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Rewari News: दस साल तक फाइलों में दबा रहा मामला, पंचायत विभाग की निगरानी पर भी उठ रहे सवाल

Mon, 07 Sep 2026 11:34 PM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी Updated Mon, 07 Sep 2026 11:34 PM IST
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The matter remained buried in files for ten years; questions are also being raised regarding the oversight by the Panchayat Department.
सोमवार को प्रकाशित खबर।
धारूहेड़ा। तीन ग्राम पंचायतों घटाल महानियावास, मालपुर और सुनारिया असदपुर में स्ट्रीट लाइट और हाईमास्ट लाइट की खरीद में गड़बड़ी का मामला सामने आने में भले ही वर्षों लग गए हों, लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जांच शुरू होने के बाद भी कार्रवाई की रफ्तार इतनी धीमी क्यों रही। वर्ष 2010 से 2015 के बीच हुई खरीद के मामले में राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने अब एफआईआर दर्ज की है।
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एफआईआर के अनुसार इस मामले में जांच 16 मार्च 2016 को दर्ज हुई थी। सबसे पुराने मामलों में खरीद वर्ष 2010 की है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर रिकॉर्ड में खरीद, भुगतान, कोटेशन और तकनीकी मूल्यांकन से जुड़ी गड़बड़ियां जांच के दौरान सामने आ गई थीं तो संबंधित स्तर पर कार्रवाई इतने वर्षों तक क्यों लंबित रही।
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सरकारी धन की हिफाजत के लिए नियम-कायदे बनाए जाते हैं। यदि अनियमितता के बाद कार्रवाई वर्षों तक टलती रहे तो इससे भ्रष्टाचार करने वालों में कार्रवाई का डर कम होने का सवाल भी खड़ा होता है। अब एसीबी की एफआईआर ने पुराने मामले को फिर से सामने ला दिया है और निगाह इस बात पर है कि जांच के अगले चरण में सरकारी नुकसान की वसूली और जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई कितनी तेजी से होती है।
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एसीबी की एफआईआर में दर्ज विवरण के मुताबिक हरियाणा सरकार के चौकसी विभाग के आदेश के बाद 16 मार्च 2016 को जांच शुरू की गई थी। जांच में वर्ष 2010 से 2015 के बीच विभिन्न ग्राम पंचायतों में खरीदी गई स्ट्रीट और हाईमास्ट लाइटों के बिल, भुगतान प्रस्ताव, कोटेशन और तकनीकी मूल्यांकन की जांच की गई।
जांच के दौरान कुछ पंचायतों में तकनीकी मूल्यांकन में भुगतान की गई राशि और निर्धारित मूल्यांकित राशि के बीच बड़ा अंतर सामने आया। घटाल महानियावास के एक मामले में तकनीकी मूल्यांकन में 81,212 रुपये अधिक खर्च पाए गए, जबकि एक अन्य बिल में 93,660 रुपये का अंतर सामने आया। जांच में कुछ कोटेशन को लेकर भी सवाल उठे और संबंधित फर्मों से उनकी पुष्टि कराई गई।
मालपुरा पंचायत के दो बिलों की तकनीकी जांच में 1,15,352 रुपये का अंतर सामने आया। जांच रिपोर्ट में तत्कालीन सरपंच, ग्राम सचिव और संबंधित फर्म संचालक के खिलाफ फर्जी कोटेशन तैयार करने और सरकारी राशि को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए।
सुनारिया असदपुर में वर्ष 2015 की 40 स्ट्रीट लाइटों की खरीद में भी तकनीकी मूल्यांकन के दौरान 47,780 रुपये का अंतर सामने आया। एफआईआर में संबंधित सरपंच, ग्राम सचिव और फर्म संचालक की मिलीभगत का आरोप है।

पंचायत विभाग की निगरानी पर भी उठे सवाल
मामला केवल खरीद करने वाले लोगों तक सीमित नहीं है। जांच में कई पंचायतों के रिकॉर्ड में कोटेशन और अन्य दस्तावेजों को सुरक्षित तरीके से नहीं रखने को भी लापरवाही माना गया। कुछ पंचायतों में वित्तीय नुकसान नहीं मिला, लेकिन रिकॉर्ड को व्यवस्थित तरीके से नहीं रखने पर संबंधित ग्राम सचिवों की भूमिका पर सवाल उठे। यहीं से बड़ा सवाल खड़ा होता है कि पंचायत स्तर पर होने वाली सरकारी खरीद की निगरानी और ऑडिट व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी है। यदि किसी खरीद में फर्जी कोटेशन, अधिक भुगतान या सरकारी धन को नुकसान जैसे आरोप सामने आते हैं तो क्या संबंधित विभाग को उसी समय जिम्मेदारी तय नहीं करनी चाहिए?


आठ आरोपियों में तीन पंचायतों के तत्कालीन सरपंच
करीब एक दशक तक जांच के स्तर पर रहने के बाद एसीबी ने इस मामले में आठ आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 120-बी, 409, 420, 467, 468 और 471 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) और 13(1)(डी) के तहत एफआईआर दर्ज की है। एफआईआर में आठ आरोपियों में तीन पंचायतों के तत्कालीन सरपंच, ग्राम सचिव और संबंधित फर्मों से जुड़े लोग शामिल हैं। इन धाराओं में आपराधिक साजिश, सरकारी कर्मचारी द्वारा विश्वासघात, धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। अब एसीबी दस्तावेजों, भुगतान रिकॉर्ड, कोटेशन और संबंधित फर्मों की भूमिका की जांच आगे बढ़ाएगी।
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