। इस अवस्था के लिए दवाओं का गलत प्रभाव या रिएक्शन जिम्मेदार होता है। इसके लिए रोगी के शरीर में खून चढ़ाना पड़ता है, लेकिन यह आंशिक तौर पर कारगर है। पूर्ण रूप से इलाज के लिए बोनमैरो का ट्रांसप्लांट किया जाता है, लेकिन इसमें भी सफलता की गारंटी कम होती है। उन्होंने बताया: पिछले वर्ष भी एक केस एप्लास्टिक एनीमिया का आया था।
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