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Kushinagar News: कहने को रिकाॅर्ड दुरुस्त, पुरानी खतौनियों से गायब हैं बहुतों के नाम

Mon, 08 May 2023 12:50 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर Updated Mon, 08 May 2023 12:50 AM IST
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problem of khataunies
कलेक्ट्रेट स्थित अभिलेखागार में खतौनियों का मूल्यांकन करते संबंधित लोग। संवाद
फोटो है।
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जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं बहुत से गांवों की खतौनियां, उनमें कई लोगों के विवरण नहीं मिलते
जनपद के 31 तप्पा के 1,659 गांवों की खतौनियां हैं कलेक्ट्रेट के रिकॉर्ड रूम में खतौनियों में नाम न मिलने पर निराश होकर लौटना पड़ता है मुआयना के लिए आए लोगों को
लगभग 200 गांवों के नक्शे भी जीर्ण-शीर्ण होने के कारण उनका नहीं हो पा रहा डिजिटलाइजेशन
रजिस्ट्री, वरासत, नामांतरण, दाखिल-खारिज और जाति प्रमाण पत्र सहित कई कार्यों में पड़ती है खतौनियों की जरूरत
संवाद न्यूज एजेंसी
कुशीनगर। कहने के लिए कलेक्ट्रेट के रिकॉर्ड रूम (अभिलेखागार) में जनपद के 1,659 गांवों की खतौनियां हैं, लेकिन इनमें कुछ ऐसे गांवों की खतौनियां भी हैं, जिसमें गांव के सभी लोगों का नाम नहीं मिल पाता। ऐसे लोगों को निराश होकर लौट जाना पड़ता है।
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मुआयना न हो पाने से उन लोगों की रजिस्ट्री, वरासत, नामांतरण, दाखिल-खारिज और जाति प्रमाणपत्र बनवाने सहित विभिन्न कार्य प्रभावित होते हैं। इसी तरह गांवों के नक्शों का डिजिटलाइजेशन किया जा रहा है। 1,400 से अधिक गांवों के नक्शे डिजिटल हो चुके हैं, लेकिन शेष गांवों के नक्शे इसी वजह से डिजिटल नहीं हो पा रहे हैं कि उनकी खतौनियां जीर्ण-शीर्ण हालत में होने के कारण इस कार्य के लिए उपयोग में नहीं आ पा रही हैं। ऐसी खतौनियां जब तक शासन स्तर ने अनुमति न मिले, उनका मुद्रण नहीं हो सकता। तब तक लोगों को खतौनियां और नक्शों के लिए परेशान होना पड़ेगा।
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13 मई, 1994 को देवरिया से अलग होकर कुशीनगर जिला अस्तित्व में आया था, लेकिन उसके बावजूद इस जिले के गांवों की खतौनियां दस वर्षों तक नहीं आ पाई थीं। बताया जाता है कि उसी दौरान देवरिया में आई बाढ़ के चलते रिकाॅर्ड रूम में पानी भर गया था, जिससे खतौनियां भीगने से खराब हो गई थीं। जब वहां से खतौनियां कुशीनगर के रिकार्ड रूम लाई गईं तो बहुत से गांवों की खतौनियां फट गई थीं या खस्ताहाल थीं। उनके रिकाॅर्ड नहीं मिल पाए थे।
उपलब्ध खतौनियों को व्यवस्थित कराकर रिकाॅर्ड रूम में रख तो दिया गया है, लेकिन अभी भी बहुत से लोग मुआयना के लिए आने पर जब अपने गांव की खतौनी निकलवाते हैं तो उसमें उनका रिकाॅर्ड नहीं मिल पाता। ऐसे में वे लोग निराश होकर लौट जाते हैं।

1,659 गांवों की खतौनियां उपलब्ध हैं अभिलेखागार में
अभिलेखागार से जुड़े लोग बताते हैं जिले के 31 तप्पा की 1,659 गांवों की खतौनियां यहां उपलब्ध हैं। किसी गांव की खतौनी कम नहीं है, लेकिन दूसरी ओर दबी जुबान से यह बात भी सामने आती है कि इनमें बहुत सी खतौनियां जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं। उनमें बहुत से लोगों के विवरण नहीं हैं, जिससे उन्हें मुआयना कराए बिना वापस जाना पड़ता है।

शासन स्तर से हो सकता है जीर्ण-शीर्ण खतौनियों का नए सिरे से मुद्रण
विभाग से जुड़े लोग बताते हैं कि जो खतौनियां फट गई हैं या जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं उनका मुद्रण शासन स्तर से ही हो सकता है। इसके अलावा गांवों के नक्शे भी डिजिटल किए जा रहे हैं। 1,400 से अधिक गांवों के नक्शों का डिजिटलाइजेशन हो चुका है, लेकिन शेष इसी वजह से लंबित हैं, क्योंकि उन गांवों की खतौनियां जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं। उनका विवरण तैयार नहीं हो पा रहा है।

इसलिए पड़ती है खतौनियों की जरूरत कलेक्ट्रेट के अभिलेखागार में खसरा-खतौनी और भूमि से संंबंधित दस्तावेजों को रखा जाता है। इसका परगनावार और गांववार बस्ता बनाया जाता है। एक परगना में डेढ़ से ढाई सौ तक गांव शामिल होते हैं। तहसीलों के अभिलेखागार में रखी जानी वाली खतौनी को 12 साल बाद कलेक्ट्रेट के अभिलेखागार में जमा कराने का नियम है। किसी भूमि की रजिस्ट्री कराए जाने, नामातंरण, वरासत और खारिज दाखिल जैसी प्रक्रिया के लिए खतौनी सहित अन्य के नकल की जरूरत पड़ती है। कभी-कभी मुकदमों में सबूत के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए, इसका नकल लेने के लिए आवेदन किया जाता है। तहसील से जुड़े लोगों के अनुसार, पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने से लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है। अक्सर लोगों के आवेदन करने के बाद भी उनको नकल नहीं मिल पा रही है।

खतौनी नहीं होने से आने वाली परेशानी
तहसील के अधिवक्ताओं के अनुसार भू अभिलेखागार से प्रमाणित कापी नहीं मिलने से नामातंरण, नाम संशोधन सहित अन्य काम नहीं हो पाते हैं। इससे लोग परेशान रहते हैं। उन्हें बार-बार तहसील का चक्कर लगाना पड़ता है। इसके अलावा रिकॉर्ड मौजूद नहीं होने से भू-माफिया भी कागजों में हेरफेर करके सौदेबाजी कर देते हैं। पुराना रिकॉर्ड नहीं पाए जाने से किसी नए का नाम चढ़ा दिया जाता है।

केस-एक
रिकार्ड रूम से खतौनी की नकल निकलवाने गए थे। खतौनी के मुआयना के दौरान ब्योरा नहीं मिला। इसलिए वापस आना पड़ा।
-जलालुद्दीन, पडरौना
केस-दो
जाति प्रमाणपत्र के लिए राजस्व अभिलेखागार में मुआयना कराया था। पता चला कि उसमें मेरे पूर्वजों का विवरण ही नहीं है। क्योंकि तहसील से बताया गया था कि पहले 1323, 1356 आदि वर्षों की फसली निकलवाकर लाइए।

-ओमप्रकाश, रामपुर सोहरौना
कोट
राजस्व अभिलेखागार में सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखे गए हैं। खतौनी का रिकॉर्ड नहीं मिलने की कोई शिकायत नहीं मिली है। यदि कोई ऐसा प्रकरण आएगा तो जांच कराई जाएगी। हमारे यहां गांवों के नक्शे भी डिजिटल किए जा रहे हैं। 1,400 से अधिक गांवों के नक्शे डिजिटल हो गए हैं, शेष की खतौनियां में कमी के कारण काम प्रक्रियाधीन है।
-देवी दयाल वर्मा, एडीएम, वित्त एवं राजस्व
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