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Kushinagar News: आस्था का केंद्र बना मां बंचरा देवी धाम, दूर-दराज से उमड़ रहे श्रद्धालु
Sun, 22 Mar 2026 12:24 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Sun, 22 Mar 2026 12:24 AM IST
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सुकरौली स्थित मां बंचरा देवी मंदिर।संवाद
सुकरौली। ब्लॉक मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित मां बंचरा देवी का प्राचीन मंदिर नवरात्र में आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। शारदीय और चैत्र नवरात्र में यहां दूर-दराज से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि मां बंचरा देवी की कृपा से विवाह, उपनयन और अन्य मांगलिक कार्य सकुशल संपन्न होते हैं।
बुजुर्गों के अनुसार, यह मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराना है। मंदिर स्थल पहले घने जंगलों से घिरा था। वहां लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व बाबा मथुरानाथ ने कुटी स्थापित की थी। जनश्रुति है कि वे मां की कृपा से बाघ की सवारी करते थे। बाद में क्षेत्रीय सहयोग से बाबा महावीरनाथ ने मंदिर का निर्माण कराया। इसके बाद बाबा अवधबिहारी नाथ और बाबा राजेश नाथ ने यहां यज्ञ व भंडारे की परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्तमान में महंत बाबा दीपक नाथ के नेतृत्व में प्रतिवर्ष यज्ञ का आयोजन किया जाता है।
मंदिर का निर्माण साधारण शैली में हुआ है, जिसका कुछ वर्ष पूर्व जीर्णोद्धार कराया गया। यहां मां की आकर्षक प्रतिमा के साथ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। श्रद्धालु मां को नारियल, चुनरी, सिंदूर, खप्पर और कपूर अर्पित करते हैं। स्थानीय लोगों के अलावा पड़ोसी राज्यों और नेपाल से भी बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं।
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महंत दीपक नाथ ने बताया कि यह मंदिर सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है और दसनामी गिरी संप्रदाय से जुड़ा है। रामनवमी और दशहरा पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है। उन्होंने कहा कि सच्चे मन से मां के दरबार में आने वाला कोई भी भक्त निराश नहीं लौटता। नवरात्र में यहां आस्था और श्रद्धा का विशेष माहौल देखने को मिलता है।
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बुजुर्गों के अनुसार, यह मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराना है। मंदिर स्थल पहले घने जंगलों से घिरा था। वहां लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व बाबा मथुरानाथ ने कुटी स्थापित की थी। जनश्रुति है कि वे मां की कृपा से बाघ की सवारी करते थे। बाद में क्षेत्रीय सहयोग से बाबा महावीरनाथ ने मंदिर का निर्माण कराया। इसके बाद बाबा अवधबिहारी नाथ और बाबा राजेश नाथ ने यहां यज्ञ व भंडारे की परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्तमान में महंत बाबा दीपक नाथ के नेतृत्व में प्रतिवर्ष यज्ञ का आयोजन किया जाता है।
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मंदिर का निर्माण साधारण शैली में हुआ है, जिसका कुछ वर्ष पूर्व जीर्णोद्धार कराया गया। यहां मां की आकर्षक प्रतिमा के साथ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। श्रद्धालु मां को नारियल, चुनरी, सिंदूर, खप्पर और कपूर अर्पित करते हैं। स्थानीय लोगों के अलावा पड़ोसी राज्यों और नेपाल से भी बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं।
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महंत दीपक नाथ ने बताया कि यह मंदिर सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है और दसनामी गिरी संप्रदाय से जुड़ा है। रामनवमी और दशहरा पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है। उन्होंने कहा कि सच्चे मन से मां के दरबार में आने वाला कोई भी भक्त निराश नहीं लौटता। नवरात्र में यहां आस्था और श्रद्धा का विशेष माहौल देखने को मिलता है।