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Kushinagar News: ‘तत्त्वमसि’ से त्याग, अनुशासन, सेवा और आत्मबोध का मार्ग प्रशस्त होता है
Sat, 25 Apr 2026 06:06 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Sat, 25 Apr 2026 06:06 AM IST
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सिद्धार्थनगर। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु की ओर से शुक्रवार को विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद, गोरक्षप्रांत की ओर से श्रीधर पराडकर की महत्वपूर्ण कृति ‘तत्त्वमसि’ पर हाइब्रिन मोड में एक सांध्यकालीन परिचर्चा का आयोजन किया गया। इसमें वेबिनार में वक्ताओं ने पुस्तक के दार्शनिक, आध्यात्मिक और राष्ट्र निर्माण संबंधी विविध आयामों पर गंभीर एवं सारगर्भित विचार व्यक्त किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की गोरक्षप्रांत इकाई के अध्यक्ष प्रो. हरीश कुमार शर्मा ने कहा कि ‘तत्त्वमसि’ केवल एक दार्शनिक अवधारणा नहीं बल्कि जीवन को उन्नत बनाने वाली एक प्रेरक कृति है। उन्होंने बताया कि पुस्तक में चित्रित विभिन्न पात्रों जैसे स्नेहल, परितोष, संजय कपूर, सदानंद महेश बाबू एवं अन्य स्वयंसेवक पात्रों के माध्यम से त्याग, अनुशासन, सेवा और आत्मबोध का मार्ग प्रशस्त होता है। लेखक श्रीधर पराडकर ने इन पात्रों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि संगठन राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संघ के स्वयंसेवक व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं एवं इच्छाओं का त्याग कर सेवा-भाव से राष्ट्र निर्माण में निरंतर संलग्न रहते हैं। संवाद
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कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की गोरक्षप्रांत इकाई के अध्यक्ष प्रो. हरीश कुमार शर्मा ने कहा कि ‘तत्त्वमसि’ केवल एक दार्शनिक अवधारणा नहीं बल्कि जीवन को उन्नत बनाने वाली एक प्रेरक कृति है। उन्होंने बताया कि पुस्तक में चित्रित विभिन्न पात्रों जैसे स्नेहल, परितोष, संजय कपूर, सदानंद महेश बाबू एवं अन्य स्वयंसेवक पात्रों के माध्यम से त्याग, अनुशासन, सेवा और आत्मबोध का मार्ग प्रशस्त होता है। लेखक श्रीधर पराडकर ने इन पात्रों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि संगठन राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संघ के स्वयंसेवक व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं एवं इच्छाओं का त्याग कर सेवा-भाव से राष्ट्र निर्माण में निरंतर संलग्न रहते हैं। संवाद
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